भारतीय जनता पार्टी एक ऐसा अनोखा राजनैतिक दल है जिसमें नासमझी को योग्यता के रूप में ना सिर्फ़ स्वीकार किया जाता है बल्कि उसे प्रोत्साहित भी किया जाता है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन इसी प्रोत्साहन के एक और उदाहरण हैं। जिन लोगों को जिला इकाई तक सीमित रखा जाना चाहिए था उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। यह पार्टी का ‘अंदरूनी मामला’ है, ऐसा कहकर बात को टाला नहीं जा सकता क्योंकि अध्यक्ष जी जो कह और कर रहे हैं उससे पूरे देश में माहौल ख़राब हो रहा है।

8 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी, उत्तराखंड के रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया। दो दिन बाद 10 अगस्त को एक हिंदुत्व संगठन ने उस मैदान में ‘शुद्धिकरण’ किया। खड़गे इस बात से बहुत आहत हुए, उन्हें लगा कि वो दलित हैं इसलिए उनके जाने के बाद मैदान का शुद्धिकरण किया गया। भारत की सबसे पुरानी और स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्त्व करने वाली पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ इतना बुरा बर्ताव किया गया और केंद्र और उत्तराखंड की बीजेपी सरकारों ने उन अपराधियों के साथ बहुत दिनों तक कुछ नहीं किया। इन सरकारों के इस बर्ताव से खड़गे और भी आहत हुए। फिर राहुल गांधी को लगा कि यह बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए कि सरकार अछूत प्रथा को बढ़ावा दे। 

अज्ञात के ख़िलाफ़ FIR क्यों?

राहुल गांधी की चेतावनी के बाद और घटना घट जाने के लगभग एक महीने बाद 8 सितंबर को हल्द्वानी कोतवाली में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196, 299 और SC/ST Act के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। कांग्रेस ने इसका भी विरोध किया क्योंकि फोटो और वीडियोज से यह साफ़ था कि इसमें कौन लोग शामिल हैं इसके बाद भी FIR अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज की गई। बेशर्मी का आलम यह कि राहुल गांधी ने इस अस्पृश्य व्यवहार के ख़िलाफ़ जब आवाज़ उठाई तो उन्हीं के ख़िलाफ़ एक FIR दर्ज कर दी गई। खैर राहुल गांधी तो इस व्यवस्था से पिछले कई सालों से लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे लेकिन यहाँ मामला काफी गंभीर है।
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दलितों के साथ अस्पृश्यता

संविधान के अस्तित्व में आ जाने के बाद भी दलितों के साथ अस्पृश्य व्यवहार कोई नई घटना नहीं है इसीलिए इसको रोके जाने के लिए समय-समय पर महत्वपूर्ण क़दम उठाए गए जैसे- राजीव गांधी सरकार द्वारा लाया गया एससी/एसटी एक्ट। इसके बाद भी तमाम लोगों की मानसिकता में बदलाव नहीं लाया जा सका है। इसलिए जैसे ही मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता द्वारा यह मुद्दा राज्यसभा में उठाया गया था, उसके तुरंत बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तराखंड के सीएम धामी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को इसे लेकर खड़गे जी का साथ देना चाहिए था और ऐसे लोगों को हतोत्साहित करना चाहिए था जो आज भी दलितों के साथ अस्पृश्य व्यवहार को धर्म का काम समझते हैं। लेकिन न ही नरेंद्र मोदी ने एक शब्द बोला और न ही देश के गृहमंत्री ने। आहत होकर खड़गे जी को कहना पड़ा कि “अगर मोदी-शाह दलित होते और उनके साथ ऐसा हुआ होता, तो क्या वे तब भी ऐसे ही चुप बैठे रहते?" खैर इसके बाद भी मोदी कुछ नहीं बोले। ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि ‘विपक्ष हतोत्साहन विभाग’ के मुखिया हैं।
 
