एक बहुआयामी राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता का परिणाम था कि ‘डिकी बर्ड योजना’ के तहत 3 जून 1947 को यह घोषणा कर दी गई कि भारत 15 अगस्त 1947 से एक आज़ाद मुल्क होगा। इस आज़ादी की लड़ाई की जड़ों में आप जितना भीतर जाना चाहें जा सकते हैं। आप चाहें तो संन्यासी विद्रोह से शुरू कर सकते हैं, या फिर 1857 की क्रांति से भी जिसे कुछ लोगों ने आज़ादी की पहली लड़ाई कहा था या फिर एस एन बनर्जी द्वारा बनाई गई इंडियन एसोसिएशन से भी शुरुआत कर सकते है। लेकिन आधुनिक दुनिया भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की असली शुरुआत 1885 से मानती है क्योंकि इस साल कांग्रेस की स्थापना हुई थी। इस शुरुआत ने कंक्रीट का रूप तब धारण किया जब 1915 में महात्मा गांधी का भारत आगमन हुआ। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन की दशा और दिशा दोनों बदल दी। अब कांग्रेस सिर्फ़ एक संगठन भर नहीं था, बल्कि यह एक आंदोलन बन चुका था। पूरी दुनिया जान गई कि भारत की चेतना को बहुत ज़्यादा दिनों तक बंदी बनाकर रखना अब संभव नहीं है। 

महात्मा गांधी के भारत आगमन के कुछ सालों के भीतर ही अंग्रेज़ों को भारत से बाहर धकेलने के लिए असहयोग आंदोलन शुरू हो गया, इसकी आग गर्म ही थी कि तभी सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया और अंतिम कील ठोकने के लिए 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की शुरुआत कर दी। यह अंग्रेज़ों पर इतना मजबूत प्रहार था कि औपनिवेशिक शासन वेंटीलेटर पर आ गया। 1946 के कैबिनेट मिशन ने बची खुची औपचारिकता तब पूरी कर दी जब इसकी अनुशंषा पर आज़ाद भारत के लिए संविधान सभा बना दी गई। ब्रिटिश संसद अब इसे बहुत दिनों तक रोक नहीं सकती थी, इसलिए फ़रवरी 1947 को ब्रिटिश पीएम क्लेमेंट एटली को अपनी संसद (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) में घोषणा करनी पड़ी कि वो जून 1948 के पहले ही भारत छोड़ देंगे। लेकिन घोषणा के 10 महीने पहले ही अंग्रेज़ भारत छोड़कर हमेशा के लिए चले गए।

सांप्रदायिकता और भारत की आज़ादी

लेकिन भारत की आज़ादी की कहानी इतनी साफ़ सुथरी और निर्मल नहीं है। सांप्रदायिकता की आग ने भारत की आज़ादी को बहुत फीका कर दिया था। महात्मा गांधी ने भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ औपनिवेशिक सत्ता से नहीं लड़ी। वो लगातार दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे थे। एक औपनिवेशिक फ्रंट था तो दूसरा घरेलू फ्रंट। ‘संघर्ष-विराम-संघर्ष’ का रास्ता अपनाते हुए गांधी एक तरफ़ खुलकर अहिंसात्मक संघर्ष शुरू कर चुके थे। तो दूसरी तरफ़ आज़ादी की ओर बढ़ रहे भारत को ‘असली’ आज़ादी के लिए तैयार भी कर रहे थे। इस तैयारी में उनका काम था देश को जातीय शोषण की बीमारी से मुक्त करना, दलितों के ख़िलाफ़ मंदिरों में प्रवेश पर लगे प्रतिबंधों से लड़ना, अंग्रेज़ों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए स्वदेशी का प्रचार करना आदि। महात्मा गांधी के तौर-तरीकों ने अंग्रेज़ों को झुका दिया, लेकिन वो अपने देश के सांप्रदायिक कायरों को समझाने में नाकाम रहे। इन्हीं कायरों में से एक था नाथूराम गोडसे।
ताज़ा ख़बरें
अंग्रेज़ वायसराय जिस महात्मा गांधी को ‘वन मैन आर्मी’ कहते थे उस निहत्थे अहिंसावादी की इसी कायर गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को हत्या कर दी, और यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नाथूराम गोडसे का सावरकर, संघ और हिंदू महासभा से क्या संबंध था।

