1 जून 1947 को अपनी दैनिक ‘प्रार्थना सभा’ के दौरान महात्मा गांधी ने कहा कि “अब जब हमारे हाथ में स्वराज आ गया है तो हममें से प्रत्येक को अनुशासन से, विनय से और समझदारी से चलना चाहिए, तभी हिंदुस्तान की आज़ादी शोभा देगी”। यह बात आधिकारिक रूप से आज़ादी मिलने से ढाई महीने पहले कही गई थी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पूरे भारत ने यही कोशिश भी की कि ऐसा कुछ ना हो जिससे आज़ादी की शोभा बिगड़े। लेकिन अब जबकि आज़ादी मिले 80 सालों से अधिक का समय बीत चुका है और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, तो आज़ादी की शोभा को किश्तों में तबाह किया जा रहा है।
16 अगस्त 2026 की एक घटना है। पुणे के ऐतिहासिक सिंहगढ़ क़िले में 8 साल की एक लड़की अपने परिवार के साथ घूमने गई थी। 8 साल की लड़की के शॉर्ट्स को देखकर कुछ ‘दिमाग़ी नग्नों’ के मनों में बैठी विषाक्त और अश्लील स्मृतियाँ जाग गईं और उन्होंने लड़की और उसके माता-पिता को पीटा और अपमानित किया। ये दिमाग़ी नग्न लोग ख़ुद को समस्त बांधव आर्मी के नाम से बुलाते हैं, पर इनके ‘ग़ैर-पंजीकृत’ ‘संगठन’ में न ही किसी किस्म का बंधुत्त्व है और न ही ‘आर्मी’ जैसा अनुशासन और त्याग। ये सभी अपनी अपनी विषग्रंथियों से दिशानिर्देशित चरमपंथी भारतीय बोझ हैं जिनका नेचुरल हैबिटेट सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘जेल’ है लेकिन ये बाहर घूम घूमकर भारत को कलंकित कर रहे हैं। क्योंकि ऐसे लोगों को शायद वर्तमान सत्ता का प्रोत्साहन मिल रहा है या फिर ऐसे लोगों के अपराध को अनदेखा कर दिया जा रहा है, क्योंकि जिन्हें सत्ता का समर्थन प्राप्त हो रहा हो उसका क्या बिगड़ सकता है?
8 साल की बच्ची के साथ पुणे में जो हुआ वह भारत के लोकतंत्र के लिए ‘वाटरशेड’ मोमेंट है। जब गुंडे और मवाली भारत की छोटी-छोटी लड़कियों के कपड़े तय कर रहे हैं, तो साधारण महिला नागरिकों की स्वतंत्रता का क्या होगा?
भारत में पनप रही विषैली ‘मॉरल पुलिसिंग’
तो क्या भारत विषैली मानसिकता के गिरफ़्त में आ चुका है? क्योंकि यह मामला सिर्फ़ एक बच्ची के शॉर्ट्स पहनने का विषय तो नहीं है, यह विषय है भारत में पनप रही विषैली ‘मॉरल पुलिसिंग’ का जो पहले भी महिलाओं के साथ पार्कों, रेस्तरां और पार्टियों में बदतमीजी करती थी, और अब इसको इतना बढ़ावा मिल गया है कि वो 8 साल की लड़की के कपड़ों पर टिप्पणी करते हुए उसे ज़लील कर रही है, और उसके माता-पिता की पिटाई भी करने से डर नहीं रही है।
क्या मैं इन्हें हिंदू कहूं? नहीं! मैं इन्हें हिंदू नहीं कहूँगी, इन्हें मनुस्मृतिवादी कहा जाना चाहिए, क्योंकि इनके डीएनए में महिलाओं पर कठोर नियंत्रण की सदियों पुरानी स्मृति बसी हुई है। और यह स्मृति पुलिसिंग के रूप में सामने इसलिए खड़ी है क्योंकि बीजेपी और आरएसएस सत्ता के शिखर पर हैं।
मेरी राय में नरेंद्र मोदी हों या कोई अन्य हिंदुत्व पोस्टर ब्वॉय, इनमें से कोई भी पोस्टर ब्वॉय, जितने भी दिन सत्ता में रहेगा महिलाओं के अस्तित्व पर मनुस्मृति की काली छाया बढ़ती ही जाएगी। इन ‘दिमाग़ी नग्न’ गुंडों को संरक्षण कौन दे रहा है? ऐसा क्यों होता है कि ये दिमागी बौने सिर्फ़ बीजेपी के शासन में ही लंबे आकार के दिखने लगते हैं? इसका जवाब सबको खोजना चाहिए।
संविधान के सामने चुनौतियाँ
