भारत की दिशा और दशा अस्त-व्यस्त है और इसका प्रमुख कारण है केंद्र की सत्ता में बैठी नरेंद्र मोदी सरकार। एक तरफ़ चीन अरुणाचल में लगातार सीमा का उल्लंघन कर रहा है, अमेरिका के विदेश मंत्री रूबियो भारत की संप्रभुता को ललकारते हुए भारत से नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के चहेते उद्योगपति के साथ व्यापारिक बातचीत और समझौता करने में लगे हैं, ट्रम्प प्रशासन पीएम मोदी और उनके मंत्री हरदीपपुरी पर दबाव डालने के लिए एपस्टीन फाइल्स के दस्तावेज समय-समय पर जारी करता रहता है। इसके अलावा आरएसएस विचारधारा से जुड़े संगठनों को अरबों रुपए का विदेशी चंदा अमेरिका में मिल रहा है जिसमें से एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों ने दिया है जिनका नाम गुप्त है।
ट्रम्प का अंबानी परिवार से संबंध
ट्रम्प परिवार 2017 से अंबानी परिवार के ‘टच’ में है। इवांका ट्रम्प और मुकेश अंबानी की मुलाक़ात (2017), डोनाल्ड ट्रम्प और मुकेश अंबानी की मुलाक़ात (2020) ने एक ‘बढ़िया फाउंडेशन’ तैयार कर दिया था। इसके बाद मार्च 2024 में इवांका, उनके पति जेरेड कुशनर और उनकी बेटी अरबेला, अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट के विवाह-पूर्व समारोहों में जामनगर, गुजरात में शामिल हुए, कुछ महीने बाद जनवरी 2025 में ट्रम्प के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के शपथग्रहण से दो दिन पहले एक निजी रिसेप्शन आयोजित किया गया जिसमें कुछ चुनिंदा मेहमानों को शामिल किया गया था। इसमें नरेंद्र मोदी को शायद नहीं बुलाया गया था लेकिन मुकेश अंबानी और नीता अंबानी को ना सिर्फ़ बुलाया गया बल्कि वो ट्रम्प के साथ आयोजित निजी कैंडललाइट डिनर में भी शामिल हुए। साफ़ है कि भारत को अंबानी का देश समझा जा रहा है, यहाँ के लोगों और चुने हुए प्रतिनिधियों को कोई तवज्जो नहीं दी जा रही है।
दूसरी तरफ़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एनडीटीवी के ‘वर्ल्ड समिट’ मंच से राहुल गांधी और कांग्रेस के निन्दारस में डूबे हुए हैं। हालांकि उन्होंने राहुल गांधी का नाम नहीं लिया है लेकिन यह स्पष्ट है कि वो बात उन्हीं की कर रहे हैं।
गांधी-नेहरू परिवार को क्यों कोस रहे हैं?
क्या बार-बार राहुल गांधी और गांधी-नेहरू परिवार को कोसने और उनकी निंदा करने से प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की चुनौतियाँ कम हो जाएँगी? मुझे लगता है नहीं हो पाएंगी, लेकिन फिर भी वो हर बार यही करते हैं। एक मंच, जहाँ से पीएम मोदी को यह बताना चाहिए था कि वो तमाम अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से कैसे निपटेंगे, जैसे- चीन के साथ 2020 के पहले वाली बॉर्डर वाली स्थिति कब तक बहाल होगी? चीन जो बार-बार अरुणाचल प्रदेश में संघर्ष की स्थिति पैदा कर रहा है उसको लेकर वो क्या करने वाले हैं? आख़िर 12 साल गुज़र चुके हैं लेकिन उन्होंने अभी तक चीन को वो ‘लाल आँखें’ क्यों नहीं दिखाईं जिसका वो 2014 के पहले भाषणों में ज़िक्र किया करते थे? पीएम को बताना चाहिए कि आख़िर वो और उनके विदेश मंत्री पाकिस्तान को डिप्लोमैटिकली अलग थलग करने में नाकाम क्यों रहे? आतंकी देश होने के बावजूद पाकिस्तान का क़द लगातार क्यों बढ़ रहा है? जबकि मोदी के सत्ता में आने से पहले मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान को पूरी दुनिया में बुरी तरह अलग थलग कर दिया था। पीएम मोदी ने इस तथाकथित ‘वर्ल्ड समिट’ में यह भी नहीं बताया कि बांग्लादेश और नेपाल के साथ भारत के संबंध इतने बिगड़ क्यों गए हैं? क्यों सभी पड़ोसी देश भारत से उखड़े हुए हैं? एक बेहतर पड़ोस की वकालत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की विरासत को तबाह करने को लेकर पीएम मोदी को कुछ तो बताना चाहिए था। कम से कम यही बता देते कि मालदीव भारत के हाथों से लगातार क्यों खिसकता जा रहा है और यह भी कि भारत का मज़बूत सहयोगी भूटान भी अब चीन की ओर क्यों झुक रहा है?
