फ्रैंज काफ़्का के प्रसिद्ध उपन्यास ‘द ट्रायल’ के चैप्टर-9 ‘इन द कैथेड्रल’ में ‘बिफ़ोर द लॉ’ नाम की कहानी का ज़िक्र है। इसमें एक ग्रामीण आदमी ‘कानून के दरवाज़े’ पर पहुँचता है और अंदर जाने की कोशिश करता है पर वहाँ बैठा गार्ड उसे अंदर जाने से रोकते हुए कहता है कि वैसे तो कानून का दरवाजा हमेशा खुला रहता है लेकिन फ़िलहाल तुम अभी अंदर नहीं जा सकते। वह गरीब आदमी इंतज़ार करता है और करता ही रहता है। इंतज़ार करते करते वो आसपास की हर चीज को पहचानने लगता है, यहाँ तक कि गार्ड के कोट में रहने वाले पिस्सुओं तक को पहचानने लगता है और उनसे भी दरवाज़े से अन्दर जाने की प्रार्थना करने लगता है। लेकिन सालों के इंतज़ार के बाद भी गार्ड उसे कानून के दरवाज़े के अंदर जाने नहीं देता, बार बार उसे इंतज़ार करने के लिए बोलता है। धीरे धीरे ग्रामीण आदमी की मौत का समय नज़दीक आ जाता है और वो गार्ड से पूछता है कि हर कोई कानून के दरवाज़े पर आना चाहता है लेकिन सालों से यहाँ मेरे सिवाय कोई और क्यों नहीं आया?
 
गार्ड ने जवाब दिया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि यह ‘कानून का दरवाजा’ सिर्फ़ तुम्हारे लिए बनाया गया था।

इस कहानी की बहुत सी व्याख्याएँ हो सकती हैं लेकिन जो मुझे समझ में आई वो ये कि न्याय की उम्मीद का दरवाजा गरीब/ग्रामीण/लाचार और वंचित लोगों के लिए अलग है और समृद्ध व मजबूत लोगों के लिए अलग। काफ़्का का यह उपन्यास 1925 में प्रकाशित हुआ था और जब मैं 100 सालों बाद आज के भारत और यहाँ की न्यायप्रणाली को देखती हूँ तो मुझे कानून का दरवाजा वैसा ही और काफ़ी सेलेक्टिव दिखता है।
 
अब सवाल उठता है कि क्या भारत की न्यायपालिका हमेशा ही ऐसी थी? जवाब है ‘नहीं’ तमाम दबावों के बावजूद भारत की सुप्रीम कोर्ट न्याय का आख़िरी दरवाजा हमेशा रहा है। लेकिन आज के भारत में न्याय और लोकतंत्र दोनों ही लंबित हैं और इसकी सुनवाई की अगली तारीख़ केंद्र सरकार की मर्जी पर निर्भर है।
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सुप्रीम कोर्ट की स्थिति

80 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और कानूनविद राजीव धवन ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट को ‘दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालत’ कहा था। 1990 के दशक में 'न्यायिक सक्रियता' न्यायपालिका का एक ऐसा गुण था जिसने कार्यपालिका को मनमानी करने से रोका। लेकिन आज बात कुछ और है। आज मेरी और मेरे जैसे तमाम लिखने पढ़ने वाले लोगों की जिम्मेदारी है कि हम अपनी न्यायपालिका की मजबूती और उसकी न्यायप्रियता के खोखले संदर्भों से आगे बढ़कर जिम्मेदारीपूर्वक सवाल करें। न्यायधीशों और न्यायपालिका को सम्मान की नजर से इसलिए देखा जाता रहा है, उन्हें माननीय इसलिए कहा जाता रहा है क्योंकि संविधान ने उन्हें वो दर्जा दिया है। और संविधान हम सभी भारतीयों के लिए सबसे ज़्यादा सम्मानीय है। क्योंकि संविधान ने अपनी शुरुआत में ही यह साबित किया है कि वह सबकुछ भारत के नागरिकों को ध्यान में रखकर तय करेगा। पूरा संविधान भारत के नागरिकों के लिए ही समर्पित है। भारत के संविधान के सबसे जरूरी भागीदार ‘भारत के लोग’ ही हैं। इसलिए जबतक न्यायपालिका संविधान द्वारा उसे दिए गए दर्जे का मान रखेगी तबतक उसे भी सम्मान प्राप्त होता रहेगा।
 