क्या साधारण नागरिकों की आज़ादी में आतंक फैलाने वाले ये कट्टरतम लोग नरेंद्र मोदी के आदेश पर काम करते हैं, पता नहीं; लेकिन इस बात से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि मोदी के नेतृत्व में भारत का संविधान, भारत की सर्वोच्च विधि के रूप में अपना महत्त्व लगातार खोता चला जा रहा है। जो दस्तावेज धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य होने की घोषणा सात दशक पहले ही कर चुका था, जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लगभग पूर्ण सर्वोच्चता के साथ स्थापित कर दिया था, उस संवैधानिक दस्तावेज को बाईपास करके ख़ुद को हिंदुओं का रक्षक कहने वाले गुंडे धर्मशास्त्रों, जैसे-मनुस्मृति आदि के आधार पर भारत के रहन-सहन और स्वतंत्रता संबंधी मूल्यों को स्थापित करना चाहते हैं। और जब ये मुट्ठी भर गुंडे ऐसा करते हैं तो हर महीने पूरे देश के साथ ‘एकालाप’ करने वाले पीएम मोदी ऐसे विषयों पर आपत्ति के एक शब्द भी अपने श्रीमुख से नहीं निकालते, जिसका खामियाजा भारत की सबसे क़ीमती चीज, भारत के संविधान को भुगतना पड़ रहा है। भारत के संविधान को खामियाजा भुगतने का मतलब ही है कि देश की 90+% आबादी के जीवन, उसके अधिकारों और उसके रहन-सहन को ख़तरे में डालना।
एक 8 साल की लड़की के कपड़ों को लेकर उसके साथ आदमियों के एक समूह द्वारा सार्वजनिक रूप से अभद्रता करना एक ऐसी घटना है जिससे कोई भी वर्तमान भारत के लोकतांत्रिक चरित्र के पतन की पुष्टि कर सकता है। सैकड़ों सालों तक ग़ुलाम रहे और अंग्रेज़ों के हाथों अपनी सारी संपत्ति लुटा चुके कंगाल भारत के पास नवंबर 1949 में सिर्फ़ एक प्रगतिशील लोकतंत्र का दस्तावेज भर ही था। वही उसका हासिल था, वही उसका भविष्य था। इसी दस्तावेज ने जवाहरलाल नेहरू को वो ताक़त दी कि बिना कोई महाशक्ति बने भारत दुनियाभर के देशों में सम्मान और आदर पा रहा था। ना के बराबर के संसाधनों के बावजूद भारत नेतृत्व करने को तैयार था।
आज़ादी के वक़्त जब नेहरु ने महात्मा गांधी को बताया कि “इंग्लैंड में लोग भूखों मर रहे हैं” तो महात्मा गांधी ने कहा कि जबतक हिंदुस्तान ज़िंदा है दुनिया में किसी को भूखा नहीं मरने देगा। यह उस देश का नेता बोल रहा था जिसके पास मुश्किल से ख़ुद के पास ही खाने लायक अनाज नहीं हो पा रहा था।
भारत की सांस्कृतिक विरासत
लेकिन भारत की यही सांस्कृतिक विरासत है कि हर मुश्किल वक़्त में दुनिया का नेतृत्व करने को तैयार रहे। आज भारत की बागडोर जिन लोगों के हाथ में है वो भारत को अनैतिक वैश्विक ताक़तों का पिछलग्गू बना रहे हैं। वी-डेम रिपोर्ट, 2026 “लोकतांत्रिक युग का विघटन”, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, बताती है कि अब दुनिया में निरंकुश शासन व्यवस्था वाले देशों की संख्या लोकतांत्रिक शासन वाले देशों से अधिक हो चुकी है। इसके अनुसार, दुनिया की तीन-चौथाई आबादी निरंकुश शासन के अंतर्गत रह रही है। यानी 800 करोड़ लोगों में से 600 करोड़ लोग ऐसे देशों में रह रहे हैं जहाँ की राजव्यवस्था को लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है।लोकतंत्र के सामने संकट
दुनिया में बढ़ती निरंकुशता ने इसे 1978 के पहले के दौर वाली निरंकुशता की ओर धकेल दिया है। डोनाल्ड ट्रम्प जैसा नेता जो नरेंद्र मोदी के ‘व्यक्तिगत मित्र’ हैं, जिनको राष्ट्रपति बनाये जाने के लिए बड़ी संख्या में भारतीयों ने यज्ञ और हवन करवाए थे, जिनके लिए मोदी ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ जैसे ओछे और भारत विरोधी नारे लगाए थे, उन्हीं ट्रम्प के कार्यकाल में संयुक्त राज्य अमेरिका पिछले 50 सालों में पहली बार अब एक उदार लोकतंत्र का दर्जा खो चुका है। दुनिया संकट में है और भारत के PM, उनके मित्र, और भारत की हक़ीक़त सबके सामने है।
