चंद्रचूड जब सीजेआई थे तो मोदी उनके घर पूजा करने पहुंच गए थे। फाइल फोटो
आजसे लगभग 3 साल पहले 20 मार्च 2023 कोस्वतंत्र कश्मीरी पत्रकार इरफान मेहराज को नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी(NIA) ने UAPA केतहत गिरफ्तार किया था. तीन साल पूरे होने के बाद भी देश के काबिल अफसरों सेसुसज्जित NIA ऐसा कुछ पेश नहीं कर सकी है जिससे कमसे कम ट्रायल तो शुरू हो सके. बिना ट्रायल के सालों तक, सिर्फ़ शक के आधार परपत्रकारों, छात्रों और समाजसेवियों को जेल में बंद रखना, किस तरह का चलन है? क्या यह नए वाले भारत का नयाचलन है? क्या इस नए चलन में न्यायपालिका भी बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही है? क्या न्यायपालिकाभूल चुकी है कि उसका चरित्र सरकारी नहीं बल्कि नागरिक है. क्या नागरिकों के मूलअधिकारों की कीमत पर सरकारी वकील के बहानों या दलीलों पर आश्रित रहकर संवैधानिक अधिकारोंकी अनदेखी करना ठीक है?
शायद यह वो नहीं जिसकी आशा संविधान ने न्यायपालिका से कीथी. पर दुर्भाग्य से यह बार बार हो रहा है. सरकार की नीतियों से असहमति और उसके लोकतांत्रिकविरोध की सीधी परिणति जेल में भेजा जाना हो गया है जोकि भारतीय लोकतंत्र का आधारकभी नहीं था और इसके लिए किसी भी न्यायिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है. जिस तरहसिर्फ़ अफवाहों, झूठ और शक के आधार पर दमन की मंशा केसाथ केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक को लगभग 6महीनों तक जेल में बंद रखा यह औपनिवेशिक भारत का रूप है लोकतांत्रिक भारत काबिल्कुल भी नहीं.
सत्ता से चिपके रहने की मानसिकता वाली वर्तमान सरकार से कुछ भी आशा करना बेमानी है लेकिन न्यायपालिका का क्या? क्या उससे भी आशा न की जाए? न्यायपालिका से तो आशा की ही जासकती है. जिस तरह अनुच्छेद 19(1)(a) मेंदी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन हो रहा है, जिस तरह इसे लेकर देश और दुनिया भर में तमाम रिपोर्ट्स छप रही हैंन्यायपालिका को सतर्क हो जाना चाहिए. अनुच्छेद-19(2) के बहाने देश में दमन को प्रोत्साहन दिया जा रहा है इसे तुरंत रोकाजाना चाहिए. इसे कौन रोकेगा अगर न्यायपलिका नहीं तो?
संविधान तो आज भी है वैसे ही डट कर खड़ा है, परेशानी सिर्फ़ न्यायपालिका की है, संविधान की रीढ़ आज भी सीधी और व्यवस्थित है. यदि संविधान लागू होने के बिल्कुल शुरुआती दिनों की बात करें तो भी, 1950 में ही सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसले देकर अपनी मंशा और संविधान की अंतर्निहित बात को स्पष्ट कर दिया था. भारत के प्रारंभिक संवैधानिक दौर में, प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय दिए.
बृजभूषण मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा पूर्व-सेंसरशिप थोपनाअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन है, और कहा कि ऑर्गनाइज़र मैगज़ीन को दिया गया आदेश असंवैधानिक था. ऑर्गनाइज़र अतिवादी दक्षिणपंथी मैंगज़ीन है जो हिन्दुत्ववादी संगठन आरएसएस से जुड़ी हुई है. यह कोई साफ़-सुथरी मैगज़ीन नहीं है बल्कि बेहद रूढ़िवादी पत्रिका है जिसने महात्मा गांधी, नेहरूसे लेकर डॉ अंबेडकर की भी बहुत छिछली आलोचना की थी. यह पत्रिका खुलेआम संविधान के ऊपर मनुस्मृति की वकालत करने वाली और हिंदू मुस्लिम एकता की खुली विरोधी पत्रिका रही है और आज भी है. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करतेहुए पत्रिका को प्रश्रय दिया.
