बेबस मज़दूरों को हमारे सिस्टम ने रेल की पटरी पर रौंदकर क्षतविक्षत दिया। सबक़ दिया कि तुम कहाँ तक छिपकर भागोगे। तुम्हें फिर से दास बनना है। कोरोना के बहाने तंत्र तुम्हें फिर से दासप्रथा में लाएगा वरना तुम्हारी स्थिति कीट पतंगों जैसी है। सत्ता और समाज से पूछ रहे हैं शीतल पी सिंह।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।













.jpg&w=3840&q=75)