भारत के संविधान में कुछ भी ऐसा नहीं जो ‘बिना शर्त’ प्राप्त हो। फिर चाहे प्रधानमंत्री की बात हो, राष्ट्रपति की हो या फिर संसद की। सुप्रीम कोर्ट को जो ‘लगभग’ असीमित शक्तियाँ मिली हुई हैं वो इसलिए हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को भारत के संविधान का और लोगों के मौलिक अधिकारों का ‘कस्टोडियन’ बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट को हर हाल में अपनी यह भूमिका निभानी होगी। लेकिन घटनाएं बता रही हैं कि भारत का सुप्रीम कोर्ट इस समय अपनी विश्वसनीयता के निचले दर्जे पर है।

एक समय था जब एडीएम जबलपुर के ‘बंदी-प्रत्यक्षीकरण’ मामले (1976) को न्यायपालिका पर सबसे बड़ा धब्बा माना जाता था। जिसमें सीजेआई ए एन रे की अध्यक्षता वाली पीठ ने अनुच्छेद-21 में वर्णित जीवन के अधिकार को कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बना दिया था। लेकिन 2014 के बाद से जिस किस्म का दौर शुरू हुआ है वहाँ न जाने कितने एडीएम जबलपुर जैसे मामले सामने आ रहे हैं।

इन सभी मामलों के पीछे है एक टूटी रीढ़ वाली न्यायपालिका। हमारे दौर की न्यायपालिका ऐसी है जो नागरिकों के कानूनी और मौलिक अधिकारों की रक्षा में नाकाम है, यह ऐसी न्यायपालिका है जो कार्यपालिका द्वारा संविधान के अपहरण को रोक नहीं पा रही है।

2014 के बाद न्यायपालिका झुकी!

जिस न्यायपालिका को संविधान ने इतनी ताक़त दी कि वो हमेशा तनकर खड़ी रहे वो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद झुकी हुई दिखाई दी। सरकार ने जितना दबाया न्यायपालिका उतना झुकती गई। आज कहाँ है वो इस खबर से पता चलता है कि एक भारतीय नागरिक(उमर ख़ालिद) जिसे बिना ट्रायल के पिछले 6 सालों से सरकार ने जेल में रखा हुआ है उसे ज़मानत देकर बाहर निकालने के लिए न्यायपालिका के पास भारत के संविधान का कोई भी अनुच्छेद काफ़ी नहीं है। दिल्ली पुलिस के खोखले तर्कों के आगे न्यायपालिका असहाय है। सरकार और पुलिस की नजर में आरोपी होना किसी को अपराधी नहीं बना सकता। कानून कोई भी हो लेकिन अनुच्छेद-21 का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। लेकिन यह बात मजबूती के साथ कोई न्यायाधीश नहीं कह पा रहा है। क्या इसके पीछे सिर्फ़ ‘कानूनी पेंच’ हैं? मैं नहीं मानती हूँ। क्योंकि इसके पीछे वह तरीका हो सकता है जिसका इस्तेमाल मोदी सरकार 2014 के बाद से न्यायपालिका पर दबाव डालने के लिए करती आ रही है। मोदी सरकार अपने मन की न्यायपालिका चाहती थी और उसने सत्ता में आते ही यही काम शुरू कर दिया जिससे भारत की सबसे जिम्मेदार, संवेदनशील और नागरिकों के अंतिम सहारे के रूप में काम करने वाली संस्था की ऐतिहासिक विश्वसनीयता का ग़लत लाभ उठाया जाये और सत्ता का अनवरत सुख भोगा जाये।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का हाल

