जायंट लेदरबैक दुनिया की सबसे बड़ी कछुआ प्रजाति है. इनका आकार बहुत बड़ा और वजन 700 किलोग्राम से भी ज़्यादा हो सकता है. ये कछुए हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करते हैं लेकिन जब इन्हें प्रजनन करना होता है, अंडे देने होते हैं तो ये उसी स्थान पर वापस आते हैं जहाँ इनका जन्म हुआ था. लेदरबैक कछुओं का सबसे बड़ा प्रजनन स्थल, गैलेथिया की खाड़ी में है जोकि ग्रेट निकोबार द्वीप में स्थित है.
यह वही द्वीप है जहाँ नरेंद्र मोदी सरकार ने 81,000 करोड़ की लागत से ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की शुरुआत की है. इस प्रोजेक्ट के लिए 166 वर्ग किमी ज़मीन का अधिग्रहण किया जाना है जिसमें से 130 वर्गकिमी पर घने जंगल हैं. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए कम से कम 10 लाख पेड़ों को काटा जाएगा. ये पेड़ उस जंगल का हिस्सा हैं जो यहाँ लाखों सालों से अनछुआ बना हुआ था. इस मौलिकता के कारण ही ग्रेट निकोबार में कई पेड़ पौधों और जीव जंतुओं की ऐसी प्रजातियां पायी जाती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं पायी जाती. यही स्थानिक विविधता इस क्षेत्र को धरती के सबसे सुंदर और जैव-विविधता से परिपूर्ण स्थान के रूप में स्थापित करती है.
संकटग्रस्त (इंडेंजर्ड) जायंट लेदरबैक समुद्री कछुओं के अतिरिक्त यहाँ तमाम अन्य स्थानीय प्रजातियां भी पायी जाती हैं. जैसे- निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक (बंदर) और नारियल खाने वाले विशाल केकड़े जिन्हें रॉबर क्रैब्स कहा जाता है. ये कोई सामान्य प्रजातियां नहीं हैं इनका विकास इन दुर्लभ और अनछुए जंगलों और भीड़ से दूर समुद्री किनारों में हुआ है. लाखों सालों से ये प्रजातियां इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी की रखवाली कर रही हैं.
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इसके अलावा दुर्लभ शॉम्पेन जनजाति का निवास स्थल भी है. इस जनजाति के लोगों की संख्या 300 से भी कम है. ये जनजाति इस क्षेत्र में पिछले 10 हज़ार सालों से भी अधिक समय से निवास कर रही है और आज भी सहज तरीके से शिकार करके अपना भरण पोषण करती है. बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई यह जनजाति ‘विशेष रूप से संवेदनशील जनजातियां’(PVTGs) के रूप में वर्गीकृत है. PVTGs के अंतर्गत देश की कुल 705 जनजातियों में से 75 शामिल की गयी हैं.
पूरा अंडमान निकोबार द्वीप समूह पारिस्थिकीय रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है. यहाँ किसी भी किस्म का निर्माण खतरनाक साबित हो सकता है. पूरा द्वीप समूह ‘रिंग ऑफ़ फायर’ के अंतर्गत आता है, यानी ऐसा क्षेत्र जो भूकंपीय गतिविधियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. यह क्षेत्र सर्वाधिक खतरनाक सीज़मिक जोन-5 के अंतर्गत आता है. लेकिन सरकार ज़िद पर अड़ी हुई है. न उसे पर्यावरण को होने वाले संभावित नुकसान का कोई डर है और न ही शॉम्पेन और निकोबारीज जैसे जनजातियों के विलुप्त होने का भय. सरकार की निगाह में सिर्फ़ व्यापार और पर्यटन ही महत्त्वपूर्ण है. 
इसीलिए मोदी सरकार की योजना है कि यह द्वीपसमूह जहाँ अभी मात्र 10 हज़ार जनसंख्या है उसे बढ़ाकर 3 लाख से अधिक करना. इसके पीछे सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का भी हवाला दे रही है लेकिन असल बात ये है कि यह सिर्फ़ व्यापारिक हित का मामला है. यह एक ऐसा व्यापारिक हित है, ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है जिसमें धन की व्यवस्था सार्वजनिक बैंकों द्वारा की जाएगी, यानी जनता के पैसे से की जाएगी लेकिन जब बात मुनाफे की आएगी तो फ़ायदा सिर्फ़ चंद प्राइवेट लोगों को होगा.