इसी तरह 1950 में ही, रोमेश थापर मामले में अदालत ने वामपंथी जर्नल क्रॉस रोड्स पर लगे प्रतिबंध को भी निरस्त कर दिया था अदालत ने कहा कि मद्रास लोक व्यवस्था अनुरक्षण अधिनियम, 1949 की धारा 9(1A) के तहत लगाया गया यह प्रतिबंध अत्यधिक व्यापक है और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2) द्वारा निर्धारित सीमाओं से परे है. इस तरह न्यायालय ने दक्षिणपंथी और वामपंथी सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की. इन फैसलों ने यह भी सिद्ध किया कि राज्य “लोक-व्यवस्था” के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मनमाना नियंत्रण नहीं कर सकता. लेकिन आज की मोदी सरकार इस खुलेआम मनमाने नियंत्रण को अंजाम दे रही है और सुप्रीम कोर्ट चुप है. और यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ गोथेनबर्ग, स्वीडन के V-Dem इंस्टिट्यूट द्वारा जारी V-Dem रिपोर्ट-2026 के अनुसार भारत अभी भी ‘चुनावी निरंकुशता’ की श्रेणी में बना हुआ है. पहली बार भारत इस श्रेणी में 2017 में आया था. एक उदार लोकतंत्र (LDI) के मामले में भारत पिछले साल आई रिपोर्ट से 5 स्थान नीचे खिसककर 105वें स्थान पर आ पहुँच गया है. यदि संसाधनों के वितरण, समान अवसर, भेदभाव आदि के लिहाज से देखें तो भारत 179 देशों के मुक़ाबले 138वें स्थान पर है. यह स्पष्ट है कि भारत निरंतर एक कमतर लोकतंत्र के रूप में स्थापित होता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है भारत में सरकार की बदतर नीतियों की आलोचना करने वाले मीडिया वर्ग और आम लोगों से छीनी जा रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
सरकार आलोचक नागरिकों पर लगातार कंट्रोल का यह काम निर्बाध गति से इसलिए कर रही है क्योंकि सरकार को रोकने और संविधान के उद्देश्य याद दिलाने के लिए देश का सबसे बड़ा न्यायालय अपनी भूमिका नहीं निभा रहा है.
स्वतंत्र आवाज़ों को कुचला जा रहा है
न्यायपालिका लगभग अनुपस्थित है और यही कारण है कि देश की राजधानी में सरकार निर्ममता से यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (UNI) के कार्यालय में घुसकर ना सिर्फ़ उसे बंद करा देती है बल्कि मीडिया स्टाफ के साथ बदसलूकी भी करती है. यही कारण है कि सरकार सोशल मीडिया अकाउंट्स को बेहिसाब गति से बंद कर रही है. अकेले मई 2025 में 8000 एक्स (ट्विटर) एकाउंट्स बंद किए गए फिर जुलाई 2025 में 2000 से अधिक अकाउंट्स को बंद कर दिया गया इसमें प्रतिष्ठित वैश्विक प्रेस एजेंसी रायटर्स भी शामिल रही. हाल में आरटीआई एक्टिविस्ट कुणाल गोपाल शुक्ला का एक्स अकाउंट सिर्फ़ इसलिए बंद कर दिया गया क्योंकि उन्होंने एपस्टीन फाइल में आए नाम मंत्री हरदीप पुरी और उनकी बेटी हिमायनी पुरी को लेकर सोशल मीडिया में लगातार लिखा और बोला था. हर दिन उन अकाउंट्स को बंद किया जा रहा है जो सरकार की आलोचना कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर मोदी सरकार का शिकंजा क्यों