ट्रम्प के पीएम मोदी से रिश्ते कैसे?
मुझे तो यह ज़रूरी लगता है कि नरेंद्र मोदी को मुखर होकर बताना चाहिए कि अमेरिका, विशेषरूप से ट्रम्प से उनके रिश्ते कैसे हैं? खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करने से कुछ नहीं होगा। सवाल आज भी बरक़रार है, उन्हें बताना चाहिए कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की संप्रभुता पर बार बार हमला क्यों करते रहे और आज भी कर रहे हैं? आखिर भारत पर व्यापारिक डील का दबाव क्यों बनाया जा रहा है? आखिर क्यों भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री से दिल्ली में मिलने की बजाय अमेरिका का विदेश मंत्री जामनगर में जाकर मुकेश अंबानी से मिलता है? जिसे ट्रम्प के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी, एलन मस्क, ने भारत का असली प्रधानमंत्री कहकर संबोधित किया और भारत और यहाँ की राजनैतिक व्यवस्था और संप्रभुता का मजाक बना दिया? कांग्रेस की निंदा करने से, राहुल गांधी को नीचा दिखाने से, नेहरू को भला बुरा कहने से पीएम मोदी की असफलताएँ नहीं छिपायी जा सकेंगी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस वर्ल्ड समिट में भारत की वैश्विक चिंताओं पर कुछ खास क्यों नहीं कहा, क्या उनकी सबसे बड़ी चिंता प्रधानमंत्री की कुर्सी है जो इस समय सर्वाधिक ख़तरे से गुज़र रही है।
राहुल गांधी उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरे भारत को पैदल यात्रा करके माप चुके हैं, लगातार 12 सालों से सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं, पूरे देश का मीडिया जिसपर या तो अडानी का कंट्रोल है या अंबानी का, वो लगातार राहुल गांधी के ख़िलाफ़ तरह तरह का प्रोपेगंडा चलाता है इसके बावजूद जब भारत का Gen Z सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन करता है तो वह नेतृत्व के लिए राहुल गांधी की ओर देखता है। राहुल गाँधी हर एक विपक्षी लोकतांत्रिक और अहिंसात्मक आवाज़ को प्रश्रय दे रहे हैं, उसे आगे बढ़ा रहे हैं और इस वजह से आज भारत का 27 करोड़ Gen Z युवा राहुल गांधी के साथ आ खड़ा हुआ है।
‘फेल्ड प्रोडक्ट’, ‘लांचिंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों?
पीएम मोदी राहुल गांधी के लिए ‘फेल्ड प्रोडक्ट’ और ‘लांचिंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सवाल ये है कि अगर राहुल गांधी एक असफल उत्पाद हैं तो नरेंद्र मोदी को उस उत्पाद से इतनी चिढ़ और डर क्यों है? आख़िरकार क्यों बार बार बुलाये जाने पर भी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद के मानसून सत्र में शामिल नहीं हुए? क्या उनमें साहस नहीं रहा कि विपक्ष के नेता के सामने खड़े हो सकें? क्या मोदी और शाह मिलकर भी राहुल गांधी के सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे?पीएम मोदी ने इस समिट में कहा कि दुनिया नया ‘ऑर्डर’ खोज रही है और कांग्रेस देश में ‘डिसऑर्डर’ यानी अव्यवस्था फैला रही है। मुझे तो कभी कभी लगता है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी को कभी भारत में किसी भी स्तर के नेता के रूप में भी स्वीकार किया जाना चाहिए था या नहीं? जिस नेता को यह नहीं पता कि विरोध, प्रदर्शन और सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे यह नहीं पता कि संसद की कार्यवाही को बाधित करना संसदीय लोकतंत्र का हिस्सा है, जो यह नहीं जानता कि छात्रों का आक्रोश, उनके द्वारा की जाने वाली नारेबाजी और पुतला फूंका जाना देशद्रोह नहीं बल्कि लोकतंत्र का हिस्सा है उसे भारतीय लोकतान्त्रिक परंपरा का नेता कैसे माना जाये?