भारत का मूल चरित्र धर्मनिरपेक्ष

भारत का मूल चरित्र हमेशा धर्मनिरपेक्ष ही रहा, चाहे शासन करने वाले लोग मौर्य हों या मुग़ल। 19-20 के अन्तर के साथ भारत ने अपनी धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक पहचान कभी नहीं खोई। यहाँ तक कि 1648 में जब मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने लाल क़िला बनवाया तो उसे खास धर्म निरपेक्ष अंदाज़ में बनवाया गया था। शाहजहाँ के लाल क़िले में किसी मस्जिद की योजना नहीं थी उसने जानबूझकर जामा मस्जिद को लाल क़िले से बाहर बनवाया। यह अलग बात है कि बाद के अपेक्षाकृत सांप्रदायिक शासक औरंगज़ेब ने लालकिले के भीतर मोती मस्जिद (1659) बनवा दी। भारत में हर एक सांप्रदायिक कायर को कीमत चुकानी पड़ती है। औरंगज़ेब को भी अपनी सांप्रदायिकता की कीमत चुकानी पड़ी। पूरी दुनिया में अपनी विराटता और समृद्धि के लिए जाना जाने वाला मुग़ल साम्राज्य औरंगज़ेब की मौत के साथ तेजी से ढहने लगा। औरंगज़ेब की मौत के 32 सालों बाद ही 1739 में ईरानी आक्रमणकारी नादिरशाह ने कोहिनूर हीरा और मयूर सिंहासन समेत पूरी दिल्ली लूट डाली और यह मुग़ल शासन का अनाधिकारिक अंत था।

यही गलती मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने की और 1937-38 के बाद से भारत को एक अतिवादी सांप्रदायिकता में धकेल दिया गया। इसके परिणाम स्वरूप जो पाकिस्तान बनकर तैयार हुआ उसके हश्र को लेकर जिन्ना ख़ुद भी दुखी हुए थे और आज का पाकिस्तान तो लगभग जहन्नुम बन चुका है जहाँ लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को जेल में रह-रहकर क़त्ल किया जा रहा है।

पाकिस्तान अमेरिका जैसी ग़ैर-जिम्मेदार पश्चिमी ताकतों का एशियाई विस्तार बनकर रह गया है। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तान में न सिर्फ़ सत्ता सांप्रदायिक बनी रही बल्कि जो सत्ता में रहा उसने विपक्ष की हत्या को हमेशा जारी रखा। और परिणाम दुनिया के सामने है।

भारत में भी हर सांप्रदायिक कायर का यही हश्र होगा, यानी-पतन, होना निश्चित है। इसलिए इस देश में सत्ता पाने वाले हर एक राजनैतिक दल को अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम सोच समझकर बनाने चाहिए क्योंकि जब पतन आता है तो आदर और सम्मान की धज्जियाँ उड़ जाती हैं भले ही यह सब लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर ही क्यों ना हो रहा हो।

नेहरू की धर्मनिरपेक्षता  

दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव ने, जो संशोधनों के बाद भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, उसने भारत की धर्मनिरपेक्ष इबारत लिख दी थी। जिन्ना और मुस्लिम लीग के कुकर्मों से सीख लेकर भारत ने एक धर्मनिरपेक्ष संविधान का निर्माण किया। किसी भी हालत में देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से समझौता नहीं किया गया, जिससे सांप्रदायिक कायरों को रोका जा सके; लेकिन महात्मा गांधी की हत्या ने यह साबित कर दिया कि ये कायर इस देश की प्रगति को रोकने में, इस देश को पीछे की ओर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
विमर्श से और
दशकों तक हिंदू महासभा, आरएसएस और कुछ हद तक जनसंघ इस देश के माहौल को सांप्रदायिक बनाने में लगे रहे। इन लोगों ने धर्म को सांप्रदायिकता में तब्दील करने की भरपूर कोशिश की। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। यह सब इसलिए क्योंकि भारत में कई धर्मों का एकसाथ रहना कोई नई बात नहीं थी। धार्मिक मसलों को लेकर जो झगड़े होते भी थे उन्हें लोकल स्तर पर बातचीत से सुलझा लिया जाता था। राम, कृष्ण जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों को लेकर मुस्लिमों के भीतर आस्था निर्मित हो चुकी थी वहीं हिंदू बढ़चढ़कर मुहर्रम, ईद और ताजियों में हिस्सा लेते थे। सांप्रदायिक तनाव का चरित्र स्थानीय था उसे राजनैतिक आंदोलन नहीं बनाया जा सका था। ‘भारत एक खोज’ में जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं कि सांप्रदायिक झगड़ों का धर्म से कोई संबंध नहीं होता, हालांकि धर्म इन मुद्दों का बहाना बन जाता है।