क्रम से समझते हैं! जून 2014 में मोदी सरकार को सत्ता में आए सिर्फ़ एक महीना हुआ था और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजे गए 4 नामों में से एक नाम गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट भेजे जाने पर रोक लगा दी। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? मालूम नहीं पर एक तथ्य यह है कि 2010 में सोहराबुद्दीन 'फर्जी मुठभेड़' जांच के दौरान तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के सुझाव पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने अमित शाह के गुजरात प्रवेश पर रोक लगाई थी। सरकार 2014 में 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से NJAC लेकर आई जिससे जजों की नियुक्ति में सरकार के दखल को बढ़ाया जा सके लेकिन अक्टूबर 2015 में जब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया तो सरकार नाराज हो गई और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के द्वारा भेजे जाने वाले नामों पर विचार करना बंद कर दिया। परिणाम यह हुआ कि भारत के उच्च न्यायालयों में 45% जजों की कमी हो गई। भारत के तत्कालीन सीजेआई टी एस ठाकुर एक मंच पर बोलते हुए भावुक हो गए क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि बिना जजों के भारत के करोड़ों नागरिकों को न्याय कैसे दिलाया जाये। अक्टूबर 2016 में उन्होंने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से पूछा कि "क्या आप इस संस्था को पूरी तरह तबाह कर देना चाहते हैं?" नवंबर 2016 में कॉलेजियम ने सरकार को 77 नाम भेजे जिसमें से 43 नाम लौटा दिए गए।

सरकार रुक नहीं रही थी, पूरा मनमानी पर उतारू थी। 2016 में अनुशंसित 4 वकीलों (हरनरेश सिंह गिल, बशारत अली खान, मोहम्मद मंसूर, मोहम्मद निजामुद्दीन) में से बशारत अली खान और मोहम्मद मंसूर के नाम 2 साल लटकाने के बाद जून 2018 में खारिज कर दिए गए।

ईमानदार जजों के साथ क्या हुआ?

मोदी सरकार के दबाव में जस्टिस जयंत पटेल, जस्टिस के एम जोसफ और जस्टिस अकील क़ुरैशी के साथ जिस किस्म का व्यवहार किया गया वह आज्ञापालक और समर्पित न्यायपालिका बनाने का ही दृष्टिकोण था। जस्टिस पटेल जो गुजरात हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश थे उनका तबादला पहले कर्नाटक हाईकोर्ट में किया गया, जब लगा वो यहाँ मुख्य न्यायाधीश बन जाएँगे तो जल्द ही उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया। जस्टिस पटेल ने दुखी मन से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ये भारत के नागरिकों को सरकार और सुप्रीम कोर्ट से पूछना चाहिए लेकिन सच्चाई ये है कि जस्टिस पटेल ने 2011 में गुजरात हाईकोर्ट में रहते हुए 2004 के इशरत जहां मुठभेड़ मामले में CBI जांच का आदेश दिया था। इस मामले में अमित शाह का नाम आरोपी के रूप में था। बाद में दिसंबर 2014 में जब बीजेपी अपनी सरकार बना चुकी थी तब अमित शाह को विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपमुक्त कर दिया था।
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जस्टिस अकील क़ुरैशी मामला

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 2018-19 में गुजरात हाईकोर्ट के वरिष्ठतम जज अकील क़ुरैशी को गुजरात हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की अनुशंसा की लेकिन केंद्र सरकार उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट भेजना चाहती थी। लेकिन कॉलेजियम ने उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की अनुशंसा की पर मोदी सरकार ने मुंह फुला लिया, परिणामस्वरूप कानून मंत्री ने कुरैशी को किसी भी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाये जाने के लिए ‘अनफिट’ घोषित कर दिया और उन्हें ‘सांप्रदायिक’ तक कह डाला। सरकार ने कहा कि अगर उन्हें किसी छोटे हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया जाये तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। अंततः रीढ़विहीन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें त्रिपुरा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायधीश बनाया। जस्टिस कुरैशी का इतिहास यह है कि वो जब 2010 में गुजरात हाई कोर्ट के जज थे तब उन्होंने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में तत्कालीन गुजरात के गृहमंत्री अमित शाह को CBI की दो दिन की हिरासत में भेजने का आदेश दिया था। इसके अलावा 2011 में उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विरोध किए गए आर ए मेहता को गुजरात का लोकायुक्त नियुक्त करने के राज्यपाल के फैसले को भी बरकरार रखा था। लगभग ऐसा ही व्यवहार जस्टिस मुरलीधर के साथ किया गया और रातोंरात उनका ट्रांसफर दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया क्योंकि उन्होंने दिल्ली दंगों के मामले में सरकार पर सवाल उठाया था कपिल मिश्रा जैसे लोगों पर सवाल उठाया था जो आज बीजेपी के मंत्री हैं।

