केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफ़ा दे दिया है लेकिन जो लोग भी युवाओं के इस ज्वार को समझ रहे हैं, वो जानते हैं कि युवाओं की इतनी बड़ी आंधी सिर्फ़ एक कैबिनेट मिनिस्टर के इस्तीफ़े के लिए नहीं आई थी। बेहिसाब संख्या में युवाओं का उमड़ना, भारत में वर्तमान में फैली अव्यवस्था के कारण है। यह अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, महंगी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, शिक्षा के अति सामान्यीकरण, इतिहास को अपने मन से तोड़ना-मरोड़ना, गरीबी, असमानता, क़ानून के शासन के पतन और प्रदूषण की वजह से है।
छात्रों का सड़कों पर भारी संख्या में उतरना भारत में संवैधानिक संस्थाओं के पतन का परिणाम भी है। मोदी सरकार के अंतर्गत भारत की लगभग हर विश्वसनीय संस्था का पतन शुरू हो चुका है! कानून का शासन अपने निम्नतम स्तर पर है, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के ख़िलाफ़ जाकर फ़ैसले करने बंद कर दिए हैं, चुनाव आयोग सरकार के पिंजरे में बंद तोते की तरह काम कर रहा है, विपक्षी दलों, अल्पसंख्यकों और सरकार से असहमति रखने वालों का दमन कई स्तरों पर किया जा रहा है। ऐसा कोई फोरम नहीं बचा है जहाँ पर छात्र अपनी समस्याएँ बता सकें जिससे उनका निदान हो सके।
बीजेपी के पास इतना पैसा कहाँ से आया?
नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और भारतीय सेना उन संस्थाओं के रूप में स्थापित रहीं जिन्होंने मिलकर 75 सालों से अधिक समय तक भारतीय लोकतंत्र को मजबूती से हर चुनौती के सामने खड़ा रखा। चाहे वो चुनौती आंतरिक हो या बाहरी, हर बार हर चुनौती से डटकर मुकाबला किया गया और भारत आगे बढ़ता गया। लेकिन अब इन तीनों का ‘सरकारीकरण’ कर दिया गया है। देश कमजोर हो चुका है लेकिन सत्ताधारी दल के ऑफिस और एसेट लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं। आज़ादी के बाद किसी और राजनैतिक दल ने अपने कार्यालयों पर इतना पैसा नहीं उड़ेला जितना बीजेपी ने पिछले 10 सालों में बहा दिया है। यह पैसा कहाँ से आया? अगर ईमानदारी से पैसे कमाकर देश की अन्य पार्टियां सैकड़ों करोड़ रुपये के कार्यालय बना सकतीं तो सभी दल बना लेते। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक क़रार देते हुए ख़त्म कर दिया, लेकिन तबतक बीजेपी इस असंवैधानिक योजना से जी भर कर भ्रष्टाचार कर चुकी थी। इलेक्टोरल बॉन्ड्स ने बीजेपी और पीएम मोदी की ईमानदार ब्रांड इमेज को लोगों के सामने बेनक़ाब कर दिया। पूरा देश यह जान गया कि यह दल किस तरह पैसे कमाने में लगा हुआ है, किस तरह कंपनियों को महत्वपूर्ण ठेके दिए जा रहे हैं, और किस तरह कॉर्पोरेट हस्तक्षेप से लोकतांत्रिक भारत को चलाए जाने की कोशिश हो रही है।
नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी इसका क्लासिक उदाहरण है। 2018 में मोदी सरकार ने नवयुग समूह पर इनकम टैक्स का छापा मारा, इस पर मनी लॉन्डरिंग और टैक्स चोरी के आरोप लगे, इसके बाद 2019 में ही नवयुग ने बीजेपी के 45 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीद डाले, 2022 में यह मूल्य बढ़कर 55 करोड़ रुपये हो गया। यह सारा पैसा बीजेपी के हिस्से में गया और नवयुग कंपनी को इसके कई फायदे मिले कई ठेके दिए गए।