'1984 तक हिंदू सांप्रदायिकता कमजोर थी'

इतिहासकार बिपिन चंद्रा कहते हैं कि “1947 के पहले और यहाँ तक कि 1984 तक हिंदू सांप्रदायिकता कमजोर ही थी। इसका कोई जनाधार नहीं था और यह कोई धार्मिक आवेश जगाए रखने में कामयाब नहीं हुई…। इनकी नारेबाजी भी भावनात्मक स्तर पर खास काम नहीं आती थी।” यहाँ तक कि 1930 के दशक का भारत भी अपेक्षाकृत सामासिक संस्कृति को प्रश्रय देने वाला और एक दूसरे की आस्थाओं को सम्मान देने वाला भारत था। 1930 के दशक में पंजाब के आर्थिक जांच बोर्ड ने एक गाँव के सर्वेक्षण के दौरान अपनी रिपोर्ट में लिखा “पक्की ईंटों की दो मस्जिदें हैं और दोनों बहुत अच्छी हालत में हैं…। जांच अधिकारियों ने मस्जिद के इन कमरों में एक हिंदू बारात को ठहरे देखा और वे अपने धार्मिक गीत भी गा रहे थे। यह जरूर है कि जब भी नमाज या अजान का वक्त होता तो वे अपना गाना बंद कर देते थे। गांव के लोग अनंतकाल से इसी तरह रहते आ रहे हैं।”

सांप्रदायिक कायरों को धर्म से कोई लेना देना नहीं है वो तो धर्म का इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिए करते हैं। ऐसे लोगों द्वारा सत्ता पर काबिज होने का ख़तरा हमेशा से था लेकिन नेहरू जैसे प्रगतिशील देशभक्तों को लगता था कि आर्थिक विकास, उद्योगों की तरक्की और विज्ञान के प्रसार से सांप्रदायिकता स्वतः कमजोर होने लगेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

एक डेविल की तरह यह लगातार देश की प्रगति को खा जाने के लिए बैठी रही। और 1984 के बाद शुरू हुए राममंदिर आंदोलन ने देश की रूह को छलनी करना शुरू कर दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनके आदर्शों से कोई वास्ता न रखने वाले, इस आंदोलन को सांप्रदायिकता की भूमि पर ले गए और 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराकर भारत को इस आग में धकेल दिया। पूरे देश में ‘हिंदू खतरे में’ से लेकर ‘मुस्लिम खतरे में’ का खेल शुरू हो गया। जब देश को आर्थिक उदारीकरण के प्रभावों का फ़ायदा उठाना था तब कुछ लोगों ने मिलकर देश को सांप्रदायिक तनाव में झोंक दिया। लेकिन इसके बाद भी भारत के लोगों ने इन्हें पूरो तरह सत्ता में आने नहीं दिया। लेकिन 2010-11 में शुरू हुए तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बीजेपी को वो मौक़ा दे दिया जिसकी तलाश उसके मातृ संगठन आरएसएस को 90 सालों से थी।