धीरे धीरे सुप्रीम कोर्ट पर सरकार का शिकंजा कसता जा रहा था। इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कलिखो पुल के आत्महत्या के नोट में जस्टिस केहर और जस्टिस दीपक मिश्रा के नाम सामने आए। इस नोट में इन दोनों के सगे रिश्तेदारों पर उनकी सरकार बहाली को लेकर रिश्वत मांगने के आरोप लगे। इसके बाद जो घटनाक्रम हुआ वह चौंकाने वाला था। इन दोनों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ का इस्तेमाल करते हुए हरेन पांड्या मामला, सहारा-बिरला डायरी जिसमें मोदी को 25 करोड़ रुपये देने का उल्लेख था जैसे सभी महत्वपूर्ण मामलों को जस्टिस अरुण मिश्रा की ही पीठ में भेजा। ये वही जस्टिस मिश्रा हैं जिन्होंने पद पर रहते हुए खुले मंच से नरेंद्र मोदी को ‘अद्भुत प्रतिभाशाली व्यक्ति’ कहा था। 

तमाम रिपोर्ट बताती हैं कि कॉलेजियम इनके नाम पर तीन बार विचार कर चुका था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लिए नाम आगे नहीं बढ़ाया लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आते ही जुलाई 2014 में जस्टिस मिश्रा सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए।

यह सबकुछ सरकार तब कर रही थी जब सुप्रीम कोर्ट सेकेंड जजेज़ केस(1993) और थर्ड जजेज़ केस(1998) के माध्यम से यह स्थापित कर चुका था कि जजों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति और कॉलेजियम के बीच विवाद की स्थिति में कॉलेजियम का ही निर्णय अंतिम होगा। इसलिए 2014 के बाद जब मोदी सरकार असंवैधानिक फैसले ले रही थी तब सुप्रीम कोर्ट को रीढ़ दिखाकर खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन कोर्ट नहीं खड़ा हुआ और इसका खामियाजा आने वाले समय में कई काबिल जजों और भारत के लोकतंत्र को भोगना पड़ा। जो अभी भी जारी है।

 मुख्य न्यायधीशों के फैसले

भारत के मुख्य न्यायधीशों ने जिस तरह फैसले लिए, मामलों को रोक के रखा, विपक्ष का मनोबल तोड़ा, भारत के लोकतंत्र को चोट पहुंचाई उस पर कोई मरहम काम नहीं कर सकता।

CJI एस.ए. बोबडे (2019–2021) ने अपने लगभग 17 महीने के कार्यकाल में अनुच्छेद 370, EWS आरक्षण, आधार संशोधन, धन विधेयकों की न्यायिक समीक्षा, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े छह महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले लंबित रखे और उनमें फैसला नहीं किया। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने PM-CARES फंड को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (NDRF) में स्थानांतरित करने की याचिका भी खारिज की।

उसके बाद मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के कई कठोर प्रावधानों को बरकरार रखा, जिसकी वजह से ED की बढ़ी हुई शक्तियों ने भारत के संसदीय लोकतंत्र को बरबाद किया।
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CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की उदारता?

CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ (2022–2024) के काल में कई फैसले आए। दिखने में ये चंद्रचूड काफ़ी उदार दिखे लेकिन सीजेआई रहते हुए पीएम का इनके घर पहुंचकर पूजा में शामिल होना इनके बारे में काफ़ी कुछ कह गया। इन्होंने भी उमर ख़ालिद के बारे में कुछ नहीं किया, इन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित कानून को कठघरे में खड़ा नहीं किया, इन्होंने चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘इम्युनिटी’ देने वाले कानून को संविधान की कसौटी पर नहीं कसा और एक ऐसी इम्युनिटी मिल जाने दी जिसने भारत के लोकतंत्र को सर्वनाश के द्वार पर ला खड़ा किया। उपासना स्थल कानून को इन्होंने ही फिर से बहस के लिए खोल दिया जिसकी वजह से देश की अदालतें मंदिर-मस्जिद विवादों का अड्डा बनकर रह गई हैं। महाराष्ट्र राजनीतिक संकट में चंद्रचूड ने राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष की कुछ कार्रवाइयों को अनुचित माना, लेकिन पूर्व सरकार को बहाल नहीं किया। कुल मिलाकर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे मोदी सरकार पर जरा सी भी शिकन पड़ती।
 
