2025 भी गुज़र गया लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार की असफलताओं का सिलसिला रुका नहीं। मई 2026 में तीन साल हो जाएँगे और अभी तक केंद्र सरकार मणिपुर में शांति व्यवस्था पूरी तरह बहाल नहीं कर सकी है। मणिपुर अभी भी अशांत है। मैतेई और कुकी-जो के बीच जो खाई बन चुकी है उसे पाटना लगभग असंभव दिखाई पड़ता है। सरकार अपनी अक्षमता के चरम स्तर पर उस वक़्त भी थी और आज भी लाचारी की हालत में ही खड़ी है। मणिपुर में क्या हुआ, कैसे हुआ और कैसे इतनी तथाकथित मजबूत सरकार कुछ नहीं कर सकी, किसी को नहीं पता। कम से कम आधिकारिक रूप से तो बिल्कुल नहीं। यह पचा पाना बहुत मुश्किल है कि इतनी मजबूत केंद्रीय शक्ति और जबरदस्त सैन्य बल के बावजूद मणिपुर क्यों इतने महीनों तक जलता रहा और राज्य और केंद्र में सत्ता का सुख लेती बीजेपी की सरकारें कुछ कर नहीं कर सकीं। 

सत्ता की कुर्सी में बैठने और लगातार बैठे रहने को लेकर बीजेपी का जो चरित्र है, उसने देश की मान-मर्यादा और अखंडता तक को ख़तरे में डाल दिया है। जिस तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह के प्रशासन के अंतर्गत इतनी बड़ी घटना घटी, जिसकी अक्षमता और गैर जवाबदेही ने पूरे उत्तर-पूर्व की स्थिरता को खतरे में डाल दिया, उसको एक महीने के भीतर हटाकर दूसरा मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था, लेकिन पता नहीं वो केंद्र में किस बड़े नेता का करीबी था कि उसे हटाया नहीं गया। दो सालों तक यानी 24 महीनों तक मणिपुर के जलते रहने और अस्थिरता में रहने के बाद केंद्र सरकार को याद आया कि अब बिरेन सिंह को हटाना ज़रूरी है, फ़रवरी 2025 में उन्हें हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

एक साल से राष्ट्रपति शासन

अब तो राष्ट्रपति शासन लगे हुए भी लगभग एक साल गुज़र गया है। सरकारी आँकड़ा यह है कि मणिपुर हिंसा में अबतक 250 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, सच्चे आँकड़े का पता नहीं, अनगिनत बलात्कार और यौन अपराध हुए हैं और एक छोटे से राज्य से 50,000 लोगों का विस्थापन हो चुका है और ये विस्थापित लोग अस्थायी रूप से टेंट्स में रह रहे हैं।
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50 हज़ार लोगों के पुनर्वास का क्या

अभी तक सरकार के पास कोई जवाबदेह और ज़िम्मेदार योजना नहीं है कि कैसे इन 50,000 लोगों का पुनर्वास किया जायेगा। 140 करोड़ आबादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिस सरकार को लगातार तीसरी बार चुना गया है, जिसके पास असंख्य संसाधन उपलब्ध हैं जो लगभग 400 लाख करोड़ की GDP के ऊपर बैठी सत्ता के सारे सुख भोग रही है वो तीन सालों में अभी तक 50,000 लोगों के पुनर्वास की योजना तक नहीं बना सकी है।

हाल में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मणिपुर की स्थिति को लेकर बैठक की है जिसमें पुनर्वास पर चर्चा की गई है। लेकिन अभी भी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, कि उन विस्थापित लोगों के साथ क्या किया जायेगा।

हर स्तर पर अपनी पार्टी की सरकारें, अपने मन के अधिकारी और मन के राज्यपाल, इसके बाद भी इतने साल लग गए, अगर मणिपुर जैसे छोटे से राज्य में स्थायित्व नहीं आ सका है तो इसका मतलब यही तो है कि नरेंद्र मोदी इस देश का नेतृत्त्व करने लायक नहीं हैं।

नफ़रत की राजनीति!