खड़गे जी द्वारा बार बार सवाल उठाए जाने के बावजूद इन दोनों शीर्ष नेताओं का चुप रहना शायद एक बड़ा संदेश था जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के मुख से बाहर भी आ गया। 9 सितंबर को हल्द्वानी से ही नवीन ने कहा कि "इस धरती (उत्तराखंड) से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एक राजनीतिक खेल खेलने का काम किया है। खड़गे जी की जो यह विभाजनकारी राजनीति और सोच है, वह उत्तराखंड की पवित्र भूमि को अपवित्र कर ही नहीं सकती।" नितिन नवीन का यह वक्तव्य बता रहा है कि उनकी सोच, उनकी पार्टी की सोच और प्रधानमंत्री की सोच क्या है। खड़गे जी ने बिल्कुल सही कहा कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी दलित होते तो समझते कि अस्पृश्यता का अर्थ क्या है।

नितिन नवीन की स्थितियां मल्लिकार्जुन खड़गे से बिल्कुल उलट रही हैं। नितिन नवीन ‘परिवारवाद’ के उत्पाद रहे हैं। चुनावी राजनीति में ही वो तब आए, जब उनके पिता और बीजेपी के फाउंडिंग मेम्बर नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा का निधन हुआ।

परिवारवाद से राजनीति में आए नितिन नवीन?

पिता की मौत के बाद बीजेपी के परिवारवाद के स्वभाव ने नितिन नवीन को तत्कालीन पटना पश्चिम से उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया और पिता की विरासत की वजह से वो जीत गए, आगे भी जब परिसीमन हुआ उसके बाद यह सीट ‘बांकीपुर’ बनी तो नवीन यहाँ से भी जीत कर विधायक बने रहे और 2025 तक जीतते रहे, विधायक बने रहे। लेकिन नवीन के क़द और राजनैतिक प्रतिष्ठा के बारे में सोचें तो जैसे ही उन्होंने राज्यसभा में चुने जाने के बाद इस्तीफ़ा दिया और यहाँ उपचुनाव हुआ तो उनका उम्मीदवार 20,000 वोटों से चुनाव हार गया। उनके पिता ने जो इमेज बनायी थी, वैसी इमेज, वैसा क़द बनाने में वे नाकाम रहे। नितिन नवीन की परवरिश एक समृद्ध और पढ़े लिखे कायस्थ परिवार में हुई। कभी उन्हें पटना का शहरी माहौल मिला तो कभी दिल्ली का कॉस्मोपॉलिटन माहौल। इसलिए उन्हें कभी समझ में नहीं आयेगा कि एक दलित के साथ होने वाला अस्पृश्य व्यवहार कैसा होता है। मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे लोगों का जीवन तो नवीन की समझ से ही परे है।

मल्लिकार्जुन खड़गे एक बेहद गरीब परिवार से थे उनके पिता मज़दूर थे जिन्होंने बड़ी मेहनत से खड़गे को पढ़ाया लिखाया और आगे बढ़ाया। वो सिर्फ़ 7 साल के थे जब क्रूर दंगाइयों ने उनके घर में आग लगा दी थी जिसके कारण उनकी माँ और बहन दोनों की जान चली गयी थी। उनका जीवन लगातार जटिल होता जा रहा था। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और मजदूर यूनियन के नेता बने इसके बाद उन्होंने कांग्रेस जॉइन की। भारत के वर्तमान गृहमंत्री जब 8 साल के रहे होंगे तब मल्लिकार्जुन खड़गे पहली बार विधायक बनकर विधानसभा पहुँचे थे (1972)। इसके बाद 2009 तक वो कभी विधायकी का चुनाव नहीं हारे। फिर सांसद बने और आज देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यदि खड़गे जी को अस्पृश्यता का सामना करना पड़ रहा है और पीएम और गृहमंत्री चुप हैं और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष पलट कर उल्टा खड़गे जी को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं घट सकती।
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अस्पृश्यता रोकने की चिंता नहीं!