अपनी 4 वर्गफीट की कुर्सी को बचाने के लिए पीएम मोदी उस कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं जिसका इतिहास भारत में 141 साल पुराना है, जिसने भारत को आज़ादी दिलवाई, जो भारत में दशकों तक वैचारिक छतरी के रूप में काम करती रही, जिसने दक्षिणपंथी, समाजवादी, मार्क्सिस्ट विचारधाराओं को जगह दी, जिसने क्षेत्रीय दलों के निर्माण को दुश्मन की तरह नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में समझा उसे पीएम मोदी ‘अव्यवस्था’ का कारण बता रहे हैं। पीएम को सुनने में तकलीफ़ होगी लेकिन सच तो यह है कि अव्यवस्था वो थी जिसका जन्म 1925 में करवाया गया जिसे आरएसएस के नाम से जाना जा रहा है, अव्यवस्था वह विचारधारा थी जिसने महात्मा गांधी की हत्या की, जिसने राम मंदिर आंदोलन के नाम पर देश में दो फाड़ कर दिया। भारत की हालत इसीलिए अस्त-व्यस्त है।
'वर्ल्ड समिट' का मुद्दा राहुल गांधी?
जिस प्लेटफॉर्म का नाम वर्ल्ड समिट था उसपर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी लेकिन उसपर पहुंचकर पीएम भारत के ही सबसे पुराने राजनैतिक दल और ‘शैडो प्रधानमंत्री’ जैसी हैसियत रखने वाले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बुराई का राग ऐसे अलाप रहे थे, जैसे यह समिट राहुल गाँधी की बुराई करने के लिए ही आयोजित की गयी हो? पीएम मोदी को कोई चिंता नहीं कि भारत के आंतरिक हालात क्या हैं और उनकी बीजेपी शासित सरकारें कैसे काम कर रही हैं। ना ही उन्हें इस बात की चिंता है कि किस क़िस्म के लोगों को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर बैठाया जाये। पिछले 20 सालों से भी अधिक समय से बीजेपी मध्यप्रदेश को बस लूटने में लगी है। पहले ये लूट मामा के नाम पर होती थी (व्यापमं घोटाला, ई-टेंडरिंग घोटाला, प्याज ख़रीद घोटाला आदि) अब यह चाचा के नाम पर चल रही है। चाचा जी के काल में एमपी में नगर निकायों में ख़रीददारी के नाम पर 5 रुपये/लीटर फिनायल 33500 रुपये/लीटर में, 306 रुपए की LED 11800 रुपए में खरीदी जा रही है। लेकिन पीएम मोदी के लिए यह सब अव्यस्वथा नहीं है। ऐसे मामलों में पीएम ‘चुपमैन’ का रूप धारण कर लेते हैं। पीएम मोदी की ‘फ्लैगशिप’ योजना हर घर में ‘नल से जल’ योजना में उनके गृहराज्य गुजरात में ही 123 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया लेकिन मोदी यहाँ भी चुपमैन बने रहे।
मोदी असल में अवसरवादी भाषणबाज़ हैं जिन्हें सिर्फ़ निन्दारस में डूबे रहना आता है, लेकिन उनकी असल में आलोचना हो तो उसे सहना और उसपर विचार करना नहीं आता। जिस निर्वाचन आयोग की पहचान पूरी दुनिया में ‘गोल्ड स्टैण्डर्ड’ के रूप में थी मोदी के काल में यह ऐसी अवस्था में पहुँच गया है कि इस पर कोई भी विपक्षी दल भरोसा नहीं करता है।
140 करोड़ की आबादी वाले चुनाव आधारित लोकतांत्रिक देश में यदि विपक्ष निर्वाचन आयोग पर ही भरोसा ना करे तो ये अव्यवस्था है, न कि निर्वाचन आयुक्त की शिकायत करना और उसका इस्तीफ़ा मांगना और न ही एक भ्रष्ट शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांगना अव्यवस्था है।
पीएम मोदी की विफलताएँ!
