संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य और प्रख्यात न्यायविद अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए 8 जून 1949 को संविधान सभा में कहा था कि ‘न्यायपालिका जनता की स्वतंत्रताओं की रक्षा करने वाली एकमात्र संस्था है, इसलिए उसकी स्वतंत्रता पर होने वाले किसी हस्तक्षेप, चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो, को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उससे सख्ती से बचाव किया जाना चाहिए। यह माना जाता है, कि न्यायपालिका खुद में इतनी शक्तिशाली नहीं होती कि वह कार्यपालिका और विधायिका के दबाव से पूरी तरह अपने को बचा सके। इसलिए यदि न्यायपालिका इन संस्थाओं पर निर्भर होने लगे या उनसे अत्यधिक जुड़ जाए, तो उसकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी और अंततः जनता की आज़ादी भी असुरक्षित हो जाएगी”।
विजय शाह केस पर जस्टिस श्रीधरन
जस्टिस अतुल श्रीधरन का मामला कुछ ऐसी ही आशंकाओं को जन्म दे रहा है जिससे जनता की आज़ादी ख़तरे में पड़ती जा रही है। जस्टिस अतुल श्रीधरन का नाम व्यापक रूप से चर्चा में तब आया जब उन्होंने बीजेपी नेता और मध्य प्रदेश में मंत्री विजय शाह के ख़िलाफ़ 14 मई, 2025 को कठोर आदेश पारित करते हुए पुलिस से फौरन FIR लिखने को कहा। आदेश इतनी तत्परता से दिया गया कि 4 घंटे के भीतर FIR दर्ज हो भी गई। मंत्री जी के ख़िलाफ़ ये आदेश पारित करने का सबसे ज़रूरी कारण यह था कि मंत्री जी ने भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया क़ुरैशी को अपमानित करते हुए उन्हें ‘आतंकवादियों की बहन’ कहा था। और मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के अंतर्गत काम कर रही पुलिस, मंत्री विजय शाह के ख़िलाफ़ कार्यवाही नहीं कर रही थी। मेरे लिए तब भी यह आश्चर्य था और आज भी है कि क्या कोई पार्टी इतना गिर सकती है कि हिंदू-मुस्लिम करने के लिए भारत की संप्रभु सेना के चरित्र पर भी दाग लगाने की इजाजत दे दे! लेकिन सच यही है कि बीजेपी इसी किस्म का राजनैतिक दल है, यहाँ राष्ट्र नहीं सांप्रदायिकता की पूजा की जाती है और इसके एक नहीं, अनेकों उदाहरण हैं। जस्टिस अतुल श्रीधरन बेहद ईमानदार न्यायाधीश हैं और समय-समय पर उन्हें इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है। जस्टिस श्रीधरन 2018 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश बने थे। 2023 से 2025 के बीच वो जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के न्यायाधीश रहे। उदारवादी और मूल अधिकारों के प्रति सतर्क जस्टिस श्रीधरन ने जम्मू कश्मीर में कई अहम और ऐतिहासिक फ़ैसले दिए और सरकारी, ख़ासकर केंद्र सरकार की मनमानी पर रोक लगाई। एक अहम मामला, 22 साल के शहजाद अहमद पल्ला का है जिसे 8 अप्रैल 2022 को पुलवामा पुलिस ने गिरफ्तार किया और फिर उसी दिन उसके ख़िलाफ़ जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट-1978(PSA) लगाकर निवारक हिरासत में ले लिया गया। उस पर ‘कट्टरपंथी’ होने का आरोप भी लगाया गया और कहा गया कि वो राज्य के लिए खतरा है। 19, जुलाई 2023 को जस्टिस श्रीधरन की एकल पीठ ने शहजाद के ऊपर से PSA हटा दिया और उसे रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि “कट्टरपंथी मुस्लिम का मतलब चरमपंथी और अलगाववादी नहीं हो सकता”। सोचने वाली बात ये है कि उन लोगों को जस्टिस श्रीधरन का ये फैसला अच्छा तो नहीं लगा होगा जिन्हें हर मुस्लिम आतंकवादी और देश विरोधी लगता है।
ऐसा ही एक मामला सुरजीत सिंह उर्फ़ सोनू का है जिसके ऊपर लगाया गया PSA, जुलाई 2024 को जस्टिस श्रीधरन ने न सिर्फ़ हटा दिया बल्कि जिस डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने यह आदेश दिया था उस पर व्यक्तिगत रूप से 10,000 रुपए जुर्माना लगाया। यह अपने आप में ऐतिहासिक फ़ैसला था क्योंकि शायद यह पहली बार था जब किसी अधिकारी पर उसके आदेश की अक्षमता को लेकर उस पर व्यक्तिगत जुर्माना लगाया गया था।
जस्टिस श्रीधरन PSA ही नहीं UAPA के मामलों में भी लगातार नागरिकोन्मुखी फैसले दे रहे थे। 'द कश्मीर वाला' के संपादक फहद शाह के मामले में उनकी अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 21 महीने से जेल में बंद फहद शाह को जमानत देते हुए कहा कि 2011 के किसी लेख के आधार पर आज UAPA लगाना उचित नहीं है।
इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के इस तर्क "भारत की गरिमा को ठेस पहुंचाना" एक आतंकवादी कृत्य है, को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए कहा कि अगर इस तर्क को मान लिया जाए, तो केंद्र सरकार की हर आलोचना आतंकवादी कृत्य कहलाएगी, जो संविधान के अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के खिलाफ है। इसके अलावा भी जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अवंतीपुरा हत्या केस और लिव-इन संबंधों पर कई क्रांतिकारी फैसले दिए। यह स्पष्ट था कि केंद्र में बैठी मोदी सरकार को यह सब रास नहीं आया होगा। वो स्वीकार ही नहीं कर सकते कि भारत में रीढ़युक्त न्यायपालिका अस्तित्व में बनी रहे।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट तबादला क्यों?
