ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। माघ मेला प्राधिकरण ने मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) पर हुई अव्यवस्था के बाद उन्हें पिछली तारीख में नोटिस जारी किया है। जिसमें उनकी उनके शिविर को दी गई जमीन और सुविधाओं को निरस्त करने तथा भविष्य में मेले में उनकी स्थायी एंट्री पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी गई है। 
मौनी अमावस्या के दिन सुबह करीब 9 बजे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद लगभग 200 अनुयायियों और पालकी के साथ संगम स्नान के लिए पहुंचे। प्रशासन का आरोप है कि उन्होंने पूर्व अनुमति के बिना "वीआईपी स्टाइल" में जुलूस निकाला, बैरिकेड तोड़े और वापसी मार्ग को लगभग तीन घंटे तक अवरुद्ध कर दिया। घने कोहरे और भीड़ के चरम समय में यह कार्रवाई लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई और व्यवस्था भंग हो गई। प्रयागराज पुलिस कमिश्नर और मंडलायुक्त ने स्पष्ट किया कि किसी भी संत या वीआईपी को विशेष वाहन अनुमति नहीं दी गई थी; सभी को सामान्य श्रद्धालुओं की तरह स्नान करना था ताकि समानता और सुरक्षा बनी रहे। लेकिन इस दौरान पुलिस ने शंकराचार्य के अनुयायियों को बेरहमी से पीटा। शंकराचार्य का रास्ता रोकने की कोशिश की। इस विवाद ने तूल पकड़ लिया।

इसके बाद मेला प्राधिकरण ने एक नोटिस (जे बैक-डेटेड है यानी पिछली तारीख है) जारी किया। नोटिस में लिखा है: "आपके कृत्य से मौनी अमावस्या पर व्यवस्था छिन्न-भिन्न हुई। लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ। 24 घंटे में बताएं कि इस कृत्य के कारण आपको दी गई जमीन और सुविधाएं निरस्त करके सदैव के लिए मेले में एंट्री से प्रतिबंधित क्यों न कर दिया जाए।"

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एक और नोटिस (19 जनवरी 2026) उनके शिविर बोर्ड पर पहले ही चिपकाया गया था। जिसमें योगी सरकार ने "शंकराचार्य" उपाधि के इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की लंबित अपील (सिविल अपील नंबर 3010/2020) का हवाला दिया गया, जिसमें ज्योतिष पीठ के पट्टाभिषेक पर रोक है। प्राधिकरण ने इसे अदालत की अवमानना बताया। हालांकि शंकराचार्य सरकार द्वारा दिया गया पद नहीं है। ऐसे में कोई भी कोर्ट इस विवाद का किस तरह फैसला करेगी, यह समय बताएगा।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का विरोध

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज में अपने कैंप के बाहर धरना दिया, भोजन-पानी त्याग दिया और आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके अनुयायियों के साथ दुर्व्यवहार किया तथा शंकराचार्य परंपरा का अपमान किया। अपने 8 पेज के जवाब में उन्होंने नोटिस को "अपमानजनक" बताया और अदालत की अवमानना तथा मानहानि का मुकदमा करने की चेतावनी दी। उनके वकील पी.एन. मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की रोक पट्टाभिषेक पर है, उपाधि के इस्तेमाल पर नहीं। उन्होंने अपने गुरु और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की वसीयत और द्वारका व श्रृंगेरी पीठों के समर्थन का हवाला दिया। उन्होंने पूछा कि दो "पुरी शंकराचार्य" को एक ही मेले में शिविर क्यों दिए गए।

प्राधिकरण ने कथित सुरक्षा के नाम पर कानूनी कार्रवाई शुरू की है और मेगा धार्मिक आयोजनों में वीआईपी संस्कृति पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने का दावा किया है। लेकिन यही योगी सरकार और इलाहाबाद प्रशासन महाकुंभ में भगदड़ को नहीं रोक पाया। उस दौरान हुई बदइंतजामी के चर्चे और ज़ख्म अब तक हैं। कांग्रेस का कहना है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद कभी भी आरएसएस और बीजेपी की हां में हां नहीं मिलाते, इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी उन्हें अपना नहीं मानती। यही वजह है कि केंद्र से लेकर यूपी की पूरी बीजेपी सरकार शंकराचार्य के पीछे पड़ गई है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी शंकराचार्य के अनुयायियों और साधुओं को पीटे जाने की घटना के लिए योगी सरकार की कड़ी आलोचना की है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अनुयायियों का कहना है कि भाजपा सरकार उन को जानबूझकर टारगेट कर रही है, क्योंकि स्वामी जी सरकार की नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इसे "संतों का अपमान" बताया, अखिलेश यादव ने माफी की मांग की और कांग्रेस ने "नकली हिंदुत्व" का आरोप लगाया। 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े पिछले विवाद

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का करियर धार्मिक, राजनीतिक और कानूनी विवादों से भरा रहा है। शुरुआत शंकराचार्य उपाधि विवाद से हुई। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद ज्योतिष पीठ पर उन्होंने दावा किया। प्रतिद्वंद्वी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के साथ सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है। 2022 में उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगी, उससे पहले ही उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। बीजेपी के नेता उन्हें कांग्रेस समर्थित शंकराचार्य बताते हैं।

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2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का उन्होंने बहिष्कार किया। उन्होंने अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को शास्त्र-विरोधी बताया। उन्होंने पीएम मोदी पर हिंदुत्व के राजनीतिकरण का आरोप लगाया। उन्होंने केदारनाथ मंदिर में 228 किलो गोल्ड घोटाले का आरोप 2023-24 में लगाया। मंदिर से गोल्ड गायब होने का दावा किया गया। सरकार ने जांच कराई लेकिन विवाद बढ़ता गया। उन्होंने बीजेपी पर बीफ को लेकर हमला किया। उन्होंने कहा कि भाजपा नॉर्थ ईस्ट में बीफ खाने का समर्थन क्यों कर रही है। बीजेपी का आरोप है कि अविमुक्तेश्वरानंद
उद्धव ठाकरे और राहुल गांधी का समर्थन करते हैं। उन्होंने ज्ञानवापी परिक्रमा में प्रतिबंध का विरोध किया। कोविड काल में गंगा में शव बहाने और जोशीमठ संकट पर भी टिप्पणी की। जिससे केंद्र सरकार काफी नाराज हुई। उनके समर्थक उन्हें सनातन धर्म का सच्चा संरक्षक बताते हैं।