हालात बहुत ज़्यादा ख़राब होते जा रहे हैं और सरकार निरंकुश होती जा रही है. यह सब आज अचानक शुरू नहीं हुआ. पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे भारत में ‘विपक्ष’ और ‘विरोध’ के स्वरों को हर जगह से ख़त्म किया गया है. अंबानी-अडानी के मिश्रण ने इस लोकतंत्र को कैसे तबाह किया है, यह कहानी आंकड़ों में बसी हुई है. मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस समूह के पास लगभग 70 प्राइवेट न्यूज़ चैनलों का स्वामित्व है जिनको प्रतिदिन लगभग 80 करोड़ लोग देखते हैं. एक सबसे बड़ा और बेहतरीन पत्रकारिता करने वाला NDTV समूह जो अंबानी के पास नहीं था उसे जबरदस्ती अडानी समूह द्वारा ख़रीद लिया गया. इसका मतलब है कि हर दिन भारत में लगभग 100 करोड़ लोग वही देखते हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार चाहती है लेकिन सोशल मीडिया में अभी यह वर्चस्व हासिल नहीं हुआ था क्योंकिअंबानी और अडानी यूट्यूब और एक्स ख़रीद पाने की स्थिति में नहीं है इसलिए सरकारद्वारा अपनी आलोचना करने वालों के अकाउंट्स बंद करवाना शुरू कर दिया गया . सर्वोच्च न्यायालय समेत पूरा देश साफ़-साफ़ देख पा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार नागरिकों की ओर से आने वाली आलोचनाओं का गला घोंट रही है इसके बावजूद न्यायालय द्वारा इस सम्बंध में कुछ न किया जाना भारत को एक अपरिवर्तनीय अलोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर धकेल सकता है. V-Dem-2026 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 74% लोग यानी लगभग 6 अरब आबादी किसी ना किसी रूप में निरंकुश शासन के अंतर्गत जीवन यापन कर रही है. इस बढ़े हुए प्रतिशत का सबसे बड़ा कारण भारत और चीन जैसे देश हैं. रिपोर्ट के अनुसार, “2025 के अंत तक,दुनिया के पाँच सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से चार निरंकुश व्यवस्थाएँ हैं (भारत, चीन, इंडोनेशिया और पाकिस्तान), और अमेरिका तेज़ी से निरंकुशता की ओर बढ़ रहा है.” यह भयावह है.
असल में चिंता चीन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया की नहीं है. वास्तविक चिंता भारत जैसे सफल लोकतंत्र की है जो बहुत तेजी से अलोकतांत्रिक और अनुदार गतिविधियों में बढ़त हासिल करता हुआ नजर आ रहा है.
दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने भारत को 180 देशों के मुक़ाबले 151वीं रैंक देते हुए लिखा “पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, मीडिया स्वामित्व का अत्यधिक केंद्रीकरण और राजनीतिक पक्षधरता के चलते, “दुनियाके सबसे बड़े लोकतंत्र” में प्रेस की स्वतंत्रता संकट में है जिस पर 2014 से नरेंद्र मोदी का शासन है, जो भारतीय जनता पार्टी के नेता और हिंदूराष्ट्रवादी दक्षिणपंथ का प्रतिनिधित्व करते हैं.”
19वीं शताब्दी के मध्य में कार्ल मार्क्स द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर तमाम लेख लिखे गए. मार्क्स का मानना था कि -सेंसर्ड प्रेस का चरित्र स्वतंत्रता को खा जाने वाले एक मॉन्स्टर की तरह होता हैवहीं फ्री प्रेस का चरित्र तार्किक, नैतिकस्वतंत्रता को चाहने वाला होता है.
मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि किसी भी सरकार को, फ़्री प्रेस और आलोचना से होने वाली तकलीफ़ों की भरपाई भारत का संविधान और भारत के नागरिकों को नहीं करना चाहिए और यदि सरकार फिर भी ऐसा करने के लिए दबाव डाले तो सर्वोच्च न्यायालय को, बिना किसी किंतु-परंतु के, आगे आकर नागरिकों के पक्ष में, स्वतंत्र मीडिया के पक्ष में, विपक्ष और प्रतिरोध के पक्ष में संविधान कीव्याख्या करनी चाहिए न कि निरंकुशता की खेती करने वाली सरकार के पक्ष में आकर. क्योंकि सिर्फ़ इसी तरह भारत और इसके लोकतांत्रिक भविष्य को बचाया जा सकता है, जो कि नागरिक समेत इस देश की हर जिम्मेदार संस्था का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए.