दुनियाभर में चर्चा बटोर रहा डेबोरा कान का ‘द डिप्लोमैट’ अपने नए यानी चौथे सीज़न के साथ नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है। डेबोरा कान का ज़बर्दस्त लेखन और कहानी कहने का अंदाज़ इस अमेरिकी पॉलिटिकल थ्रिलर की जान है। यहाँ पूरी कहानी बताना मेरा उद्देश्य नहीं है, लेकिन चौथे सीज़न का अंत जिस तरह हुआ है, वह बेहद प्रभावशाली है। मुझे लगता है कि मौजूदा भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में इसकी चर्चा किया जाना बहुत जरूरी है।
डिप्लोमेसी की दुनिया के इस मास्टरपीस में दिखाया गया है कि किस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रेस पेन अपने व्यक्तिगत नज़रिये के आधार पर देश की विदेश नीति को बदलती हैं। परंपराओं, मर्यादाओं और स्थापित प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए वो अमेरिका और उसके वैश्विक सहयोगियों की सुरक्षा को ख़तरे में डाल देती हैं। ग्रेस पेन को अपने सहयोगियों द्वारा की जाने वाली आलोचना ज़हर लगने लगती है और सलाह, व्यक्तिगत हमला तथा नाफ़रमानी महसूस होने लगती है। वो हर उस आवाज़ को दबा देना चाहती हैं जो उनके नज़रिये से मेल नहीं खाती। विपक्षियों को तो एक तरफ़ रखिये, उन्हें अपनी ही चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़, उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री और विदेश सेवा के अधिकारियों से सिर्फ़ इसलिए दिक्कत होने लगती है क्योंकि वे उनके ‘व्यक्तिगत’ एजेंडे में उनका साथ नहीं देते। ग्रेस पेन एक के बाद एक करके तमाम संस्थाओं को कमज़ोर करती जाती हैं, अपने ही लोगों को धमकाती और डराती हैं, देश की सुरक्षा से समझौता करती हैं और इसके बावजूद उन्हें लगता है कि वो सब कुछ सही कर रही हैं।
फिर एक दिन इटली में G7 की बैठक के दौरान वह क्षण आता है, जब पूरी दुनिया के कैमरों के सामने ब्रिटेन में तैनात अमेरिकी राजदूत केट वाइलर, राष्ट्रपति की चीफ ऑफ़ स्टाफ़ बिली अप्पिया और विदेश मंत्री मिगेल गैनन एक-एक करके राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंपते हैं और बाहर निकल आते हैं। हद तो तब हो जाती है जब अमेरिका के उपराष्ट्रपति हैल वाइलर भी G7 की मीटिंग को छोड़कर उन सबके पीछे बाहर निकल आते हैं। और यहीं पर चौथे सीज़न का अंत हो जाता है।
तमाम लोग इसे देशद्रोह के चश्मे से देख सकते हैं और यह कह सकते हैं कि यही काम अकेले में किया जा सकता था, अमेरिका में जाकर किया जा सकता था। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती। यदि देश का प्रमुख मर्यादाहीन होकर आततायी हो जाये, निरंकुशता से व्यवहार करने लगे, बार बार समझाने से न समझे तो देश के अन्य जिम्मेदार लोगों का यह दायित्व है कि ऐसे व्यक्ति को देश की जनता और पूरी दुनिया के सामने एक्सपोज़ करें। और बाक़ी काम देश की जनता करे और उन्हें उसी लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता से बाहर करे जिस तरीके से वो कुर्सी पा गए थे।
सरकार दमन पर उतारू
भारत इन दिनों कुछ ऐसे ही हालातों से गुज़र रहा है। हर तरफ़ अफरा-तफ़री मची हुई है। और सरकार दमन पर उतारू है। कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन हो रहा है तो कहीं मानवाधिकारों का। कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का दमन हो रहा है तो कहीं न्याय का। भारत की विदेश नीति ‘ग्रेस पेन सिंड्रोम’ की शिकार है। ग़ैर-जवाबदेही और आर्थिक विषमता अपने उच्चतम शिखर पर है। नरेंद्र मोदी ‘मनमर्जी’ से फ़ैसले कर रहे हैं, नियमों और कानूनों को एक तरफ़ कहीं कोने में रख दिया गया है जोकि लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है।