मुझे निश्चित रूप से नहीं पता, और किसी को कैसे पता भी हो सकता है, लेकिन जस्टिस अतुल के द्वारा दिए गए इन तमाम निर्णयों के कारण ही मार्च 2025 को उनका ट्रांसफर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट कर दिया गया और यह उनके कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनने से एक महीना पहले कर दिया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि वो मुख्य न्यायधीश नहीं बन सके। लेकिन एक सच्चा न्यायधीश किसी पद-विशेष के लिए नहीं अपने फैसलों के लिए जाना जाता है। एक महीने बाद ही मई 2025 में जस्टिस अतुल श्रीधरन फिर से केंद्र की आँख की किरकिरी बन गए जब उन्होंने मंत्री विजय शाह पर 4 घंटे के भीतर FIR दर्ज करने के आदेश दे दिए। कॉलेजियम में शामिल होने से रोकने की कोशिश?
बड़ी अफरा-तफ़री मची हुई थी क्योंकि जस्टिस श्रीधरन बहुत जल्द मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में 3 सबसे वरिष्ठ जजों में से एक बनकर कॉलेजियम में शामिल हो जाते। शायद इसीलिए जल्दी जल्दी अगस्त 2025 को तत्कालीन CJI बी आर गवई की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन का फिर से ट्रांसफर कर दिया। इस बार उन्हें छतीसगढ़ हाईकोर्ट भेजा जाना था। लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी जस्टिस अतुल वरिष्ठता में तीसरे स्थान पर होते यानी वे हाईकोर्ट कॉलेजियम का हिस्सा बन जाते और न्यायधीशों की नियुक्ति में उनकी भागीदारी होती। इस महत्वपूर्ण लोकेशन पर ऐसे न्यायधीश का होना नरेंद्र मोदी सरकार को पसंद नहीं आया और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से इस ट्रांसफर पर फिर से विचार करने को कहा। ताज्जुब की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र का सुझाव मान लिया और जस्टिस श्रीधरन का ट्रांसफर दो महीने के भीतर छत्तीसगढ़ से बदलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया। नवंबर 2025 को उन्होंने यहाँ शपथ ली। संभल मामले में जस्टिस श्रीधरन का फ़ैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी वरिष्ठता 7 नंबर पर है। यानी वो 2028 में अपने संभावित रिटायरमेंट तक फिर कभी कॉलेजियम का हिस्सा नहीं बन पाएंगे। और इस तरह मोदी सरकार का ‘मिशन’ पूरा हो गया। एक मिशन जिसमें हर स्वतंत्र आवाज़ को दबाना और हताश करना होता है। लेकिन इतने के बावजूद संविधान ने न्यायधीशों को वह ताक़त दी है कि अगर उनकी रीढ़ कमजोर न पड़े तो सरकार उन्हें झुका नहीं सकती। जस्टिस अतुल के साथ भी यही है। इसी मार्च माह में संभल और बरेली में नमाज़ को लेकर हुए विवाद पर जस्टिस श्रीधरन ने तीखी टिप्पणी की। संभल में मस्जिद के पास पुलिस द्वारा नमाजियों की संख्या सीमित करके 20 कर दी गयी थी, मतलब एक साथ 20 से अधिक लोग मस्जिद के पास नमाज़ नहीं कर सकेंगे। इस बात से नाराजगी जताते हुए जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि "अगर जिले के डीएम और एसपी कानून-व्यवस्था बनाए रखने में खुद को अक्षम महसूस करते हैं, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए"।
जस्टिस श्रीधरन ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी संपत्ति के भीतर नमाज पढ़ने या धार्मिक गतिविधियों के लिए सरकार से पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सभी नागरिकों के लिए समान है।
जस्टिस श्रीधरन को फ़ैमिली मामले क्यों दिए?
जस्टिस श्रीधरन की पीठ ने पुलिस प्रशासन की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें 'कानून-व्यवस्था' का हवाला देकर नमाज पर पाबंदी लगाई गई थी। बेंच ने कहा कि राज्य का कर्तव्य हर परिस्थिति में 'कानून का शासन' सुनिश्चित करना है, न कि इसके बहाने मौलिक अधिकारों में कटौती करना। ऐसे ही बरेली में नमाज़ से संबंधित विवाद में जस्टिस श्रीधरन ने एसएसपी और डीएम को तलब किया था। 23 मार्च 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के नए रॉस्टर में जस्टिस अतुल श्रीधरन को फ़िलहाल फ़ैमिली मामलों की अपील और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम से संबंधित मामले ही सुनने होंगे। मुझे पता नहीं, इसे क्या समझा जाये लेकिन देश की न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा बनी रहे इसलिए मैं इसे एक समान्य प्रक्रिया समझूँगी लेकिन नागरिक के तौर पर सभी लोग ऐसा समझेंगे मुझे ऐसा नहीं लगता।मुझे लगता है कि सरकार को यह नहीं समझ आ रहा था कि ऐसे इंसान से कैसे निपटा जाये जो संविधान और न्याय के प्रति इतना प्रतिबद्ध है। एक साल में तीन बार ट्रांसफर करवाने पर जो नहीं झुका, मुख्य न्यायधीश का पद छीन लेने से जो नहीं झुका, न्यायधीशों के लिए सबसे प्रिय स्थिति, ‘वरिष्ठता’ वह भी छीन लेने पर भी जो नहीं झुका उससे कैसे निपटा जाये। यहाँ तक कि वरिष्ठता में उनसे छोटे और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में उनके साथी न्यायधीश, जस्टिस एस ए धर्माधिकारी को मद्रास हाईकोर्ट का मुख्य न्यायधीश बना दिया गया।
जस्टिस धर्माधिकारी की एक अलग कहानी है। असल में 'द केरल स्टोरी 2: गोज़ बियॉन्ड' नाम की प्रोपगैंडा फ़िल्म 27 फ़रवरी को सिनेमाघरों में आने वाली थी। लेकिन 26 फ़रवरी 2026 को जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने फ़िल्म की रिलीज पर 15 दिनों की अंतरिम रोक लगा दी। जस्टिस थॉमस का कहना था कि फिल्म को 'U/A' सर्टिफिकेट देते समय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने "दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया"। जस्टिस थॉमस ने मौखिक रूप से कहा कि ‘केरल पूर्ण सद्भाव में रहता है’ और फिल्म का ट्रेलर राज्य की गलत छवि पेश करता है, जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।
जस्टिस थॉमस के इस स्थगन आदेश के तुरंत बाद, फ़िल्म निर्माता ने अपील दायर की। 27 फरवरी 2026 को जस्टिस एस.ए. धर्माधिकारी और जस्टिस पी.वी. बालकृष्णन की डिवीजन बेंच ने ‘इमरजेंसी’ में देर रात तक सुनवाई करके फ़िल्म रिलीज पर लगी रोक को हटा दिया। इस आदेश के 5 दिन बाद जस्टिस धर्माधिकारी, जस्टिस अतुल श्रीधरन की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश बना दिए गए।
जिस तरह का व्यवहार जस्टिस अतुल श्रीधरन के साथ किया गया है लगभग वैसा ही व्यवहार जस्टिस आक़िल क़ुरैशी और जस्टिस मुरलीधर के साथ भी किया गया। दोनों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया जिससे वो किसी भी हालत में सुप्रीम कोर्ट न पहुँच सकें। मोदी सरकार कामयाब हो गई लेकिन नागरिकों के हित में फैसले लेने वाले इन न्यायधीशों के सर्वोच्च अदालत में ना पहुँच पाने के कारण देश के नागरिक हार गए। और जिस लोकतंत्र में नागरिक सरकार से हार जाते हैं उससे अधिक खोखला और बदनसीब लोकतंत्र कोई और नहीं होता।
ऐसा लगता है कि संसद से लेकर न्यायपालिका तक सबकुछ कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथ में और उनकी व्यक्तिगत इच्छाओं का खेल बन गया है। यह ख़तरनाक़ है। सरकार संप्रभु होनी चाहिए लेकिन सर्वशक्तिमान सरकार देश को अंधकार में और तानाशाही में धकेल सकती है।
तानाशाही की परिभाषा
अमेरिकी संविधान के पिता कहे जाने वाले जेम्स मैडिसन ने अपने एक निबंध में लिखा था कि “कानून बनाने की, सरकार चलाने की और अदालत की सारी शक्तियाँ अगर एक ही जगह में जमा हो जाएँ, चाहे वह एक व्यक्ति के पास हों, कुछ लोगों के पास हों या कई लोगों के पास हों, और चाहे वह विरासत में मिली हों, खुद ने खुद को चुना हो या चुनाव के माध्यम से आई हों, तो इसे सही मायने में तानाशाही की परिभाषा कहा जा सकता है।”यह स्पष्ट है कि भारत की न्यायपालिका स्वायत्तता के संकट से गुज़र रही है। इसे नागरिकों के समर्थन की ज़रूरत है। यदि ये सारी बातें सही तरीक़े से और न्यायपालिका की अस्मिता को बिना चोट पहुँचाये लोगों तक पहुँच जाएँगी तो शायद जनता आने वाले चुनावों में अपने देश की लुटती और ढहती हुई संस्थाओं का हिसाब ले सके।