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राजनाथ की सलाह दरकिनार कर योगी ने फिर छेड़ा 'जिन्ना' का राग!

उत्तर प्रदेश के चुनाव में 'जिन्ना' को बार-बार लाने की कोशिश क्यों हो रही है? इसका जवाब जो भी हो, लेकिन इस पर बीजेपी के ही नेताओं की विरोधाभासी राय है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक दिन पहले ही कहा था कि भाजपा जिन्ना नहीं, गन्ने के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। लेकिन राजनाथ की इस सलाह को दरकिनार कर योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को फिर से 'जिन्ना' का राग छेड़ दिया।

उन्होंने ट्वीट किया, "वे 'जिन्ना' के उपासक हैं, हम 'सरदार पटेल' के पुजारी हैं। उनको पाकिस्तान प्यारा है, हम मां भारती पर जान न्योछावर करते हैं।"

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का यह ट्वीट रक्षा मंत्री के ट्वीट के एकदम विपरीत है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा कहा गया था कि राज्य की राजनीति के संदर्भ में किसानों के गन्ने के मुद्दों को उठाया जाना चाहिए, न कि मुहम्मद अली जिन्ना का।

राजनाथ सिंह ने गुरुवार को कहा था, 'मुझे नहीं पता कि पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना का नाम अक्सर चुनावों के दौरान क्यों लिया जाता है। जो लोग इसका राजनीतिकरण करना चाहते हैं, उन्हें यूपी की राजनीति में जिन्ना का नाम नहीं लेना चाहिए। इसके बजाय, हमें किसानों के गन्ने की बात करनी चाहिए।' वह पश्चिमी यूपी में चुनाव अभियान में शामिल होने के दौरान गाजियाबाद जिले के मोदीनगर में मतदाताओं से संवाद कर रहे थे।

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राजनाथ की यह सलाह बीजेपी नेताओं की जिन्ना को लेकर बयानबाजी से मेल नहीं खाती है। बीजेपी के कई नेता अपने भाषणों में विपक्ष को जिन्ना का समर्थक बताते रहे हैं और इसको लेकर वे विपक्ष पर लगातार हमलावर रहे हैं।

हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के एक बयान के बाद बीजेपी नेताओं ने उनपर जिन्ना को लेकर निशाना साधा था। दरअसल, तब अखिलेश यादव ने महात्मा गांधी, सरदार वल्लभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू और मुहम्मद अली जिन्ना को भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई में योगदान देने वाला बताया था।

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अखिलेश की टिप्पणियों पर मुख्यमंत्री योगी ने हमला किया था। उन्होंने कहा था कि अखिलेश की पटेल के साथ जिन्ना की तुलना शर्मनाक थी और इसे तालिबानी मानसिकता कहा था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बसपा प्रमुख मायावती ने कहा था कि जिन्ना पर यादव की टिप्पणी और उस पर भाजपा की प्रतिक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले हिंदू-मुसलिम आधार पर माहौल ख़राब करने की दोनों पार्टियों की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

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