नरेंद्र मोदी का कार्यकाल सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री के कार्यकाल के रूप में नहीं बल्कि एक लंबी राष्ट्रीय आपदा के रूप में भी जाना जाएगा। एक ऐसी आपदा जिसने भारतीय लोकतंत्र को गहरी चोटें पहुंचाईं, भारत की गंभीर नागरिक चेतना को नुक़सान पहुंचाया, भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया, भारत के जंगलों को काटकर पारिस्थितिकी को बर्बाद किया, भारत में स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार को पूरी तरह तबाह कर दिया। भारत में रहने वाले लोगों पर हर मनमानी बात थोपी गयी और यह जारी है, फिर चाहे बात एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की हो या खास किस्म के भोजन, पहनावे और भाषा की। भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और देश दो बड़े उद्योगपतियों की मिल्कियत बनता जा रहा है। सरकार किसी नागरिक विरोध और प्रदर्शन का जवाब नहीं देती और आलोचना को देशद्रोह का स्वरूप दे दिया गया है। ये सारी घटनाएँ मात्र 12 सालों में और बहुत तेजी से घटी हैं और जारी हैं।

सच्चाई तो यह है कि नरेंद्र मोदी अपनी व्यक्तिगत और वैचारिक खामियों की वजह से भारत के सामने लगातार चुनौतियाँ खड़े करते जा रहे हैं। संप्रभुता इसमें एक जरूरी मुद्दा है। आज़ादी के समय जब भारत ने ब्रिटिश कॉमनवेल्थ में बने रहने का निर्णय लिया तो इसकी बहुत आलोचना की गई। संघी ‘विचारकों’ ने इसे भारत की संप्रभुता पर चोट कहा। पीएम जवाहरलाल नेहरू की आलोचना की गई। जबकि नेहरू यह बात स्पष्ट कर चुके थे कि “यह स्वेच्छा से किया गया करार है और इसे स्वेच्छा से समाप्त किया जा सकेगा।”
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भारत का गणराज्य बनना 

उस समय कॉमनवेल्थ में वो देश आते थे जो ब्रिटिश ‘क्राउन’ के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते थे। नियम यह था कि जैसे ही कोई देश ख़ुद को गणराज्य घोषित करेगा वो कॉमनवेल्थ का सदस्य नहीं रहेगा। तमाम देश ब्रिटिश सत्ता के साथ जुड़े रहना चाहते थे इसलिए वो स्वतंत्र रहते हुए भी ख़ुद को गणराज्य घोषित नहीं करते थे। लेकिन 9 दिसंबर 1946 को बैठी स्वतंत्र संविधान सभा जिसपर भारत के लिए एक अच्छे संविधान बनाने की ज़िम्मेदारी थी वो अपने इरादे स्पष्ट कर चुकी थी। ब्रिटिश जानते थे कि संविधान बनते ही भारत गणराज्य बन जायेगा और इस तरह वो कॉमनवेल्थ का सदस्य नहीं रहेगा। ब्रिटिश जानते थे कि नेहरू के नेतृत्व में भारत एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा। एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिसके लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाएगी। ऐसे में ब्रिटिश चाहते थे कि ऐसे प्रगतिशील नेतृत्व वाले भारत से उनके रिश्ते जुड़े रहें, इसलिए नवंबर 1949 में संविधान के तैयार होने से पहले ही अप्रैल 1949 में कॉमनवेल्थ की सदसायता का नियम बदल दिया गया। नियम बदलने के कारण अब पूर्ण रूप से स्वतंत्र गणराज्य भी कॉमनवेल्थ के सदस्य बने रह सकते थे। यह नेहरू का भारत था।