IDBI बैंक का प्रस्तावित विनिवेश अब लगभग सुनिश्चित हो चुका है। भारत के औद्योगिक विकास के लिए इस बैंक की स्थापना आज से लगभग 6 दशक पहले 1964 में हुई थी। इस बैंक ने NSE, SEBI, NSDL, एक्ज़िम बैंक और SIDBI जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन आज मोदी सरकार इसका ‘कंट्रोल’ एक कनाडा की कंपनी को देने जा रही है।
सवाल विनिवेश पर नहीं इसकी अवैध प्रक्रिया पर है। ‘बिज़नेसवर्ल्ड’ में पलक शाह ने एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट छापी। इसमें सरकार के वित्त मंत्रालय (DIPAM) के एक आंतरिक नोट का हवाला दिया गया है। नोट के मुताबिक प्रक्रिया में नियम तोड़े गए हैं।
सामान्य नियम यह है कि रिजर्व प्राइस (न्यूनतम कीमत) तय करने से पहले बिडर्स की वित्तीय बोलियाँ नहीं खोली जानी चाहिए। नियम यह है कि अधिकारी बिना बिड देखे रिजर्व प्राइस तय करें जिससे भारत सरकार को कोई नुकसान ना हो और विनिवेश की उचित कीमत मिल सके। लेकिन नोट में लिखा है कि यह प्रक्रिया शुरू में अपनाई गई, लेकिन पहली बोलियाँ रिजर्व प्राइस से कम आईं। मतलब फेयरफैक्स नाम की कनाडा की कंपनी ने प्रति शेयर के हिसाब से पहली बोली 75 रुपये लगायी थी और सरकार ने कीमत अधिक रखी थी(94.42 रुपये)। इसलिए यह सौदा नहीं हो सकता था। इसके बाद फेयरफैक्स ने रिवाइज्ड बोली 81 रुपये लगाई। अब नियम को ताक़ पर दिया गया और नियम विरुद्ध जाकर अधिकारियों ने पहले यह बोली खोली, और बोली को ध्यान में रखते हुए आईडीबीआई बैंक के शेयर की नई न्यूनतम कीमत लगाई गई (75.99 रुपये)। कैबिनेट मंजूरी के दिन आईडीबीआई बैंक के शेयर की कीमत लगभग 90-91 रुपये थी। मतलब यह हुआ कि बैंक को बाजार मूल्य से कम पर बेचा गया और फेयरफैक्स को लगभग 6100 करोड़ रुपए का फ़ायदा हुआ। और इस तरह फेयरफैक्स कंपनी को भारत के ऐतिहासिक बैंक का ‘कंट्रोल’ ‘गिफ्ट’ कर दिया गया।
पीएम मोदी की तारीफ़ करती रही है फेयरफैक्स
फेयरफैक्स फाइनेंशियल के चेयरमैन प्रेम वत्स का कहना है कि वह 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से “10-12 बार आमने-सामने” मुलाकात कर चुके हैं। वत्स मोदी को “भारत का ली कुआन यू” बताते हैं और उनके विजन तथा देश के लिए किए गए काम को “अविश्वसनीय” करार देते हैं। उनका कहना है कि मोदी का पूरा ध्यान “भारत के लिए क्या अच्छा है” इस पर रहता है। वत्स के मुताबिक, “भारत सौभाग्यशाली है कि उसे मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिला है।” वह मोदी सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी नीतियों की भी तारीफ करते हैं। उनका मानना है कि मोदी के नेतृत्व में भारत सालाना “10 फीसदी आर्थिक विकास दर” हासिल कर सकता है और अगले दशक में बड़ी आर्थिक छलांग लगाकर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।
मैं वत्स, और उनकी ‘आइडियालॉजी’ और आईडीबीआई बैंक के सस्ते में बिकने को लेकर कोई कनेक्शन नहीं खोज रही हूँ लेकिन जिस देश में 50,000 रुपये की चोरी के लिए कोई 13 साल की सजा काटने को मजबूर हो सकता है उस देश में इन चाटुकार अरबपतियों के लिए नियम और कानून को क्यों तोड़ा जा रहा है, सवाल तो उठता ही है आखिर ऐसा क्यों? सवाल वित्त मंत्रालय और निर्मला सीतारमण पर भी हैं? कि वो क्या कर रही हैं?