नरेंद्र मोदी सरकार

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में बीजेपी सत्ता में आ गई। उसे पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। अपनी सांप्रदायिक भूख को मिटाने के लिए आरएसएस बीजेपी ने अपने कार्यक्रम शुरू कर दिए। गोमांस के झूठे दावे को लेकर मुसलमानों पर हमले शुरू हो गए, मुस्लिम फ़ेरी वालों को पीटा जाने लगा, मवेशियों को ले जाने वाले मुस्लिमों की लिंचिंग शुरू हो गई। बीजेपी शासित राज्यों में मुस्लिम युवकों को टारगेट करने के लिए ‘लव-जिहाद’ कानून बनाये जाने लगे जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह पता ही नहीं कि भारत में लव-जिहाद जैसी कोई चीज है भी या नहीं। जब लोगों ने इन सब शोषणों के विरुद्ध संस्थाओं में जाना शुरू किया तो संस्थाओं को बर्बाद किया जाने लगा। न्यायालयों में जस्टिस शेखर यादव जैसे लोगों को बिठाया जाने लगा जो खुलकर सांप्रदायिक कायरता की बातें कर रहे थे। जब लगा कि पूरे देश के विपक्ष को ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स के बहाने जेल में ठूँस दिया जाएगा तो लोगों ने चुनाव की ओर रूख किया जिससे इन्हें सत्ता से बाहर किया जा सके। लेकिन यहाँ भी चुनाव आयोग से साँठ-गाँठ करके उसकी निष्पक्षता और उसकी संवैधानिक पवित्रता को बर्बाद कर दिया गया। यह सब वही लोग कर रहे थे जिनके पूर्वजों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।
बेहिसाब भ्रष्टाचार, नेहरू की बनाई हुई कंपनियों को बेचने से लेकर देश के संसाधनों को दो उद्योगपतियों के बीच बांटने का काम जोरो-शोरों पर था। लेकिन देश का युवा जाग नहीं रहा था। उसे ये सबकुछ भारतीय संस्कृति का हिस्सा समझ में आ रहा था। तभी पता चला कि इस सरकार के कार्यकाल में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक हो रहे हैं। लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लगातार अखिल भारतीय प्रयासों (भारत जोड़ो यात्रा, भारत न्याय यात्रा, छात्रों की गूँज) और युवाओं की चिंता ने नीट-2026 पेपर लीक ने एक आधुनिक आंदोलन को जन्म दिया। जंतर-मंतर में कुछ ही दिनों के भीतर नरेंद्र मोदी की अरबों-खरबों रुपए खर्च करके बनाई गई ‘झूठी इमेज’ को आईना दिखाया गया। कुछ उत्साही युवाओं ने उन्हें गालियाँ भी दीं जिन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन युवाओं ने जिस किस्म का इनोवेटिव प्रतिरोध किया उसकी गूँज पूरी दुनिया में गई। अब यह सरकार भौचक्की है और तमाम सांप्रदायिकों की तरह अपने पतन की ओर अग्रसर है। अब बहुत दिन नहीं बचे हैं जब यह सत्ता से बाहर निकलकर सड़कों की ख़ाक छानेंगे और इन पर भारत की अदालतों में मुक़दमें चलेंगे और दोषी पाये जाने पर सजायें होंगी।

 भारत के लिए सीख

मेरी नजर में हमारे पूर्वज जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी वो हमसे कहीं ज्यादा बेहतर और सतर्क थे। उन्होंने कभी इन्हें अपने आसपास नहीं फटकने दिया। 1938 में कांग्रेस के 51वें, हरिपुरा अधिवेशन में जब सुभाष चन्द्र बोस को अध्यक्ष चुना गया तो उन्होंने हिंदू-महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्यों को गाँव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कहीं पर भी कोई भी कांग्रेस का पद ग्रहण करने पर पाबंदी लगा दी थी।

यह सीख आज के भारत के लिए भी है। अगर भारत को पाकिस्तान की राह पर नहीं जाना है, पतन की ओर उन्मुख नहीं होना है तो ऐसे लोग जिनका हथियार सांप्रदायिकता है, जिनका शक्ति स्रोत सांप्रदायिकता है, जिनमें सिर्फ़ बाँटने का हुनर है, जो जिम्मेदारी मांगे जाने पर नाराज हो जाते हैं और ख़ुद को भगवान का अवतार समझ बैठे हैं, नॉन-बायोलॉजिकल बन रहे हैं उन्हें हर हाल में केंद्रीय सत्ता ही नहीं, बोस की तरह फैसले लेकर इन्हें गाँव के बीडीसी सदस्य से लेकर सीएम, PM किसी पद तक नहीं पहुँचने देना चाहिए वरना यह देश की आज़ादी का अपमान होगा, सभी की आज़ादी का, भारत के उत्थान का, धर्म निरपेक्ष आदर्शों के लिए फाँसी पर चढ़ जाने वाले भगत सिंह और 10-10 सालों तक जेल में रहे नेहरू समेत तमाम देशभक्तों का अपमान होगा।