नरेंद्र मोदी का भारत

आज स्थितियां 180 डिग्री पलट चुकी हैं। अब भारत के प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी हैं। जिनके बारे में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, राहुल गांधी की साफ़ राय है कि वो अमेरिका के दबाव में काम कर रहे हैं और कंप्रोमाइज्ड हैं। जिस तरह दबाव में आकर ऑपरेशन सिंदूर रोका गया, जिस तरह अमेरिका के साथ भारत के हितों के ख़िलाफ़, ट्रेड डील करने को भारत बाध्य हुआ, जिस तरह भारत को रूसी और ईरानियन तेल ख़रीदने से रोका गया, बेहद महंगा और भारत की रिफाइनरी से असंगत वेनेजुएला का तेल ख़रीदने को मजबूर किया गया, जिस तरह नेवी अभ्यास के लिए भारत के मेहमान के रूप में आए ईरानी युद्धक विमान IRIS देना पर भारत की सीमा के निकट हमला करके 87 ईरानी नेवी अफसरों को मार दिया गया, जिस तरह भारत के तीन नाविकों को मार डाला गया और भारत कुछ नहीं कर सका, यह इस बात का सबूत है कि भारत की संप्रभुता सार्वकालिक और बड़े खतरे से जूझ रही है। 

जिस तरह भारत के हितों को ताक पर रखकर, गौतम अडानी को बचाया जा रहा है, आज का भारत नेहरू के भारत से अलग एक अलग तरह का ही भारत बन चुका है। मुट्ठीभर लोगों के हितों के संरक्षण में भारत की संप्रभुता तबाह की जा रही है, यही है नरेंद्र मोदी के दौर का भारत।

नेहरू का भारत

फ़र्क़ साफ़ है एक वक़्त था कि सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता नेहरू के भारत से संबंध बनाये रखने के लिए बदलाव कर रही थी। एक वक़्त था जब नेहरू इंडो-चीन संकट (1946-1954), कोरियाई युद्ध (1950-53), स्वेज नहर संकट (1956) और काँगो संकट (1960) सुलझा रहे थे। नेहरू भारत की ख्याति बढ़ा रहे थे, यह बता रहे थे कि यह देश गांधी का है। यहाँ अहिंसा ऐसे अदम्य साहस के साथ रहती है कि बर्बरता को मुँह छिपाने की जगह भी नहीं मिलती। नेहरू द्वारा दिए गए ‘6-सूत्रीय शांति प्रस्ताव’ (इंडो-चीन मामले में), ‘नेहरू का मध्यस्थता फार्मूला’ (कोरिया युद्ध) ने भू-राजनीति को भारत की तरफ़ मोड़ दिया था। कांगो मामले में तो नेहरू जी ने जिस तरह तत्काल 5000 शांति सैनिकों को भेजकर काँगो को अस्थिरता से बाहर निकाला वह मिसाल थी। स्वेज नहर मामले में जब ब्रिटेन, फ्रांस तथा इसराइल ने मिस्र पर हमला कर दिया, तब नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा संभाल लिया। 1 नवंबर 1956 को हैदराबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरू ने इस आक्रमण को ‘स्पष्ट और नग्न आक्रमण’ करार दिया था। नेहरू के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने इसे ‘औपनिवेशिक आक्रमण का एक पुराना और क्रूर रूप’ कहा, जिसे आधुनिक दुनिया में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह नेहरू थे, यह उनका क़द था। भारत तब ऐसा था; नैतिक, साहसी, लोकतांत्रिक और सजग!
दूसरी तरफ़, आज जिस भारत में नरेंद्र मोदी सत्ता के शिखर पर हैं उसे ट्रम्प जैसा अस्थिर दिमाग़ का व्यक्ति लगातार झिड़क रहा है। भारत को किसी भी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटना में भाग लेने और समाधान खोजने लायक नहीं समझा जा रहा है। उसका कारण भी स्पष्ट है, वो ये कि जिस नेता के नेतृत्व में भारत की भारी और मजबूत लोकतांत्रिक विरासत को कमजोर किया जा रहा है, जिसके नेतृत्व में भारत के ही लोगों की आवाज़ दबाई जा रही हो, जिसके लिए विपक्ष, प्रतिरोध और बहस बाधा हो, जिसके लिए लोगों के रसोईघरों में मुँह घुसाना सांस्कृतिक प्रश्न हो, विरासत का प्रश्न हो ऐसे पिछड़े व्यक्ति के नेतृत्व वाले भारत को विश्व समुदाय कोई समस्या सुलझाने लायक नहीं समझता है। जो अपने ही देश की लोकतांत्रिक विरासत न बचा पाये, अपने स्वतंत्रता सेनानियों को अपमानित करे, अपनी ही न्यायपालिका को खलनायक बनाये उसे वैश्विक समुदाय ‘इस्तेमाल’ के लायक तो समझ सकता है लेकिन पास बिठाकर ज़रूरी फैसले लेने लायक नहीं समझता।