ऐसी जगह पर जो भी बस्ती बसाई जाएगी, जो भी आवास निर्माण होगा वो इतना अधिक महंगा होगा कि आम व्यक्ति उसे कभी वहन नहीं कर सकेगा. मतलब यह है कि भारत के आम लोगों के पैसे से इस देश के अमीरों के लिए आलीशान आवास बनाये जाएँगे. मतलब यह है कि भारत की लाखों वर्ष पुरानी परिस्थितिकी और विविधता को अमीरों के लिए बर्बाद किया जाएगा, उनके हिसाब से ढाला जाएगा जिससे पैसे वाले लोग अपनी छुट्टियाँ यहाँ इन स्थानों पर बिता सकें.

सरकार अपने इस व्यावसायिक मक़सद को सामने नहीं रख रही है. सरकार का कहना है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट विकसित भारत का हिस्सा होगा; इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद भारत समुद्री सुरक्षा में और मजबूत होगा; प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत में ट्रिपल-E क्लास के जहाज़ों जैसे सबसे बड़े कार्गो जहाज़ों के आवागमन को सुनिश्चित करेगा जिससे भारत इस मामले में सिंगापुर, मलेशिया और कोलंबो आदि को टक्कर दे सकेगा. यह सच है कि गैलेथिया की खाड़ी के पास जहाँ ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनाया जाना है वो जगह मलक्का की खाड़ी से मात्र 70-72 किमी ही दूर है. यानी भारत का पोर्ट ऐसी जगह के पास बनेगा जहाँ से दुनिया का लगभग 30% समुद्री व्यापार होता है. 
एक अनुमान के अनुसार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के अभाव में अभी बड़े कार्गो सीधे भारत नहीं आ पाते और उन्हें सिंगापुर और कोलंबो आदि में खाली किया जाता है और तब भारत लाया जाता है जिसकी वजह से भारत को लगभग 200 मिलियन डॉलर का नुकसान हर साल होता है. यह पोर्ट बनने से यह नुकसान बच जाएगा.
लेकिन सवाल यह है कि यदि नुकसान की दर यही है तो आने वाले 100 सालों में भारत को 20 बिलयन डॉलर का नुकसान होगा. यानी लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए. मेरी नजर में यह वो कीमत नहीं जिसके लिए लाखों साल पुराने जंगलों को काट दिया जाये. दुनिया की दुर्लभतम प्रजातियों को विलुप्त होने दिया जाय अनमोल कोरल रीफ को नष्ट होने दिया जाय. शॉम्पेन जैसी जनजाति के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया जाय जो हजारों सालों से इस धरती पर मौजूद है.

नरेंद्र मोदी सरकार की समस्या यह है कि वो हर अनमोल चीज को जिसे वो समझ नहीं पाती उसे पैसे, रूपये और रोज़ी-रोटी के तराजू पर तौलती है. उसके लिए पारिस्थिकीय मूल्य, जनजातीय मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य आदि मूल्यों की न कोई समझ है और न ही उसके महत्व का कोई ज्ञान है.

अपने तरीके की ‘भारत दुकान’ बनाने के लिए मोदी सरकार, देश के आम लोगों की राष्ट्रीय भावनाओं का दोहन कर रही है. लोगों से कहा जा रहा है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है जबकि असलियत यह है कि यह प्रोजेक्ट एक बड़ा व्यावसायिक प्रोजेक्ट भर है और कुछ नहीं. 81 हज़ार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट में 40 हज़ार करोड़ रुपया ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्ट पर ही खर्च किया जाना है.166 वर्ग किमी ज़मीन में से मात्र 5 वर्ग किमी भूमि में सिविल और मिलिट्री एयरपोर्ट और पॉवर प्लांट बनकर तैयार हो जाने हैं. बाक़ी पूरी ज़मीन कॉमर्शियल हितों के लिए इस्तेमाल की जानी है. इसमें राष्ट्रीय महत्व का कुछ नहीं सिर्फ़ आर्थिक और व्यापारिक महत्व का है.