मोदी भारत में उद्योगपतियों को मजबूत करें इसमें कोई दिक्कत नहीं लेकिन अगर भारत के लोग कमजोर हों, भारत का संविधान और यहाँ की कानून व्यवस्था इसके लिए कमजोर की जाए तो यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मोदी जबसे सत्ता में आए हैं तबसे मुट्ठीभर उद्योगपतियों के ही हित में नियमों को तोड़-मरोड़ रहे हैं।
कोयला अनुबंध और अडानी
जिस कोयला आवंटन मामले को लेकर स्व. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बीजेपी ने बेईमान कहा, जिस बात को लेकर मनमोहन सिंह सरकार की मीडिया में भर भर के आलोचना हुई, जिसपर साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 204 कोयला ब्लॉकों और उनसे जुड़े गुप्त MDO (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) अनुबंधों को गैर-कानूनी ठहराकर रद्द कर दिया गया था 2015 में उन्हीं MDO अनुबंधों को मोदी सरकार ने कानून में बदलाव करके वैधता प्रदान कर दी। इसके तहत राज्य सरकारों को बिना किसी नई नीलामी के पुराने MDO ठेके बहाल रखने की अनुमति भी मिल गई। इसका सबसे बड़ा लाभ अडानी को हुआ जिसको 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झटका लगा था। पीएमओ और नीति आयोग के अधिकारी भी मोदी सरकार के फैसले से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इन फैसलों को ‘अपारदर्शी’ और ‘अनुचित’ कहा लेकिन मोदी सरकार ने फैसला नहीं बदला क्योंकि फैसला बदलते ही नुकसान अडानी को होता।
6 एयरपोर्ट अडानी को
इसी तरह 2019 में अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, मंगलुरु और तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट के निजीकरण की प्रक्रिया से पहले वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) ने सुझाव दिया था कि एक कंपनी को अधिकतम दो एयरपोर्ट दिए जाएं। मंत्रालय का तर्क था कि इससे वित्तीय जोखिम कम होगा और अलग-अलग कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी। नीति आयोग ने भी तकनीकी अनुभव की अनिवार्यता पर सवाल उठाया था। उसका कहना था कि पर्याप्त तकनीकी क्षमता के बिना कोई कंपनी परियोजना की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा सकती है। लेकिन इन्हें दरकिनार कर दिया और बिना एयरपोर्ट अनुभव वाले अडानी ग्रुप को सभी छह एयरपोर्ट मिल गए।
धीरे-धीरे कोयला क्षेत्र की सरकारी कंपनी कोल इंडिया को कमजोर किया गया और अडानी को बढ़ावा दिया गया। जिस कोयला खनन का काम मुख्य रूप से कोल इंडिया का था अब उसमें अडानी भी बड़े प्लेयर बनकर उभर गए हैं।
रिपोर्ट बताती हैं कि 2021 के अंत से अप्रैल 2024 तक NTPC के कोयला आयात के 31 टेंडरों में से 24 अडानी एंटरप्राइजेज को मिले। रिपोर्ट के अनुसार, आयात की लागत अंततः बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ी। आयात की इजाज़त अडानी को मिली, फ़ायदा अडानी को हुआ और महंगी बिजली आम लोगों के हिस्से में आई।