प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी

भारत के संविधान ने जिस तरह के संघीय ढाँचे को चुना है उसमें केंद्र सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री का सबसे मुख्य काम है भारत की संप्रभुता की रक्षा करना, एक स्वतंत्र विदेश नीति बनाये रखना और साथ ही लगातार ऐसी व्यापार नीति को लागू करना है जो भारत और यहाँ के लोगों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई हो। लेकिन जिस तरह के घटनाक्रम पिछले कुछ सालों में दिखे हैं उससे यह साफ़ है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ऐसा कुछ भी करने में विफल रही है।

 मोदी सरकार में चुनाव आयोग

नरेंद्र मोदी सरकार असल में जो काम कर रही है उसमें भारत के हितों का ख़याल करना नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के व्यक्तिगत हितों की रक्षा करना रहा है। लगातार चुनावी जीत फिक्स हो सके इसलिए भारत निर्वाचन आयोग के माध्यम से एक समावेशी लोकतांत्रिक व्यवस्था को विशिष्ट लोगों की व्यवस्था में तब्दील कर दिया गया है। भारतीय संविधान की मार्गदर्शक, प्रस्तावना में सिर्फ़ ‘भारत के’ लोगों की महिमा है, यहाँ हर एक प्रावधान भारत के लोगों के सापेक्ष ही निर्धारित किया गया है। लेकिन 6 करोड़ भारत के लोगों को मतदाता सूची से ऐसे बाहर कर दिया गया जैसे वो देश के नागरिक ही ना हों। यह सब इसलिए किया गया जिससे नरेंद्र मोदी के लिए भविष्य में आने वाले हर चुनाव में जीत फिक्स करने वाली ‘मतदाता सूची’ तैयार की जा सके और इस जीत की मदद से भारत के संविधान को बदलकर ऐसे ढांचे में ढाला जा सके जो उनके ‘गुरु जी’ के ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ और ‘वी’ जैसी भारत विरोधी सोच से मेल खाता हो।
अपने मन का चुनाव आयोग, अपने मन की मतदाता सूची, अपने मन की चुनाव आचार संहिता, और इस तरह अपने मन की विधायिका और अपने मन का विधायी कार्य, अपने मन के कानून और अपने मन का संविधान संशोधन। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। इसीलिए मोदी को ना किसी आंदोलन की फ़िक्र है, ना विरोध प्रदर्शन की। तभी तो 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को पूछने के लिए सरकार का कोई भी नुमाइंदा नहीं आया। और अंततः उनकी तबीयत बिगड़ने की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। सोनम वांगचुक भारत के प्रतियोगी छात्रों की तरफ़ से अनशन पर बैठे थे। वैसे तो पिछले 10 सालों में 152 प्रश्नपत्र लीक हो चुके हैं, 7.5 करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए हैं लेकिन सजा किसी को नहीं हुई। लेकिन हाल में लीक हुए NEET-UG 2026 के पेपर के बाद हालात क़ाबू से बाहर निकल गए और लगभग 15 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इन सबके लिए ज़िम्मेदार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए वांगचुक ने अनशन किया लेकिन सरकार को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

यहाँ सवाल सोनम वांगचुक या हाल में बनी कॉकरोच पार्टी का नहीं है। सवाल यह है कि कोई भी माँग भारत की संसद से उठे या भारत की सड़कों से, नरेंद्र मोदी भारत के लोगों की मांगों पर कोई जवाब ना देकर बस ‘चुपमैन’ बन जाते हैं, चुप्पी साधकर वे आख़िर क्या साबित करना चाहते हैं?