मोदी जैसे चाहते थे न्यायालय उनके अनुकूल फैसले देते रहे। यहाँ तक कि एक वर्तमान सुप्रीम कोर्ट जज को यह कहने में जरा भी संकोच नहीं हुआ कि जो लाखों वोटर चुनाव आयोग की नाकामी की वजह से पश्चिम बंगाल में वोट नहीं दे सके हैं वो अगली बार वोट दे देंगे। और इस बात की आलोचना पूरी दुनिया में हुई।

ए के गोपालन (1950) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत में भारत का संविधान ही सर्वोच्च है। भारत में बनने वाले किसी भी कानून को संविधान सम्मत होना जरूरी है। विवाद की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति है कि वह तय करे कि संसद का कानून संवैधानिक है या नहीं।

केशवानंद केस

केशवानंद ने ‘संविधान की आधारिक संरचना’ के सिद्धांत से यह तय किया कि संविधान में ऐसा क्या है जिसे असीमित बहुमत वाली सरकार भी हटा नहीं सकती। इस संरचना में संविधान की सर्वोच्चता, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढाँचा और निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव आदि शामिल हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस जिम्मेदारी को नहीं निभाया और संविधान के भरोसे के साथ न्याय नहीं किया। 17वें के. एम बशीर मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए वरिष्ठ वकील और न्यायविद दुष्यंत दवे ने कहा कि “सुप्रीम कोर्ट में कई ऐसे भ्रष्ट जज रहे हैं, जिन्होंने न्याय को भारी नुकसान पहुँचाया है।" उन्होंने आगे कहा कि भारत में "अमीर और शक्तिशाली लोगों ने हमसे हमारी न्यायिक प्रणाली को हाइजैक (अपहरण) कर लिया है…। "इलेक्शन कमीशन और भारत के सुप्रीम कोर्ट की कृपा से यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) खत्म होता जा रहा है।"
मैं इसके लिए ‘विश्वासघात’ शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं करूँगी क्योंकि मैं यह मानती हूँ कि यह संस्था देश की एकमात्र उम्मीद है और किसी भी हालात में नागरिकों के हितों के लिए इसे ख़ुद को बदलना होगा। सदियाँ गुजरी हैं तब आज़ादी मिली, और एक संविधान बना, उसके बाद इस संविधान से सभी नागरिकों को सुरक्षा मिली। क्या नागरिकों को मिली सुरक्षा और उनकी आज़ादी के अधिकार को मुट्ठीभर न्यायाधीशों की इच्छा, ‘असुरक्षा’ और उनकी मानवीय गलतियों का गुलाम बनना पड़ेगा?

लोकतंत्र में हर शक्ति के चारों ओर जिम्मेदारी का घेरा बनाना जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट भी इससे अलग नहीं है। बिना जिम्मेदारी के हर ताक़तवर संस्था का तानाशाही में बदल जाना स्वाभाविक है। चुनाव आयोग हो या सुप्रीम कोर्ट, दोनों को ही संविधान ने बेहद मजबूत और संवेदनशील शक्तियाँ दी हैं, इन दोनों को कठोर आलोचना के दायरे में रखना जरूरी है। वर्ना जिस तरह के हालात 2014 के बाद से बने हैं, जिसमें चुनाव आयोग मनमानी कर रहा है, जिसमें यूपी जैसे राज्यों में खुलेआम लोगों के सपने बुलडोज़ किए जा रहे हैं, जिस तरह न्यायालय सरकार के पक्ष में झुका हुआ है, चुप है और बहुत सेलेक्टिव प्रतिक्रिया देता है वह इस देश के लोकतंत्र को जल्द ही अधिनायकतंत्र में बदल देगा।