जिस सिल्क्यारा बरकोट टनल का ठेका मिलने के बाद उसपर छापा पड़ा था बीजेपी के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदने के बाद वह मामला दबा दिया गया। इसके लिए नवयुग को भी त्याग करना पड़ा। नवयुग ने मोदी जी के अभिन्न मित्र और भारत के सभी महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर क़ब्ज़े का मन बना चुके गौतम अडानी को 13,675 करोड़ रुपये में आंध्रप्रदेश के महत्त्वपूर्ण कृष्णापट्टनम पोर्ट को बेच दिया। आगे चलकर नवयुग को और फ़ायदा हुआ। उसे मुंबई-पुणे हाइवे पर 6,695 करोड़ की लागत से बनने वाले मिसिंग लिंक का ठेका मिल गया। यह अलग बात है कि पहली ही मानसूनी बारिश में हजारों करोड़ रुपये का यह मिसिंग लिंक फ़व्वारे की तरह फट पड़ा। लेकिन अबकी बार कोई ईडी नहीं कोई सीबीआई नहीं कोई इनकम टैक्स नहीं। अब तो नवयुग को अडानी के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का ठेका मिल रहा है। दोनों मिलकर जॉइंट वेंचर बना रहे हैं।
इस तरह सबको फ़ायदा हो रहा है। बीजेपी को भी अडानी को भी और नवयुग को भी, नवयुग इंजीनियरिंग का ये उदाहरण मैंने इसलिए दिया क्योंकि ये बीजेपी और मोदी का रेवन्यू मॉडल बन चुका है।
लेकिन इन तीनों के फायदे की यह ‘सक्सेस स्टोरी’ भारत की बहुसंख्य आबादी के लिए नहीं है। इस आबादी के 100 करोड़ लोग मोदी सरकार से मिलने वाले राशन के लिए लाइनों में लगे हुए हैं। परीक्षा पास करके अपने परिवार और क्षेत्र का नाम रौशन करने का सपना देखने वाले भारत के गाँवों में रहने वाले निम्न आय वर्ग के युवा अब पेपरलीक से परेशान हैं। हर साल लाखों छात्र मोदी सरकार की अक्षमता और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का शिकार हो रहे हैं। आईआईटी, एम्स और आईआईएम जैसे संस्थानों की फीस इतनी अधिक बढ़ा दी गई है कि अगर आप मेहनत से परीक्षा पास भी कर लें तब भी आपको बैंकों का कर्जदार बनने पर मजबूर होना पड़ेगा। यह मोदी का भारत है। जबकि भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने जो सपना देखा वो हुनर और सम्मान पर आधारित भारत का था, पैसों पर मरने वाले भ्रष्ट आचार वाले भारत का नहीं।
कांग्रेस के कार्यकाल तक एम्स, आईआईटी और आईआईएम समेत सभी सरकारी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की फीस इतनी कम रहती थी कि कोई भी गरीब परिवार आसानी से अपने बच्चे को इन संस्थानों में भेजने का सपना देख सकता था, अपनी किस्मत कभी भी बदल सकता था। यह नेहरू का भारत था। 2014 में मोदी के आते ही उसकी हत्या कर दी गई।
छात्र आत्महत्याओं पर एनसीआरबी का डेटा
इस हत्या के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। NCRB की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में पिछले 10 सालों में, अर्थात जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, लगभग 80% बढ़ोत्तरी हुई है। छात्रों की आत्महत्या की संख्या जो 2014 में 8,068 थी, 2024 में बढ़कर 14,488 पहुँच गई है। अगर मोदी काल में आत्महत्या करने वाले कुल छात्रों की संख्या देखें तो नवीनतम आंकड़ों के अनुसार यह, 1,23,000 से अधिक हो चुकी है।
शायद नरेंद्र मोदी को यह पता नहीं है कि भारत में औसतन हर घंटे 1 छात्र और रोजाना लगभग 35 से अधिक युवा/छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। देश में होने वाली कुल आत्महत्याओं का लगभग 66% हिस्सा 18 से 45 वर्ष के युवाओं और वयस्कों का है। लेकिन लगता नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार को अभी पूरी बात समझ में आई है। इसीलिये एक भ्रष्ट मंत्री के इस्तीफे के लिए मोदी ने सैकड़ों हजारों छात्रों पर लाठियाँ बरसाना ज़्यादा उचित समझा। जिसे एक झटके में शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था उसको बचाने के लिए सैकड़ों छात्रों को तकलीफ़ पहुंचाई गयी, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी, एक ऐसे माहौल को निर्मित किया गया जिसमें देश की पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां और युवा छात्र मुठभेड़ करने लगें।
छात्रों का सामना नेहरू के भारत से नहीं