नितिन नवीन को उत्तराखंड की ‘पवित्र’ भूमि की चिंता है लेकिन उस जगह पर होने वाली अस्पृश्यता की प्रैक्टिस रोकी जाये इसकी कोई चिंता नहीं है? आखिर क्यों? वैसे मेरी समझ में नहीं आता कि यह पवित्र भूमि क्या होती है? एक भारतीय नागरिक होने के नाते मेरे लिए सम्पूर्ण भारत पवित्र है, यहाँ का एक एक कण पवित्र है, यहाँ के लोग पवित्र हैं, यहाँ का संविधान और यहाँ के आज़ादी के नायक पवित्र हैं। लेकिन नवीन को सिर्फ़ उत्तराखंड की भूमि की पवित्रता की चिंता है? आखिर क्यों? अगर उन्हें इस भूमि की पवित्रता इतनी ही प्यारी है तो वो बतायें कि जब खड़गे जी के भाषण के बाद रामलीला मैदान पवित्र किया गया तो उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया? वे किसके इशारे पर चुप किये गए थे? क्या हल्द्वानी का रामलीला मैदान हर सप्ताह, हर महीने शुद्ध किया जाता है? कोई रिकॉर्ड है? अगर नहीं है तो एक दलित नेता के वहाँ जाने के बाद ऐसा क्यों किया गया? इतनी नफ़रत क्यों है दलितों से? क्या जिस जगह पर दलित नेता भाषण देंगे वहां लफंगे लोग उसे धोने पहुँच जायेंगे?

अगर नवीन को उत्तराखंड की पवित्रता की इतनी ही चिंता है तो बतायें वहाँ अंकिता भंडारी जैसी लड़कियाँ बलात्कार और हत्या की शिकार क्यों और कैसे होती हैं? क्या अंकिता के बलात्कार और हत्या के बाद ‘देवभूमि’ की पवित्रता बची रह गई? 

जब उत्तरकाशी में एक दलित को मंदिर में प्रवेश से रोका गया तो पवित्रता का क्या हुआ? क्या हुआ इस पवित्रता का जब एक अनुसूचित जनजाति की महिला प्रधान के गले में जूतों की माला पहनाई गई?

धार्मिक पवित्रता का ज्ञान देने वाले लोग कौन?

मेरी समझ से बाहर है कि धार्मिक पवित्रता का यह सारा ज्ञान बीजेपी समर्थक और बीजेपी के ऊँची जाति से आने वाले लोगों द्वारा ही क्यों फैलाया जाता है? आंबेडकर, ज्योतिबा फूले, सावित्रीबाई फूले और खड़गे जैसे लोग पवित्रता पर बात क्यों नहीं कर पाते? शायद इसलिए क्योंकि ये अवधारणा ही झूठी है। अगर ईश्वर है तो वो हर जगह है (शंकर, 8वीं शताब्दी) इसका किसी स्थान विशेष से मतलब नहीं। रामजन्मभूमि अयोध्या को ही ले लीजिए। जून 2026 में अयोध्या के एक प्रसिद्ध कथावाचक पवनदेव महाराज पर एक महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया और FIR दर्ज की गई। महिला ने उन पर आरोप लगाया था कि वे उसे तीर्थयात्रा के बहाने अयोध्या लाए, उसके साथ यौन उत्पीड़न किया और एक फर्जी शादी का नाटक रचा। इसी तरह, कृष्ण कांताचार्य(अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर के महंत) जैसे पुजारियों को भी मंदिर परिसर के भीतर महिला भक्तों को बंधक बनाने और उनका यौन शोषण करने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। बाद में महंत जी को 10 साल की सजा हुई। नितिन नवीन को बताना चाहिए कि क्या इन घटनाओं से अयोध्या की पवित्रता को ठेस पहुँची या नहीं? अगर ठेस पहुँची है तो क्या इन घटनाओं का ज़िक्र नहीं किया जाना चाहिए? ऐसे मामलों में न्यायालय को भी बीच में नहीं आना चाहिए? क्या स्वयं राम आकर इन महिलाओं के साथ न्याय करेंगे? क्या राम इनका मुकदमा लड़ेंगे?

