नफ़रत के ख़िलाफ़ खड़े होने वाले ‘मोहम्मद’ दीपक को अब उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी कड़ी फटकार लगा दी। आख़िर दीपक ने ऐसी क्या ग़लती की कि हाई कोर्ट ने उनको खरी खरी सुना दी? पढ़िए, हाई कोर्ट की 'अजीबोगरीब' टिप्पियाँ।
क्या 'मोहम्मद' दीपक याद हैं? वही जो कोटद्वार में मुस्लिम दुकानदार को बचाने के लिए बजरंग दल के लोगों से भिड़ गए थे और जो नफ़रत के ख़िलाफ़ आवाज़ बनकर उभरे? 'आवाज़' उठाने के लिए दंगे का मुक़दमा झेल रहे 'मोहम्मद' दीपक को ही उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तब फटकार लगा दी जब उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर याचिका लगाई। कोर्ट ने उनकी याचिका में पुलिस सुरक्षा और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को दबाव बनाने की रणनीति और मामले को सनसनीखेज बनाने की कोशिश बताया। जस्टिस राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मौखिक रूप से फटकार लगाते हुए कहा कि आरोपी खुद जांच के दायरे में है तो वह पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है?
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने क्या-क्या कहा, यह जानने से पहले यह जान लें कि यह पूरा मामला क्या है। 26 जनवरी को कोटद्वार में एक घटना हुई। बजरंग दल के कुछ सदस्य एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद से दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द हटाने की मांग कर रहे थे। दीपक कुमार ने दुकानदार का साथ दिया। भीड़ ने नाम पूछा तो उन्होंने खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताकर बजरंग दल के सदस्यों का विरोध किया। यह वीडियो वायरल हो गया।
मोहम्मद दीपक के खिलाफ एफ़आईआर क्यों?
इसके बाद दीपक के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज कराई गई। दंगा भड़काने, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने की कोशिश के आरोप लगाए गए। दीपक ने हाई कोर्ट में एफ़आईआर रद्द करने की याचिका दायर की। लेकिन इस याचिका में ही उन्होंने तीन और मांगें भी डालीं। नफरत फैलाने वालों के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज कराई जाए। उन्हें और उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा दी जाए। पक्षपाती रवैया अपनाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच हो। इन पर हाई कोर्ट ने सख्त आपत्ति जताई
हाई कोर्ट नाराज़ क्यों हुआ?
मामले की सुनवाई जस्टिस थपलियाल कर रहे थे। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस थपलियाल ने कहा कि ये अतिरिक्त मांगें जांच को प्रभावित करने की कोशिश हैं। आरोपी खुद संदिग्ध है तो पुलिस सुरक्षा की मांग कैसे? उन्होंने पूछा- 'आरोपी जांच के दौरान पुलिस सुरक्षा मांगेगा? यह पूरी तरह अनुचित है। यह जांच एजेंसी पर दबाव डालने की कोशिश लगती है।'
रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार की तरफ़ से वकील ने बताया कि जांच अधिकारी ने फोन पर कहा है कि दीपक को कोई ख़तरा नहीं है। कोर्ट ने दीपक के वकील नवनीश नेगी से कहा, 'पहली घटना 26 जनवरी, दूसरी 31 जनवरी की। फरवरी पूरा हो गया, मार्च आधा बीत गया। किसी ने आपको हाथ भी नहीं लगाया।'
दीपक के वकील नेगी ने कहा कि दीपक को लगातार धमकियां मिल रही हैं, घर और जिम के बाहर भीड़ जमा हुई। लेकिन कोर्ट ने इसे आधारहीन बताया।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की, 'पुलिस को आपकी सुरक्षा की सबसे ज्यादा चिंता है। क्यों? क्योंकि उन्हें एफ़आईआर की जांच कर चार्जशीट दाखिल करनी है। अगर आपके साथ कुछ हो गया तो चार्जशीट कैसे आएगी?'
एफ़आईआर की मांग पर क्या कहा?
नफ़रत फैलाने वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की मांग पर हाई कोर्ट ने कहा कि इसके लिए दीपक के पास मजिस्ट्रेट के पास जाने का क़ानूनी रास्ता है। इसने कहा कि हाई कोर्ट में याचिका डालकर एफ़आईआर दर्ज करवाना गलत है, खासकर जब याचिकाकर्ता खुद आरोपी है।कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग पर गंभीर नोट लिया। इसने कहा कि कोई सबूत नहीं दिए गए, सिर्फ इधर-उधर के आरोप लगाए गए हैं। जांच चल रही है तो ऐसी मांगें जांच प्रभावित करने की कोशिश हैं।
सोशल मीडिया फंडिंग पर सवाल क्यों?
सुनवाई के दौरान बेंच ने यह भी पूछा कि घटना के बाद याचिकाकर्ता को समर्थकों से कथित तौर पर कितने पैसे मिले थे। लाइल लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस थपलियाल ने पूछा, 'अभी तक अकाउंट में कितने पैसे आए हैं?' एडवोकेट नेगी ने कहा कि अकाउंट एक्टिविटी बंद करने से पहले लगभग 80000 रुपये मिल चुके थे। नेगी ने याचिकाकर्ता की ओर से बताया, 'जैसे ही एक बड़ा अमाउंट आया, हमें बैंक ने कहा कि रोक दो। मैंने रोक दिया है। मैंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि मेरे अकाउंट में पैसे न डाले जाएं।'सुनवाई के दौरान एडवोकेट नेगी ने दीपक के खिलाफ लगाए गए दंगों के आरोपों का भी कड़ा विरोध किया, क्योंकि उन्होंने तर्क दिया कि दंगों के लिए पांच या उससे ज़्यादा लोगों का इकट्ठा होना ज़रूरी है, जबकि वीडियो सबूतों में सिर्फ़ दो लोग दिखे। एडवोकेट नेगी ने कहा, 'हमारा पूरा केस है कि S. 191 BNS के तहत हम पर मुक़दमा कर रहे हैं जबकी हम सिर्फ दो लोग थे। और हम तो मुद्दे को शांत करने की कोशिश कर रहे थे कि भाई 26 जनवरी को ऐसी घटनाएं न हों। लेकिन हम पर केस किया गया।'
हालाँकि, बेंच ने इस केस को अलग से देखने से मना कर दिया। जस्टिस थपलियाल ने कहा, 'कुछ केस ऐसे होते हैं... हमें यहां बैठकर सिर्फ एक आपका केस नहीं देखना। इसका असर समाज में क्या होगा... स्टेट पुलिस के पास भी सिर्फ एक केस नहीं है, इनके पास तमाम केस होते हैं, वे बहुत बिज़ी रहते हैं।'