क्या वो यह कहना चाहते हैं कि वो पीएम पद पर रहकर कितनी भी गलतियाँ करें और उनसे भारत के कितने भी लोग प्रभावित हों, चाहे जितने लोग आत्महत्या कर लें, मैं ना कोई जवाब दूँगा और न ही इसके लिए जिम्मेदार किसी मंत्री को पद से हटाऊँगा? “न खुद पद से हटूंगा न ही अपने मंत्रियों को पद से हटाऊंगा”, मोदी के रवैये से तो मुझे यही लग रहा है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी भारतीय राजनीति के लिए कुष्ठ बनती जा रही है। चुनाव आयोग की मदद से जीते जा रहे हर प्रदेश में ऐसे नेताओं को मुख्यमंत्री के पदों पर आसीन किया जा रहा है जिनके ज़िम्मेदारी में भरपूर भ्रष्टाचार पनप सके। पूरा देश जानता है कि इन प्रदेशों के लिए मुख्यमंत्री का चुनाव अमित शाह और नरेंद्र मोदी जैसे नेता करते हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार रिस रिसकर बाहर निकल रहा है तो ये दोनों नेता कहीं मुँह छिपाकर बैठे हुए हैं। अगर बीजेपी को ‘भ्रष्टाचारी जनता पार्टी’ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
विमर्श से और

सीएजी की रिपोर्ट

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (CAG Report 2024) की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार के अंतर्गत 6 ऐसे 'घोस्ट हॉस्टल्स' (फर्जी हॉस्टल) मिले हैं जिनमें एक भी छात्र नहीं था। मतलब सबकुछ काग़ज़ी था। बिना किसी छात्र के इन गैर-कार्यात्मक हॉस्टलों को 2020 से 2024 के बीच 1.62 करोड़ रुपये का सरकारी फंड जारी किया गया। महाराष्ट्र में ही CAG की एक ऑडिट रिपोर्ट में महाराष्ट्र सरकार की फ्लैगशिप 'मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना' में 3500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च और बजट नियमों का उल्लंघन पाया गया है।

ऐसे ही मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के अंतर्गत 125 प्राइवेट बी.एड कॉलेज जमीन पर गायब पाए गए हैं। जिन पतों पर ये कॉलेज रजिस्टर्ड थे, वहाँ या तो खाली मैदानों में भैंसें चर रही थीं, इमारतें लॉक थीं या फिर वहाँ सिलाई-कढ़ाई के केंद्र चल रहे थे। इन तमाम भ्रष्टाचारों को लेकर नरेंद्र मोदी कभी एक शब्द भी नहीं बोलते।

मोदी एक राष्ट्रीय आपदा बन चुके हैं। जिन्हें न अपने देश के आम नागरिकों की चिंता हैं और न ही देश की लोकतांत्रिक विरासत की। उन्हें न जंगलों के लुटने, कटने और बर्बाद होने की चिंता है और न ही इस बात की चिंता है कि भारत पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक 2026 में 177 देशों में से 176वें स्थान पर पहुँच चुका है। चाहे जग्गी वासुदेव हों या गौतम अडानी या साधुवेश उद्योगपति रामदेव सभी को भारत के पर्यावरण के साथ खेलने और उसे बर्बाद करने का लाइसेंस नरेंद्र मोदी ने निर्लज्जता से दे दिया है। आम लोगों को ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे अभियानों से व्यस्त रखा जाता है और दूसरी तरफ़ देश के लाखों साल पुराने जंगलों को काटने की अनुमति प्रदान कर दी गयी है। यह सब खुलकर इसलिए चल रहा है क्योंकि लोग जो सच में नरेंद्र मोदी से नाराज हैं, उन्हें और उनकी नाराज़गी को निपटाने का काम चुनाव आयोग को दे दिया गया है, जो उन्हें अपनी नाराज़गी को लोकतांत्रिक तरीके से जाहिर करने के अधिकार से वंचित कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को खुली छूट दे रखी है और चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी के इशारों की भाषा समझता है। इस तरह हजारों लाखों लोगों के बलिदानों के बाद मिली आज़ादी और संविधान को तबाह किए जाने की प्रक्रिया एक फैक्ट्री की तरह चल रही है। अगर इसे आपदा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? मुझे नहीं पता!