जवाहरलाल नेहरू होते तो शायद दुनिया को कुछ उम्मीद रहती, भारत के वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी तो ख़ुद भारत को चुनावी निरंकुशता के दौर में पहुँचा चुके हैं। मोदी के नेतृत्व में भारत 2017 में चुनावी निरंकुशता की श्रेणी में आया और तब से लगातार उसी श्रेणी में बना हुआ है। उदार लोकतंत्र के मामले में भारत 179 देशों के मुक़ाबले 105वें स्थान पर है जबकि पिछले साल भारत 100वें स्थान पर था। भारत को पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ रखा गया है। भारत का यह लोकतांत्रिक पतन आरएसएस और बीजेपी द्वारा किसी भी हालत में सत्ता में बने रहने और हर बार चुनाव जीतने की ज़िद की वजह से हुआ है। इस ज़िद ने भारत निर्वाचन आयोग जैसी विश्वस्त संस्था को भी कूड़ादान बना दिया और न्यायपालिका की विश्वसनीयता तो अपने सबसे निचले स्तर पर जा टिकी है।
यह एक ऐसा दौर है जब भारत के मुख्य न्यायधीश को NALSAR और TISS जैसे प्रतिष्ठित संस्थान गेस्ट के रूप में स्वीकार करने से मना कर चुके हैं।
लोकतंत्र, स्वस्थ प्रतियोगिता और संस्थानों की संवैधानिक पवित्रता को ताक पर रखकर वर्तमान नेतृत्व भारत के हितों से बहुत दूर जाकर चंद लोगों के हितों के लिए नीतियाँ बना रहा है। ये चंद लोग ही मीडिया को खरीदकर, इस वर्तमान सरकार के पैरों में उसे लोटने और लोटपोट होने के लिए मजबूर कर रहे हैं। बीजेपी और आरएसएस के पैरों में लोटता हुआ यह मीडिया देश की समस्याओं को भारत के लोगों से छिपाते हुए, खुलकर भारतीय लोकतंत्र को धोखा दे रहा है। मीडिया का धोखेबाज चरित्र, कभी हिंदू रक्षा दल, कभी गोरक्षा दल तो कभी समस्त बांधव आर्मी जैसे संगठनों के ग़ैर-कानूनी कार्यों पर पर्दा डालता है या यह कहें कि इन्हें बचाता है और सरकार की ग़लत नीतियों पर सवाल न पूछकर सरकार को भी बचाता फिरता है।
महात्मा गांधी का जंतर
NCERT की किताबों में छपा महात्मा गांधी का जंतर सभी ने पढ़ा होगा। इसमें गांधी कहते हैं कि
“तुम्हें एक जंतर देता हूँ जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ-
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा सन्देह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।”
यह जंतर भारत सरकार को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए, अपनी आत्मा बेच चुके मीडिया और भारत के संवैधानिक न्यायालयों को भी। उन्हें सोचना चाहिए कि उनके सवालों, नीतियों और फैसलों की वजह से भारत के सबसे कमजोर और गरीब पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? यदि बंद होते स्कूलों और महंगी प्राइवेट शिक्षा पर सवाल ना पूछा गया, सड़क में गोरक्षा के नाम पर लोगों को पीट-पीटकर मार देने वालों को लेकर सवाल ना पूछा गया, या मॉरल पुलिसिंग के नाम पर देश की महिलाओं और बच्चियों के साथ पॉक्सो की योग्यता रखने वालों से सवाल न पूछा गया तो क्या होगा देश के लोगों का, क्या होगा सबसे अंतिम छोर में बैठे व्यक्ति का? यदि न्यायालयों के फैसलों ने नदियों को बर्बाद करने वालों को सजा नहीं दी, यमुना और गंगा जैसी नदियों को बर्बाद होने दिया, सरकारी मित्रों द्वारा जंगलों के काटे जाने पर यदि कानून की धाराओं में से सहूलियत के रास्ते निकाले जाते रहे, निष्पक्ष चुनाव के लिए कड़ा रूख नहीं अपनाया गया, अस्पतालों की दुर्गति और आयुर्वेद के नाम पर देश के स्वास्थ्य को लूटने वालों को कठघरे में खड़ा नहीं किया गया तो क्या होगा उस अंतिम छोर में बैठे गरीब भारतीय का?
अंतिम छोर में सिर्फ़ भारत का गरीब नागरिक नहीं बैठा है। वहाँ उसके साथ भारत का लोकतंत्र भी बैठा है। जितनी अधिक क्षति उस गरीब को होगी उतना ही पतन भारत के लोकतंत्र और भारतीयता का होगा। समस्त बांधव आर्मी जैसी संक्रामक बीमारियों का अस्तित्व भारत के लोकतंत्र के पतन का एक सिम्पटम है, इनका लोकतान्त्रिक इलाज कैसे हो यह सबको सोचना पड़ेगा, वरना बहुत देर हो जाएगी।