मोदी सरकार जिस तरह की चालाकी की बात कर रही है वो देश के लिए, यहाँ के लोगों के लिए, खतरे की घंटी है. निकोबार द्वीप समूह सुंडालैंड जैवविविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, जोकि दुनिया के सबसे समृद्ध पारिस्थिकीय क्षेत्रों में से एक है. सरकार इस क्षेत्र को तबाह करके, यहाँ के मैंग्रोव वनों को तबाह करके, लेदरबैक समुद्री कछुओं की पूरी सैंक्चुअरी को बर्बाद करके कह रही है कि इसकी भरपायी के लिए वो हरियाणा में पेड़ लगाएगी. ऐसी नाकारा और बेशर्म सरकार भारत के लोग डिजर्व नहीं करते थे, फिर भी उन्हें ऐसा प्रतिनिधि मिला. जिस सरकार को पौधारोपण और जंगल निर्माण में अन्तर नहीं पता, जो सरकार हरे भरे लाखों साल पुराने सदाबहार उष्णकटिबंधीय वनों की तुलना हरियाणा में चलाई जाने वाली पौधरोपण ड्राइव से करने लगे वो सरकार फ़ौरन गिर जानी चाहिए. ऐसे सरकार से तुरंत इस्तीफ़ा मांगा जाना चाहिए.
पर्यावरण को लेकर सरकार की नासमझी इस देश के लोगों की जान पर खतरा बनी हुई है. जिस नाकामी से मोदी सरकार ने राजधानी दिल्ली के वायु प्रदूषण को सम्भाला है, जिस नाकामी से दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान और तमाम अन्य राज्यों में जल संकट का सामना किया जा रहा है उससे यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी सिर्फ़ चुनाव की भाषा जानते हैं वे लोककल्याण की भाषा से अभी तक परिचित नहीं हुए हैं.
मोदी काल की ख़ासियत ही ये है कि यहाँ संस्थाएं अपना काम नहीं करतीं, सरकार की बांहों में बाहें डालकर खड़ी रहती हैं और नागरिकों की तकलीफों को, उनकी शिकायतों को अनदेखा कर देती हैं. संस्थाओं की ये गैर ज़िम्मेदारी, सजग नागरिकों में अभूतपूर्व थकान पैदा करती है. जिस काम के लिए उन्हें नियुक्त किया गया था, जिस काम को उन्हें जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ निभाना था, वो ज़िम्मेदारी और वो सजगता नागरिकों के हिस्से में आ गई है. हर क्षेत्र की तरह पर्यावरण क्षेत्र की संस्थाएं भी सरकार की बाँहों में बाहें डालकर हाँ हाँ और हाँ मिलाने में लगी हुई है. 
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान और अंडमान और निकोबार प्रशासन के तहत जनजातीय कल्याण निदेशालय ने अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई. निदेशालय और इससे संबद्ध संस्था अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति(AAJVS), द्वीपों में रहने वाले PVTGs और अनुसूचित जनजाति के लिए सामाजिक-आर्थिक विकास और कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए जिम्मेदार है. लेकिन इन दोनों संस्थाओं ने अपना काम तो किया पर बेईमानी के साथ किया है.
इन संस्थाओं का काम आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करना था लेकिन इसने मिलकर इस प्रोजेक्ट को पास करवाने में ‘सहयोगी’ की भूमिका निभाई. तमाम रीसर्च बताते हैं कि AAJVS ने शॉम्पेन जनजाति की ओर से बिना उनकी अनुमति के आदिवासियों के लिए आरक्षित भूमि के डायवर्जन की अनुमति दे दी. मतलब जो ज़मीनें, पुराने कानून ने आदिवासियों के लिए आरक्षित की थी, वो भूमि कानून की पीठ में छुरा घोंपकर छीन ली गई. स्थानीय ग्रेट निकोबार और लिटिल निकोबार ट्राइबल काउंसिल ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय से लिखित शिकायत की थी कि अंडमान प्रशासन और कल्याण विभाग ने केंद्र को एक ‘झूठी रिपोर्ट’ भेजी. 

इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि आदिवासियों के वन अधिकारों की पहचान कर उन्हें सुलझा लिया गया है, जिसके आधार पर प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंजूरी मिल गई. जबकि यह सच नहीं था. नवंबर 2022 में ही ट्राइबल काउंसिल द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र वापस ले लिया गया लेकिन सरकार ने काम नहीं रोका.

यही हाल वन्यजीव संस्थान(WII) का है. विशेषज्ञों की राय है कि इस संस्थान ने वैज्ञानिक स्वतंत्रता से समझौता किया है. पर्यावरणविदों के अनुसार किसी भी हालत में WII को जायंट लेदरबैक कछुओं और निकोबार मेगापोड पक्षियों के प्राकृतिक आवास, गैलेथिया बे वन्यजीव अभयारण्य, को डी-नोटीफाई अर्थात ग़ैर आरक्षित करने की अनुमति नहीं देना चाहिए था. पर उसने अनुमति दे दी. WII द्वारा दिए गए ‘कछुओं के लिए कृत्रिम आवास’ और ‘कोरल रीफ ट्रांसलोकेशन’ जैसे सुझाव अवैज्ञानिकता और मूर्खता से भरे थे. 