पवित्रता शब्द से इतना लगाव है तो नितिन नवीन जी को एक और पवित्र भूमि चित्रकूट को देख लेना चाहिए, अभी अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच ही कम से कम दो ऐसे मामले हैं जिनमें बलात्कार की घटनाएँ सामने आई हैं। एक मामले में एक 19 साल की महिला का सामूहिक बलात्कार हुआ और दूसरे मामले में एक 17 साल की लड़की का बलात्कार हुआ जिसने बाद में आत्महत्या कर ली। क्या इन बातों से चित्रकूट की पवित्रता को ठेस नहीं पहुंची? क्या इन बातों का ज़िक्र ना किया जाये? क्या इन बातों में नितिन नवीन को किसी किस्म की राजनीति की बू आती है? इन घटनाओं पर ये सभी चुप क्यों हो जाते हैं? क्या ये चुप्पी राजनैतिक नहीं है? क्योंकि सुविधा की राजनैतिक चुप्पी से दुर्गन्ध आती है।
हर स्थान को लेकर अपनी कहानियाँ और धार्मिक विश्वास होते हैं, परंपराएं होती हैं लेकिन ये विश्वास और परंपराएं जो सदियों से चली आ रही हैं इन क्षेत्रों के लोगों का चरित्र निर्माण कर दें यह जरूरी नहीं है इसीलिए संविधान बनाया गया और कानून का शासन स्थापित किया गया। जिससे अयोध्या हो या देवभूमि उत्तराखंड या फिर चित्रकूट, पुरी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, या बालाजी, कहीं भी अपराध होता है तो उससे निपटने का काम धर्म और मनुस्मृति के हाथों ना छोड़कर कानून द्वारा किया जाये। किसी स्थान की पवित्रता की अवधारणा उसे अपराधमुक्त क्षेत्र के रूप में स्थापित नहीं करती। किसी स्थान को पवित्र कह देने से काम नहीं चलेगा। धर्म कोई भी हो अगर उसकी चहारदीवारों के अन्दर होने वाले पापों को कानून की सीमा से मुक्त कर दिया जाता है तो वो अपराध और शोषण के अड्डे बन जाते हैं। भारत समेत पूरी दुनिया में और पूरे विश्व के तमाम धर्मों में इसके उदाहरण मौजूद हैं।

मल्लिकार्जुन खड़गे का मामला उनका व्यक्तिगत मामला भर नहीं है। यह देश के करोड़ों वंचित वर्ग के लोगों का मामला है उनकी आवाज और उनके साथ होने वाले अन्याय का मामला है।

कितना भी राजनैतिक नुकसान क्यों ना हो, पीएम मोदी और अमित शाह को खड़गे समेत देश के तमाम वंचित वर्ग के लोगों से इस बात के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए कि उनके शासन में आज देश में अस्पृश्यता का घिनौना कृत्य चल रहा है। माफ़ी माँगना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मोदी और शाह ख़ुद को हिंदुत्व का सबसे ज़रूरी चेहरा समझते हैं।
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नितिन नवीन की विफलता कहाँ?

रही बात नितिन नवीन की तो वो अपने बैकग्राउंड और आसान जिंदगी की वजह से यह समझने में नाकाम रहे हैं कि भारत में भारत के लोगों से पवित्र और कुछ भी नहीं। और कोई भी व्यक्ति जो इन लोगों की गरिमा को जाति, लिंग, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर चोट पहुंचाता है उससे निपटने का काम कानून का है धर्म और धार्मिक किताबों का नहीं।

हल्द्वानी में जो पाप हुआ है वो एक हिन्दुत्त्व संगठन ‘श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास' के लोगों द्वारा ही किया गया है। अच्छा होता कि नितिन नवीन हल्द्वानी पहुंचकर इस घटना की आलोचना करते लेकिन उन्होंने वहाँ जाकर ऐसे देश को तोड़ने की मंशा रखने वाले संगठन का बचाव करते हुए एक दलित को ही घेरने की कोशिश की। नवीन को लगता होगा कि इस बात से हिंदू खुश होंगे और उत्तराखंड में वो फिर से विजयी होंगे। नवीन ग़लती कर रहे हैं। जंतर मंतर और पूरे देश में हो रही ‘छात्रों की गूँज’ यह बता रही है कि भारत बदल रहा है और अब उन्हें भी सर्वाइव करना है तो बदल जाना चाहिए।