उत्तराखंड में भाजपा सरकार द्वारा कथित जबरन धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया कानून किसी काम का साबित नहीं हो पा रहा है। लगभग सात साल बाद, अदालती रिकॉर्ड बताते हैं कि यह कानून बुनियादी कानूनी कसौटी यानी सबूतों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। गिरफ्तारियां जारी रहने के बावजूद, न्यायिक जांच ने अक्सर राज्य के दावे को कमजोर कर दिया है, और पूर्ण सुनवाई तक पहुंचे सभी पांच मामलों में दोषियों को बरी कर दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (यूएफआरए) के तहत दर्ज मामलों की जांच की है। उसने काफी सूचनाएं आरटीआई के ज़रिए भी जुटाईं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने तक उत्तराखंड पुलिस इस कानून के तहत 62 मामले दर्ज कर चुकी थी। इनमें से सितंबर 2025 तक सिर्फ पाँच मामलों में पूरा ट्रायल हुआ और इन पांचों में अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया। कम से कम सात मामले बीच में ही खत्म हो गए, क्योंकि शिकायत करने वालों ने अपने बयान बदल दिए, सबूतों की पुष्टि नहीं हो सकी और सरकारी वकील यह साबित नहीं कर पाए कि किसी से ज़बरदस्ती या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया था। बाकी 39 मामलों में से ज़्यादातर आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं। कई को हाई कोर्ट और एक को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली। अदालतों ने ज़मानत देते समय यह भी नोट किया कि कई रिश्ते आपसी सहमति से बने थे, बयानों में विरोधाभास था और पुलिस जाँच में गंभीर खामियाँ थीं।
इन मामलों में एक उदाहरण अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी का है। दो परिवारों ने मिलकर शादी तय कराई थी और दोनों ने हलफ़नामा दिया था कि महिला धर्म परिवर्तन नहीं करेगी। इसके बावजूद अमन को इस कानून के तहत करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा। 19 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ज़मानत देते हुए साफ कहा कि राज्य सरकार को ऐसी अंतरधार्मिक शादी पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती जो दोनों की मर्ज़ी से और परिवार की सहमति से हुई हो। इस मामले में अमन की पत्नी के भाई ने एफआईआर दर्ज कराई थी। उसका आरोप था कि अमन ने शादी के दिन तक अपनी पहचान छिपाकर रखी। अमन की माँ हिंदू हैं और पिता मुस्लिम हैं।

शिकायतकर्ता का कहना था कि उसे यह बात नहीं बताई गई थी। अमन के वकील ने अदालत में कहा कि पहले ही हलफ़नामा दिया गया था कि महिला धर्म परिवर्तन नहीं करेगी और यह आपत्ति शादी के बाद उठाई गई। बाद में हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी और राज्य सरकार से जवाब मांगा।
अब बात उन पाँच मामलों की जिनमें ट्रायल पूरा हुआ और सभी में आरोपी बरी हुए। इन पाँच में से दो मामले ऐसे थे जिनमें शिकायत ऐसे लोगों ने की थी जिनका कथित धर्म परिवर्तन से कोई सीधा संबंध नहीं था। कानून के मुताबिक शिकायत वही कर सकता है जिस पर धर्म परिवर्तन का आरोप हो, या उसके माता-पिता, भाई या बहन। इसके बावजूद तीसरे लोगों द्वारा शिकायतें दर्ज की गईं।
फरवरी 2021 में टिहरी गढ़वाल में सीताराम रणकोटी की शिकायत पर विनोद कुमार पर फेसबुक वीडियो के ज़रिये हिंदू धर्म की आलोचना और ईसाई धर्म की तारीफ़ का आरोप लगा, लेकिन अदालत में यह साबित नहीं हो पाया कि उसने किसी को धर्म परिवर्तन के लिए लालच दिया। वीडियो भी प्रमाणित नहीं हो सके और जनवरी 2024 में वह बरी हुआ। रामनगर में पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट पर बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगा, पर अभियोजन यह नहीं बता सका कि किसे और कैसे उकसाया गया, इसलिए 2025 में वह भी बरी हुए। अल्मोड़ा के रानीखेत में महिला ने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से गई थी, जबकि अन्य मामलों में भी आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।
24 ऐसे मामले हैं जिनमें धर्म परिवर्तन कानून के साथ बलात्कार या अपहरण की धाराएँ भी जोड़ी गईं। इनमें से 16 मामलों में अदालतों ने कहा कि रिश्ते आपसी सहमति से बने थे या जाँच में गड़बड़ियाँ थीं। कई मामलों में कथित पीड़ितों ने अपने बयान बदल दिए। कुछ मामलों में आरोपियों ने परिवार पर उगाही का आरोप भी लगाया। छह मामलों में पॉक्सो कानून भी लगाया गया। इनमें से आधे मामलों में अदालत ने कहा कि रिश्ता आपसी सहमति से था, लेकिन लड़की की उम्र कम होने की वजह से बलात्कार की धाराएँ बनी रहीं। सात मामले ऐसे भी हैं जिनमें मुस्लिम पुरुषों पर पहचान छिपाकर महिलाओं को धर्म परिवर्तन के लिए फँसाने का आरोप लगाया गया। इनमें से चार मामलों में खुद महिलाओं ने आरोपों से इनकार किया या अदालत ने जाँच में गड़बड़ी नोट की। कुछ मामलों में हाई कोर्ट ने ज़मानत देते हुए कहा कि न तो मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज हुआ और न कोई इलेक्ट्रॉनिक सबूत है।
कुछ मामले ऐसे भी हैं जहाँ अंतरधार्मिक जोड़ों ने अपने परिवार से सुरक्षा माँगी और उनके खिलाफ ही कार्रवाई हो गई। कानून के तहत अगर अंतरधार्मिक शादी में धर्म परिवर्तन होता है तो जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचना देनी होती है। ऐसे पाँच और मामले सामने आए, जिनमें आरोप था कि जोड़ों ने अधिकारियों से अनुमति नहीं ली। इनमें से चार मामलों में अदालत ने गिरफ्तारी से राहत दी।
पूरी तस्वीर देखें तो साफ होता है कि यह कानून अदालतों में टिक नहीं पा रहा है। सरकार का दावा है कि यह कानून ज़बरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिए है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में अदालतें यह मान रही हैं कि रिश्ते आपसी सहमति से बने थे, सबूत कमजोर थे और जाँच में खामियाँ थीं। यानी सवाल सिर्फ धर्म परिवर्तन का नहीं है, सवाल कानून के इस्तेमाल और उसके दुरुपयोग का भी है। जहाँ सरकार इसे सामाजिक सुरक्षा का हथियार बता रही है, वहीं अदालतों के फैसले यह दिखा रहे हैं कि बिना ठोस सबूत के लोगों को जेल भेजा गया, ज़मानत मुश्किल बनाई गई और निजी रिश्तों को आपराधिक मामला बना दिया गया। और इन्हीं वजहों से उत्तराखंड का धर्म परिवर्तन विरोधी कानून अदालतों में बार-बार फेल हो रहा है।