मणिपुर में दो समुदायों के बीच जो खाई बन गई है, उसके लिए अखंड भारत का जुमला बड़बड़ाने वाले नरेंद्र मोदी, उनके दल, उनके संगठन के नेतृत्व को भारतीय चेतना न तो कभी माफ करेगी और न ही इतिहास उनकी गैर जवाबदेहिता को इग्नोर करेगा। आज मैतेई और कुकी-जो समुदाय अलग-अलग जिलों में रह रहे हैं, वो एक दूसरे के रास्ते और बस्तियों को पार भी नहीं करना चाह रहे हैं। यह सोचना ही कितना कठिन है, दर्दनाक है कि भारत में ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई है कि दो छोटे छोटे समुदाय एक दूसरे की शक्ल तक नहीं देखना चाहते हैं। भारत में नस्लवाद जैसी घटनाएँ नहीं घटती थीं, इसकी कोई जगह नहीं थी लेकिन अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भारत में नस्लवाद से प्रेरित नफ़रत की घटनाएँ भी देखने को मिल रही हैं। समुदायों के बीच यह घृणा, ऐसा भय, स्वतंत्र भारत के लिए एक शर्मनाक और अप्रत्याशित घटना है।

संविधान में उत्तरदायी सरकार का सिद्धांत

मणिपुर कोई एक घटना नहीं है जिसने भारत को तकलीफ़ दी हो। ऐसी अनगिनत घटनाएँ हैं, जिन्हें महसूस करते ही रूह कांप जाती है। इन सभी घटनाओं में एक बात जो कॉमन है वो ये है कि ‘नरेंद्र मोदी सरकार की गैर जवाबदेहिता’। नरेंद्र मोदी सरकार एक उत्तरदायी सरकार नहीं है। यह सरकार भारत सरकार की सारी सुविधायें भोग रही है, पर अपनी लापरवाहियों की जिम्मेदारी नहीं लेती। जबकि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक पहचान एक ‘उत्तरदायी सरकार’ के गठन से ही जुड़ी हुई है। स्वतंत्रता पूर्व ही उत्तरदायी सरकार की माँग और कार्य शुरू हो चुका था। भारत शासन अधिनियम-1919 में पहली बार उत्तरदायी सरकार की बात की गई इसके बाद 1936 और फिर 1947 में स्वतंत्रता के बाद भी इसी दिशा में काम हो रहा था। 

26 जनवरी 1950, को जब भारतीय संविधान पूरी तरह लागू कर दिया गया तब भारत में यह सिद्धांत संवैधानिक रूप से स्थापित कर दिया गया कि चुनी हुई सरकार को लोगों के प्रति उत्तरदायी यानी जवाबदेह होना होगा। कोई भी सरकार जो उत्तरदायी नहीं है उसे देश के नेतृत्व का हक नहीं हो सकता। यहाँ तक कि संविधान का अनुच्छेद-75(3) मंत्रिपरिषद को लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है। यह अनुच्छेद साफ़-साफ़ कहता है कि भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में मन्त्रीय उत्तरदायित्व का सिद्धांत बहुत गहराई से जुड़ा है लेकिन वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार इस सिद्धांत को नहीं मान रही है जोकि संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन है, संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है।
विमर्श से और
उत्तरदायी सरकार की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ होती हैं जिन पर पूरा देश निर्भर होता है। एक उत्तरदायी सरकार को पारदर्शी होना चाहिए और मंत्रियों को अपने कार्यों और विभागों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए; कानून का शासन सुनिश्चित करना चाहिए। लेकिन सिर्फ़ केंद्र की मोदी सरकार ही नहीं जहाँ जहाँ भी राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहाँ के प्रशासन में उत्तरदायित्व का कोई स्थान ही नहीं है।

इंदौर में गंदा पानी पिलाकर 15 को मार डाला!