पीएम मोदी हर रोज़ यह सिद्ध कर रहे हैं कि भारत के लोगों से 12 साल पहले एक भारी गलती हुई जो इन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनाया। पीएम मोदी ना तो भारत की अर्थव्यवस्था सम्भाल सके और न ही भारत की सीमाओं की सुरक्षा को मज़बूत कर पाए और न ही यहाँ की संवैधानिक संस्थाओं को फ्री रहकर संविधान की रक्षा करने दिया। उनकी लायी गयी लगभग हर योजना असफल रही, लगभग हर नीति देश के लिए एक पैरालिटिक अटैक साबित हुआ। उन्होंने सिर्फ़ अपनी असफलताओं के झंडे गाड़े हैं। हर वो संस्था जो लोकतंत्र पर देश के लोगों का भरोसा बनाती है उसकी प्रतिष्ठा ख़राब हो चुकी है। लोकसभा अध्यक्ष का संसद में तौर-तरीका हो या लोकसभा उपाध्यक्ष के पद का पिछले 7 सालों से रिक्त होना हो, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायधीशों की नियुक्तियाँ और उनके बीजेपी आरएसएस से संबंध, इन न्यायालयों के सरकार समर्थक फैसले हों या जन मुद्दों पर उनकी अनदेखी इन सबने अपना भरोसा खोया है। भारत निर्वाचन आयोग और पुलिस तो ऐसी संस्थाएं बनकर उभरी हैं जिसे मोदी सरकार का हथियार कहा जायेगा और यह बात लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है।
देश बहुत ही दुविधा में हैं। एक तरफ़ ऐसे लोग हैं जो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हासिल करके संविधान और गांधी को फ़ासिस्ट बोल रहे हैं तो दूसरी तरफ़ सरकार है जो विरोध, असहमति और विपक्ष को ‘अव्यवस्था’ और ‘एनार्की’ फ़ैलाने वाला कह रही है। एक तरफ़ ऐसे लोग हैं जो लगभग 80 साल पहले इस दुनिया से जा चुके महात्मा गांधी के विचारों और उनके द्वारा उठाए गए क़दमों में ख़ामियाँ खोज रहे हैं और इन्हीं खामियों में पीएचडी कर रहे हैं जबकि यह समय संसदीय लोकतंत्र को बचाने और उसे संरक्षित करने का है।
दूसरी तरफ़ सरकार है जिसे भारत की अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के लिए काम करना चाहिए, जिसे भारत की संप्रभुता और वर्चस्व पर काम करना चाहिए वो भारत में नेता प्रतिपक्ष से लड़ रही है जबकि यह लड़ाई राजनैतिक और विचारधारात्मक धरातल पर होनी चाहिए। शायद, आरएसएस और बीजेपी का जेनेटिक मटेरियल ही ऐसा है कि उनके भीतर जो गुस्सा और प्रतिरोध चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से होना चाहिए, अमेरिका की भारत विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ होना चाहिए वो सब कांग्रेस पार्टी और गांधी नेहरू के ख़िलाफ़ उतार रहे हैं। जबकि कांग्रेस वो दल है जिसने इस देश के लिए अपने दो-दो प्रधानमंत्रियों की जान गँवाई है। राजनैतिक विरोध तो समझ में आता है लेकिन आरएसएस बीजेपी के भीतर कांग्रेस और गांधी-नेहरू से प्रतिशोध की भावना समझ से परे है।
देश की दशा और दिशा
पिछले 12 सालों में भारत बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। हर मोर्चे पर भारतीयों को शर्म और झेंप का सामना करना पड़ रहा है। संवैधानिक संस्थाएं डूबने की कगार पर हैं, अर्थव्यवस्था सिर्फ़ अंबानी अडानी का पोषण कर रही है, आम लोग नौकरियों की कमी और महंगाई से परेशान हैं, भारत के पासपोर्ट की हैसियत लगातार गिरती जा रही है, जेंडर गैप बढ़ रहा है(ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट, 2026-131वाँ स्थान), लोकतांत्रिक सूचकांक में भारत नीचे गिर रहा है, कानून और व्यवस्था सूचकांक में गिरावट साल दर साल हो रही है (86वाँ), पर्यावरण और हवा साँस लेने लायक नहीं है (भारत दुनिया का छठा सबसे प्रदूषित देश है और पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत की स्थिति 177 देशों में से 176वें स्थान पर है) और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो 12 सालों से कुर्सी पर बैठे हैं, उन्हें सारा ठीकरा राहुल गांधी, कांग्रेस और पूरे गांधी-नेहरू परिवार पर फोड़ना है। इसीलिए भारत अस्त-व्यस्त है क्योंकि जिसे काम करना चाहिए वो जगह-जगह जाकर देश के लोगों की चुगली कर रहा है, देश का अपमान कर रहा है। मुझे तो लगता है कि मोदी बुरी तरह असफल साबित हुए और वो अपने साथ इस विशाल देश को असफल कर बैठे हैं। उन्हें जिससे (अमेरिका, चीन, इसराइल आदि) सतर्क और सावधान रहना चाहिए उनके आगे गौरवविहीन तरीके से बाहें फैलाकर पड़े हैं और जिससे (राहुल गांधी समेत सम्पूर्ण विपक्ष) सहयोग और चर्चा करनी चाहिए उसे दुश्मन बनाकर बैठे हैं।
मुझे तो लगता है कि संघ और बीजेपी की राजनैतिक समझ जिस दर्जे की है उन्हें कभी सत्ता में नहीं आने देना चाहिए। अगर लोगों को बिना USA की कॉलोनी बने, एक आज़ाद मुल्क में रहना है तो उन्हें अगली बार चुनावों में और सतर्क रहना होगा।