जियो और टेलीकॉम इंडस्ट्री
2016 में मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह ने टेलीकॉम में उतरने का फैसला किया। अंबानी ने रिलायंस जियो लांच किया। वॉइस कॉल फ्री कर दी और डेटा के दाम बहुत नीचे कर दिए गए। आम लोगों के नजरिये से यह बढ़िया था लेकिन क्या यह ‘प्रतिस्पर्धा’ के नजरिये से ठीक था? भारती एयरटेल समेत तमाम कम्पनियाँ भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) पहुँची उन्होंने जियो पर ‘प्रीडेटरी प्राइसिंग’(घाटा सहकर सेवाएं देना ताकि अन्य कंपनियां खत्म हो जाएं) का आरोप लगाया। लेकिन CCI ने यह आरोप ख़ारिज करके कहा कि जियो नया खिलाड़ी है और उसे बाजार में पैर जमाने के लिए यह करना ज़रूरी है। जबकि असलियत यह है कि जियो भले नया हो लेकिन मुकेश अंबानी की ‘रिलायंस इंडस्ट्रीज’ उस समय भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक थी और है और इसलिए जियो घाटा सहकर भी बाजार में बना रह सकता था। हुआ भी यही आज जियो और एयरटेल के अलावा हर एक प्राइवेट टेलीकॉम प्लेयर बर्बादी की कगार पर है।
जियो और बीएसएनएल
मोदी सरकार द्वारा अंबानी को भारत सरकार की टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल इस्तेमाल करने दिया गया। बीएसएनएल के इंफ्रास्ट्रक्चर के ऊपर चढ़कर जिस तरह जियो का निर्माण किया गया। यह सब भारत के हितों के ख़िलाफ़ है। CAG की एक रिपोर्ट के अनुसार, BSNL और जियो के बीच BSNL के पैसिव इंफ्रास्ट्रक्चर को इस्तेमाल करने का समझौता था। रिपोर्ट में बताया गया कि मई 2014 से मार्च 2024 तक जियो द्वारा अतिरिक्त तकनीक के इस्तेमाल के लिए BSNL ने पूरा शुल्क नहीं वसूला। CAG के अनुसार इस वजह से BSNL को 1757.76 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है।
आख़िर नरेंद्र मोदी चाहते क्या हैं? BSNL और कोल इंडिया जैसी सरकारी कंपनियों को नुकसान पहुँचाने से उन्हें या देश को क्या फ़ायदा होगा? मुझे नहीं पता! लेकिन यह समझना मुश्किल है कि भारत के छह एयरपोर्ट एक ही कारोबारी समूह को मिलने से देश का क्या भला हुआ? क्यों पोर्ट्स और एयरपोर्ट्स से लेकर कोयला खनन तक हर क्षेत्र में अडानी को तरजीह दी जाती है और उनके कारोबारी हितों के लिए कानूनी नियमों तक में बदलाव किए जाते हैं? मोदी बताएं कि अडानी के कारोबारी हितों के लिए भारत के सबसे घने जंगलों को कोयला खनन की भेंट चढ़ाने की प्रेरणा उन्हें आखिर कहां से मिली?
आखिरकार अंबानी के कारोबारी हितों के लिए भारत के लोगों के मेहनत से बनी सरकारी कंपनी BSNL के साथ ऐसा व्यवहार क्यों हो, जिस पर CAG ने भी सवाल उठाए हैं? सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सस्ते में बेचने और इसके लिए नियमों व गाइडलाइंस में बदलाव करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?