ऐसा ही एक मामला इंदौर का है। इंदौर अनदेखी का ऐसा मॉडल है जिसे केस स्टडी बनाया जाना चाहिए। मैं तो कहूँगी कि हो सके तो मोदी सरकार द्वारा लॉन्च की गयी सभी योजनाओं पर केस स्टडी होनी चाहिए। क्योंकि मोदी द्वारा लॉन्च किए गए सभी कार्यक्रमों पर सिर्फ़ अनाप-शनाप पैसा बहाया गया, अरबों रुपये लुटाकर प्रचार किया गया। विज्ञापनों को छाप छापकर मोदी की ऐसी छवि बनायी गई जैसे नरेन्द्र मोदी सामान्य इंसान ही नहीं बल्कि स्वयं परिवर्तन और सुधार के महान प्रतीक हों। निर्मल भारत अभियान कार्यक्रम का नाम बदलकर मोदी ने उसे नाम दिया स्वच्छ भारत मिशन। इसी मिशन के तहत स्वच्छता सर्वेक्षण का स्वाँग रचा गया। इसी स्वाँग में लगातार पिछले 8 सालों से इंदौर पहले स्थान पर बना रहा। बार बार देश को यह बताया गया कि इंदौर इस देश का सबसे स्वच्छ शहर है। अगर यह सच था तो इस शहर में गंदा पानी पीने से 15 लोगों की मौत कैसे हो गई? 

भारत के सबसे स्वच्छ शहर में पीने वाले पानी की पाइपलाइन में सीवर का पानी कैसे मिल गया? इतने सारे लोगों की मौत कैसे हो गई?

राज्य सरकार ने मौतों और सवालों के जवाब में एक दो म्युनिसिपल अधिकारियों को हटा दिया। क्या यह मजाक किया जा रहा है? इस देश और इस देश की छवि और और यहाँ के लोगों के जीवन के साथ मज़ाक ही किया जा रहा है। मुख्यमंत्री, अन्य मंत्री, विधायक ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी कब लेंगे? देश के लोगों को यह पता होना चाहिए कि इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री ख़ुद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव हैं। अगर किसी को जिम्मेदारी लेनी चाहिए तो सीएम मोहन यादव को लेनी चाहिए।

एमपी पर कर्ज का बोझ

जिम्मेदारी लेना तब और भी ज़रूरी हो जाता है जब यह पता चलता है कि एक साल से लोग यहाँ के ख़राब पानी की शिकायत कर रहे थे लेकिन मुख्यमंत्री ने लापरवाही की और पाइप नहीं बदले गए। मेरा सवाल है कि सीएम मोहन यादव ने ध्यान क्यों नहीं दिया? उनके ऑफिस ने ध्यान क्यों नहीं दिया? अगर राज्य का मुख्यमंत्री ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी नहीं लेता, भाग खड़ा होता है तो मौतों की जवाबदेही किसकी है? इंदौर से विधायक और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय बिना असभ्य भाषा बोले, रह नहीं सकते लेकिन जब जवाबदेहिता का वक्त आता है तो या तो गन्दा बोलते हैं या भाग खड़े होते हैं। मैं तो यही कहूँगी बीजेपी के कार्यकाल ने मध्यप्रदेश को एक असफल प्रदेश बना दिया है, राज्य पर ऋण का बोझ बढ़कर 5 लाख करोड़ होने को है, हर दिन सैकड़ों करोड़ रुपये लोन लेना पड़ रहा है और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। मध्य प्रदेश सरकार ने साल 2004 में एशियाई विकास बैंक से 200 मिलियन डॉलर (आज के हिसाब से लगभग 1700 करोड़ रुपए) का कर्ज लिया। 