देश में वन्यजीवों के इंस्टिट्यूशनल गार्जियन और वैज्ञानिक अभिरक्षक होने के नाते संस्थान को हर हालत में इस जैव विविधता को बचाने का प्रयास करना चाहिए था. लेकिन WII ने तो जल्दबाजी में EIA(Environmental Impact Assessment) तैयार की, जिससे इस मेगा प्रोजेक्ट के विनाशकारी प्रभावों को छिपाया जा सके. इस तरह जिसे बचाने की जिम्मेदारी मिली थी उसी ने पर्यावरण की सबसे खूबसूरत कृति को डुबोने में मदद कर डाली.
रही सही कसर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(NGT) जैसी वैधानिक संस्था ने पूरी कर दी. भारत ने धीरे धीरे कानूनी विकास के सफ़र से जो कुछ भी हासिल किया है उसे यह सरकार संस्थाओं के साथ मिलकर नष्ट कर रही है. 'वेल्लोर सिटीजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (1996)' का मामला कौन भूल सकता है. इस मामले ने जो मिसाल दी उसने पर्यावरण संबंधित मामलों को लेकर कानून और न्यायालय को हमेशा के लिए बदल दिया था. इस ऐतिहासिक मामले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया कि आर्थिक विकास के नाम पर लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की बलि नहीं दी जा सकती. इसी फैसले ने 2010 में एनजीटी के निर्माण का रास्ता बनाया.
फ़रवरी 2026 में एनजीटी की 6 सदस्यीय पीठ ने परियोजना को मंजूरी प्रदान करते हुए सभी आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया. जिस संस्था का निर्माण जीवन के अधिकार(अनुच्छेद-21) को पर्यावरण से जोड़ने के लिए हुआ था. जिसका काम इस मौलिक अधिकार की रक्षा करना था उसने वो तर्क प्रस्तुत कर दिया जो उसकी कानूनी संवेदना के दायरे में ही नहीं आना चाहिए था. एनजीटी ने कहा कि यह प्रोजेक्ट भारत की रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है और साथ ही इसमें कोई भी प्रक्रियागत ख़ामी नहीं है इसलिए इसे मंजूरी प्रदान की जाती है. 
एनजीटी जिसे पर्यावरण की चिंता होनी चाहिए थी वो राष्ट्रीय सुरक्षा के जाप में लग गया और उसने आँख बंद करके WII, जनजातीय कल्याण निदेशालय और AAJVS जैसी संस्थाओं पर भरोसा जताया जो पहले से ही जल्दबाजी में प्रोजेक्ट पास करवाने में लगी थीं. इस तरह एक विनाशकारी प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई, और भारत की लाखों साल पुरानी परिस्थितिकीय विरासत को ध्वस्त करने का लाइसेंस सबको मिल गया. कलकत्ता हाईकोर्ट में अभी भी सुनवाई हो रही है. देखना होगा कि यह संवैधानिक न्यायालय अनुच्छेद-21 की रक्षा कर पाता है या नहीं. पर कहा नहीं जा सकता कि क्या होगा! क्योंकि सरकार बेलगाम है, मनमर्जी कर रही है और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश को पर्यावरणविद नापसंद हैं. उन्हें लगता है कि पर्वयावरण एक्टिविस्ट विकास के ख़िलाफ़ हैं. 
लेकिन सवाल ये उठता है कि जो कुछ ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के नाम पर हो रहा है उसे विकास कहना चाहिए या संसाधनों की ऐतिहासिक लूट? सवाल यह भी है कि क्या चुनी हुई सरकार को जिसे सिर्फ़ 5 साल के लिए चुना जाता है उसे लाखों साल पुराने जंगलों को काटने का अधिकार है भी या नहीं? सर्वोच्च न्यायालय को भी यह अधिकार है या नहीं कि वो लाखों साल पुराने जंगलों, पारिस्थितिकीय तंत्रों को उजाड़ने की अनुमति दे? साथ ही कोई भी ऐसा कानून, जो सरकारों या अदालतों को ऐसी शक्ति देता है उसे कानून के रूप में स्वीकार भी किया जाय या नहीं? इस पर बहस अब बहुत जरूरी हो गयी है.