नरेंद्र मोदी जबसे सत्ता में आए हैं वो इस देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं। पूरे देश ने देखा कि मोदी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय किस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दबाव में आ गए थे। हाल में हुए एमएलसी चुनावों के पूरे परिणाम आए भी नहीं थे कि पीएम मोदी एक्स पर आकर लिखकर चले गए कि कांग्रेस को जीरो सीटें मिली हैं हालांकि बाद में उन्हें अपने पोस्ट का पछतावा हुआ होगा लेकिन ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रम्प ने अनगिनत बार मोदी और भारत को शर्मसार किया लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोल सके।
ये नरेन्द्र मोदी की नीतियाँ ही हैं जिसकी वजह से सिर्फ़ कुछ लोगों की जेबों में धन है बाक़ी भारत आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। थॉमस पिकेटी की ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ की रिपोर्ट-2026 के अनुसार, भारत के टॉप 1% लोगों के पास भारत की कुल संपत्ति का 40% है। भारत दुनिया के सर्वाधिक असमानता वाले देशों की सूची में है। पीएलएफएस-2025 के अनुसार, भारत में हर 10 में से एक युवा बेरोजगार है।
प्रेस की स्वतंत्रता में भारत
यदि इन पर कोई सवाल उठाता है तो उस पर ‘बदले’ की कार्यवाही की जाती है जिसकी वजह से लड़ाई और कठिन हो गई है। उदाहरण के लिए चुनाव आयोग द्वारा SIR की आड़ में की जा रही वोटचोरी को लेकर जब प्रतिष्ठित संस्थान ‘लाइव लॉ’ इंस्टाग्राम में रील बनाकर डालता है तो उसे डिलीट करवा दिया जाता है। यही कारण है कि भारत में अभिव्यक्ति/ प्रेस की स्वतंत्रता में भारत को 180 देशों के मुक़ाबले 157वाँ स्थान मिला है (RSF-2026)। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (IDEA) के अनुसार भारत में कानून के शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय तक पहुँच जैसे क्षेत्रों में भारी कमी आई है। रूल ऑफ़ लॉ-2026 इंडेक्स के अनुसार भारत में मौलिक अधिकारों की हालत ठीक नहीं है। इस मामले में भारत को 143 देशों के मुक़ाबले 103वाँ स्थान मिला है। मोदी भारत के साथ क्या कर रहे हैं, यह CIVICUS नाम की संस्था द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्ट से पता चलता है। यह जोहान्सबर्ग स्थित एक वैश्विक-ग़ैर सरकारी संगठन है जो दुनिया के विभिन्न देशों में नागरिक स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक समाज की स्थिति का आकलन करती है। यह मूल रूप से तीन चीजों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता, और संगठन बनाने की स्वतंत्रता के आधार पर देशों को 5 श्रेणियों में बाँटता है। सबसे अंतिम श्रेणी है ‘बंद’ यानी जब नागरिक स्वतंत्रता पूरी तरह से ज़ीरो हो जाए उदाहरण के लिए उत्तरी कोरिया, ईरान, सीरिया आदि। इससे ऊपर की श्रेणी है ‘दमनग्रस्त’। CIVICUS-2026 में भारत को इसी श्रेणी में स्थान मिला है। दुनिया का सबसे मजबूत संविधान बनाने के बाद भी भारत आज इस अवस्था में पहुँच गया है कि नागरिक खुलकर अपनी बात भी नहीं रख सकते, आवाज़ नहीं उठा सकते। उनके धरना स्थलों को ‘डिनोटिफाई’ कर दिया जाता है और अदालतें चुप रहती हैं।
‘डिप्लोमैट’ में राष्ट्रपति ग्रेस पेन UK एम्बेसी स्थित अपने DCM, स्टुअर्ट, के साथ कुछ ऐसा ही व्यवहार करती हैं। जब वो राष्ट्रपति से ‘असहमति’ वाला एक लेटर सरकार को भेजता है तो उसका तबादला करके उसे सजा दी जाती है। यहाँ भी ‘असहमति’ का हक ख़त्म किया जा रहा है जिससे मोदी भारत के लोगों, कानून व्यवस्था, संसाधनों और संस्थानों के साथ जो चाहें वो कर सकें और उन्हें कोई रोक ना सके। लेकिन भारत में ‘हवा’ बदल रही है हो सकता है यहाँ भी कोई देशभक्त सरकार से निकलकर देश के लिए आगे आए, इस्तीफ़ा थमाये और पीएम मोदी को जनता के सवालों का जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़े, जिसके डर से वो पिछले 12 सालों से भाग रहे हैं।