कर्ज के पैसे से इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर में जलापूर्ति व्यवस्था को दुरुस्त करना था। लेकिन सालों तक राज्य में ‘मामा’ के कार्यकाल में कोई काम नहीं हुआ, 2019 में CAG ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि वाणिज्यिक राजधानी इंदौर और प्रदेश की राजधानी भोपाल में मल से दूषित जल की आपूर्ति की जा रही है, जगह-जगह पाइप फटे हुए हैं और भरपूर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। लेकिन न पीएम मोदी ने इसका संज्ञान लिया और न ही राज्य सरकार ने और न ही देश की ED, CBI, इनकम टैक्स विभाग जैसी किसी एजेंसी ने। बीजेपी चुनाव दर चुनाव जीतती गई, जो चुनाव हारी भी, वो ख़रीद-फरोख्त से जीत लिए गए और सरकार को क़ायम रखा गया, वे सत्ता का सुख लेते रहे। लेकिन जब बात जवाबदेहिता और उत्तरदायित्व की आई तो पीएम से नक़ल करते हुए सीएम और सारे के सारे मंत्री भी ख़ामोश बैठे रहे, कुछ अधिकारियों पर सारा ठीकरा फोड़ दिया गया।
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यह वर्तमान राजनीति का निर्लज्ज चेहरा है जहाँ जनता पर राज करने का मन तो बहुत करता है लेकिन जब जनता पीड़ित होकर आवाज़ उठाती है, सवाल करती है तब छोटे से लेकर बड़े सभी नेता कान में रूई लगाकर बैठ जाते हैं। यह खामोशी, यह निर्लज्जता न तो जनता के दर्द से टूटती है और न ही किसी की मौत में कराहती है। मौत चाहे एक की हो, 15 की हो, 250 की हो या हजारों की हो, चुप्पी सदा बरकरार रहती है। इन्हें लगता है कि जनता फिर सब भूल जाएगी और धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, पहचान, नफ़रत, द्वेष के आधार पर उन्हें वोट देती रहेगी, वे सत्ता का सुख भोगते रहेंगे, बिना ज़िम्मेदारी लिए।

अस्पताल में नवजात को चूहों ने कुतर दिया था

किसी को भी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि ये एक सामान्य चूक या भूल है। वास्तव में यह एक व्यापक भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रहा है। सितंबर 2025 में इंदौर के महाराजा यशवंतराव सरकारी अस्पताल में नवजात बच्चों के आईसीयू में, एक हफ़्ते पहले पैदा हुए दो बच्चों को चूहों ने कुतर के मार डाला। लेकिन केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक इसे भी पचा गई। इंदौर ही नहीं, पूरा स्वच्छता कार्यक्रम ही एक स्कैम लगता है। वैसे ही जैसे ‘मेक इन इंडिया’, ‘जनधन योजना’, ‘नोटबंदी’ आदि सब अंत में स्कैम ही साबित हुए क्योंकि इन्हें लॉन्च करने में खर्च तो बहुत हुआ लेकिन ये कभी अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर सके ऊपर से देश का नुकसान अलग से कर दिया। लेकिन सरकार ने कभी जवाबदेही नहीं दिखाई। सभी चुप्पी साधे रहे। यह एक ऐसी राजनैतिक अश्लीलता है जिसे सफेद और चमकदार कपड़ों के पीछे नहीं छिपाया जा सकता है और न ही मीडिया द्वारा फ़ैलाये जा रहे प्रोपेगंडा से दबाया जा सकता है।

मुझे तो लगता है कि जब कोई नेता लोगों के दर्द और तकलीफ़ देखते हुए भी चुप बना रहता है तो यह उसकी नाकाबिलियत की सबसे बड़ी पहचान है। फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो क्या बोलता है, क्या पहनता है, विदेशों में जाकर डंका पीटता है या देश में बैठकर अपना सर पीटता है। कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो चुनावों के पहले क्या बोलता है, कितना निवेश लाता है या क्या लुटवा जाता है। सबसे महत्वपूर्ण है लोगों के दर्द में उनके साथ खड़ा रहना। क्योंकि दर्द को नज़रंदाज़ करना नेतृत्व का कोढ़ है और भारत में आजकल इसी बीमारी का रिसाव हो रहा है। मुझे नेतृत्व की अक्षमता से दुर्गंध आने लगी है। देखना यह है कि क्या 2026 में कुछ ऐसा हो सकता है जिससे यह दुर्गंध थोड़ी कम हो सके!