वास्तविकता तो यह है कि मुझे आज सबकुछ बिखरता नजर आ रहा है। आज छात्रों का सामना मोदी के भारत से है, नेहरू के भारत से नहीं। लोगों के सामने एक ऐसा पीएम सत्ता में बैठा हुआ है जो फ़िल्म अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से मिलने का वक़्त तो निकाल लेता है, विदेश यात्राओं में विश्व रिकॉर्ड बना रहा है, मंदिरों में जाकर घंटों पूजा कर सकता है लेकिन जब देश के युवा, जिन्हें किसी समय पर नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफिक डिविडेंड के नाम पर चुनावों में इस्तेमाल किया था, जब वो सड़कों पर आये हैं, अपनी मांगे रख रहे हैं, भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे हैं, भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ एक्शन की डिमांड कर रहे हैं तो वही पीएम नाराज़ हो जाता है, संकुचित हो जाता है। उन युवाओं के पास जाना तो दूर उनसे बात तक करना जरूरी नहीं समझता। इन सब के बाद भी शायद छात्रों के वर्तमान प्रतिरोध और प्रदर्शन के तरीक़े ने सब कुछ बदल दिया है। नीट पेपरलीक ने तो बस एक ‘इग्निशन’ का काम किया है। नीट समेत तमाम पेपरलीक ने उस न्यूक्लियस का काम किया जिसके चारों ओर ये युवा आकर खड़े हो गए हैं बावजूद इसके कि उनमें से हर युवा की समस्या पेपरलीक नहीं है।
जंतर मंतर और देश के तमाम शहरों में चल रहे प्रदर्शनों में शामिल युवाओं ने सभी समस्याओं को मिलाकर एक बड़ी समस्या को ठोस आकार दे दिया है। उनकी नज़र में सबसे बड़ी समस्या है ‘संवेदनहीन और गैर ज़िम्मेदार सरकार’ और युवाओं समेत तमाम मुद्दों पर मोदी सरकार की अनदेखी। यह अनदेखी अब एक बड़ी आपदा के रूप में सामने आ खड़ी हुई है।
भ्रष्टाचार में डूबी मोदी सरकार
देश का युवा अब ये सबकुछ देख पाने में सक्षम हो पा रहा है कि भ्रष्टाचार में डूबी मोदी सरकार चुनाव जीतने की लत में हर समस्या की अनदेखी कर रही है। जम्मू कश्मीर में आतंकवाद से लेकर केरल में फ़ैल रही झूठी और विघटनकारी अफवाहों की बात हो या गुजरात से लेकर असम तक चल रहे युद्धस्तर पर जंगलों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के लूट के तमाम कार्यक्रम; मणिपुर की असहनीय पीड़ा हो या धीरे धीरे पूरे नॉर्थ ईस्ट का धधकना और असुरक्षित होकर टूटना! युवा हर समस्या पर ध्यान आकर्षित करवा रहा है। युवाओं द्वारा बनाये जा रहे मीम्स ने पूरे भारत की समस्याओं को सामने ला कर खड़ा कर दिया है।
पूरी दुनिया जिन युवाओं की उँगलियों में घूम रही है, जो दुनिया की हर घटना का संज्ञान ले रहे हैं, उन्हें साफ़ दिख रहा था कि जिस देश का नेता 21वीं सदी में धर्म को ध्यान में रखकर किताबों के चैप्टर बदल रहा है वह इस देश को चलाने के क़ाबिल नहीं है। इसी बीच, CJP का जन्म हो जाता है जिस पर तमाम सवाल है। लेकिन अभी वक़्त उन सवालों पर जाने का नहीं उस घटना को समझने का है जिसकी ओट लेकर देशभर का युवा खड़ा हो चुका है। युवाओं को धर्मेंद्र प्रधान के रूप में पहला टारगेट मिला जिसकी वजह से देश की सभी सम्मानित परीक्षाएं धूल चाट रही हैं। खुलेआम नीट और यूजीसी के पेपर लीक हो रहे हैं। परीक्षाओं के दौरान सर्वर डाउन हो रहे हैं या डाउन किए जा रहे हैं, धांधली ही प्रतियोगी परीक्षा का चरित्र बन चुका है। इसलिए सड़कों पर आना जरूरी हो गया था।मोदी सरकार के ख़िलाफ़ इन वजहों से ग़ुस्सा
ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार में छात्र पहली बार सड़कों पर आए हैं। 2014, 2015, 2016 तक यूपीएससी एस्पिरेंट्स ने सड़कों पर उतरकर सरकारी तानाशाही के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। 2015 में FTII के छात्रों ने प्रदर्शन किया। 2017 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने परिसर में सुरक्षा और छेड़छाड़ की घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन किया, जिस पर रात में पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया और कई छात्राएँ घायल हुईं। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध के दौरान जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस जबरन घुस गयी, छात्रों को पीटा, आँसू गैस के गोले फोड़े गए, लाठीचार्ज हुआ और बड़ी संख्या में छात्र घायल हुए। लाइब्रेरीज़ में तोड़ फोड़ हुई, जनवरी 2022 में रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB-NTPC) परीक्षा परिणामों के विरोध में बिहार और उत्तर प्रदेश में छात्रों ने प्रदर्शन किए, जिनमें कई स्थानों पर लाठीचार्ज और गिरफ्तारियाँ की गईं।
जून 2022 में अग्निपथ (अग्निवीर) योजना के खिलाफ देश के कई राज्यों में आंदोलन हुए, योजना वापस करने की माँग की गई लेकिन इस बार भी मोदी सरकार ने एक ही तरीक़ा अपनाया, मामले को इग्नोर किया, चालबाज़ चुप्पी ली, प्रदर्शन हिंसक हो गया। पुलिस ने छात्रों को बेरहमी से पीटा, एक प्रदर्शनकारी की मौत भी हो गई। 2023–24 में प्रयागराज में UPPSC तथा RO/ARO अभ्यर्थियों ने परीक्षा दो दिन दो पालियों में कराए जाने के विरोध को लेकर, अपारदर्शिता के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरकर आंदोलन किया। इस दौरान भी पुलिस ने लाठीचार्ज किया। 2024 में NEET-UG परीक्षा में अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में दिल्ली सहित कई शहरों में छात्रों ने प्रदर्शन किए, जहाँ कुछ स्थानों पर पुलिस ने बैरिकेडिंग, हिरासत और बल प्रयोग का सहारा लिया।
हर बार, बार-बार देश के प्रतियोगी छात्र, सरकारों के सामने सिर्फ़ इसलिए खड़े होते रहे, सिर्फ़ इसलिए लाठियाँ खाते रहे, चोटिल होते रहे, गिरफ्तार होते रहे जिससे उन्हें साफ़-सुथरी परीक्षा प्रणाली मिल सके, जिससे वो ऐसे माहौल में प्रतियोगी परीक्षा में बैठ सकें, जिसमें न पेपरलीक होता हो और न ही नक़लबाज़ी, न परीक्षा में धांधली। पर मोदी सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी, बल्कि अपने मन का करते रहे, जो मन आया करते रहे।
भारत विश्वगुरु कैसे बनेगा?
क्या नारे गढ़ने से भारत विश्वगुरु बनेगा? क्या 2047 का विकसित भारत का नारा देने से भारत विकसित हो जायेगा? क्या झूठी बक बक करने से कुछ होता है? जिस देश में परीक्षार्थी निष्पक्ष और धांधलीरहित परीक्षा के आयोजन के लिए तरस जाएँ उस देश के प्राइममिनिस्टर औए शिक्षामंत्री को सपने में भी अनंतकाल तक ख़ुद को विकसित कहने का अधिकार नहीं है।
शिक्षा, देश की उन्नति का एकमात्र का आधार है। और राहुल गांधी ने इसी आधार का साथ देना उचित समझा। उन्होंने परीक्षाओं में धांधली को लेकर सरकार की संवेदनहीनता को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन, ‘छात्रों की गूँज’ छेड़ दिया। इस कार्यक्रम ने भारत के युवाओं को इस आंदोलन के लिए अप्रत्यक्ष रूप से तैयार किया। राहुल गांधी ने युवाओं को न सिर्फ़ भरोसा दिया बल्कि अपने अधिकारों के लिए सरकार से अहिंसात्मक तरीके से लड़ने के लिए मानसिक रूप से एकजुट और तैयार भी किया। राहुल गांधी ने सिर्फ़ युवाओं को ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इस देश की ‘प्रतिरोध की चेतना’ को भी जगाया है, समेकित किया है। वही समेकन एक मैच्योर युवा छात्रों के आंदोलन के रूप में आज सबके सामने है, जिसने मोदी सरकार को न सिर्फ़ झुका दिया है बल्कि उसके भीतर लोकतांत्रिक उबाल के भय को भी स्थापित किया है। यह सचमुच एक बड़ी जीत है ख़ासकर तब जबकि आंदोलन का सामना एक ऐसी सत्ता से है जिसे लोकतंत्र और चुनाव में अन्तर करना नहीं आता। जो लोकतंत्र के पीछे छिपकर अलोकतांत्रिक प्रयोगों को पूरे मनोयोग से करती है। ऐसी सत्ता का झुकना एक शुभ संकेत है। बशर्ते यह आगे भी जारी रहे।