महात्मा गांधी और सरदार पटेल दोनों मानते थे कि पंडित जवाहरलाल नेहरू में एक बेहद परिपक्व अंतरराष्ट्रीय दृष्टि है और साथ ही यह भी कि उनकी देशभक्ति और उनकी अंतरराष्ट्रीय दृष्टि को एक साथ जोड़कर ही देखा जाना चाहिए।

नेहरू की विदेश नीति

जवाहरलाल नेहरू वो नेता थे जिन्हें भारत को आज़ाद करवाने और आज़ाद भारत का नेतृत्व करने को मिला। उन्होंने औपनिवेशिक शासन को बहुत क़रीब से देखा था, उसकी ज्यादतियाँ देखी थीं। उन्हें पता था कि असल में पश्चिमी देश भारत जैसे देशों को किस नज़र से देखते हैं। तमाम अन्य प्रगतिशील भारत के शुरुआती निर्माताओं की तरह नेहरू भी पश्चिम के नहीं बल्कि पश्चिमीकरण के ख़िलाफ़ थे और ब्रिटेन व अमेरिका जैसे देशों की नीयत और भारत से उनकी अनावश्यक आकांक्षाओं को बखूबी समझते थे इसलिए उन्होंने द्वतीय विश्वयुद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में एक अलग राह बनाने की सोची। उन्होंने एक ऐसी विदेश नीति की संकल्पना की जिससे ‘तीसरी दुनिया’ के देशों को फ़ायदा हो और उन्हें विकास करने का मौक़ा मिले। इस विदेश नीति की नींव में था 120 विकासशील देशों का एक आंदोलन जिसे ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) की संज्ञा दी गई। 1955 के बांडुंग सम्मेलन के बाद 1961 में बेलग्रेड में हुए एक सम्मेलन में इस नीति को आधिकारिक कर दिया गया। यह एक ऐसी नीति थी जिसमें अमेरिका या रूस (तत्कालीन USSR) में से किसी भी खेमे में जाने से परहेज किया जाना था। नए नए आज़ाद हुए तमाम अफ़्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों ने इसे अपनी विदेश नीति के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में स्वीकार किया। और एक झटके में भारत ‘ग्लोबल साऊथ’ की आवाज़ बन गया। भारत एक ऐसी आवाज़ बन गया जो दुनिया के किसी भी देश से बात कर सकता था लेकिन उसने अपनी विदेश नीति को पूरी तरह स्वायत्त और संप्रभु बनाये रखा।
नेहरू ने विश्व युद्ध देखा था, वो जानते थे कि कैसे पश्चिमी देश सिर्फ़ अपने हितों के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। पश्चिमी देशों के लिए भारत सहित तमाम ग्लोबल साउथ के देश के नागरिकों की जान की कोई खास कीमत नहीं थी। इसीलिए नेहरू ने किसी भी ‘सुपर पावर’ के साथ जुड़ने से इनकार कर दिया और अपने देश को उन्नत और मजबूत बनाने में लग गए, पर्याप्त मात्रा में अन्न उगाने में, संस्थानों को बनाने और लोकतंत्र को मजबूत करने में। पर इसका मतलब ये नहीं था कि जवाहरलाल नेहरू ने वैश्विक घटनाओं पर ध्यान देना बंद कर दिया। असलियत तो यह है कि गुटनिरपेक्ष देशों के नेता के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया की हर एक ज़रूरी घटना पर न सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए क्रांतिकारी योगदान भी दिया।
ताज़ा ख़बरें

नरेंद्र मोदी की विदेश नीति

आज नेहरू नहीं हैं और देश के प्रधानमंत्री के रूप में भारत के पास नरेंद्र मोदी हैं जो पिछले 12 सालों से पीएम की कुर्सी पर हैं। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी कहते हैं कि पीएम मोदी ‘कंप्रोमाइज्ड’ हैं। मुझे नहीं पता कि वो कंप्रोमाइज्ड हैं या नहीं लेकिन वो भारत के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री जरूर हैं। पिछले 12 सालों में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने लगभग हर पड़ोसी देश के साथ अपने संबंध बिगाड़ लिए। भारत की नाक के नीचे श्रीलंका ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अपना हंबनटोटा बंदरगाह 99 सालों के लिए चीन को लीज पर दे दिया, नेपाल की भारत पर निर्भरता कम होकर चीन से बढ़ गई है, मालदीव भी भारत के हाथों से खिसक गया, उसने भारत के ख़िलाफ़ अपमानजनक ‘इंडिया आउट’ की नीति अपनाई और भारत को वहाँ से अपना सैन्य बेस हटाना पड़ा। चीन अब भूटान को भी अपने पास लाने की तैयारी कर रहा है। 2021 के ‘थ्री स्टेप रोडमैप एग्रीमेंट’ और मार्च, 2025 में भूटान की राजधानी थिम्फू में चीनी नए वर्ष को चीन और भूटान द्वारा सह-मेजबानी करना और तिब्बत को चीनी नाम से संबोधित किया जाना यह सब इसी ओर संकेत है, जो बताते हैं कि पड़ोसी देशों के साथ क्या चल रहा है, इसके अलावा आज पाकिस्तान के साथ भी भारत के संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं।

शायद अपने पड़ोसी देशों से संबंध बिगाड़ने से भी पीएम मोदी का पेट नहीं भरा था कि उन्होंने मध्य-पूर्व में अपने सबसे ज़रूरी और विश्वासपात्र सहयोगी ईरान के साथ भी संबंध ख़राब कर लिए।

भारत ईरान के बीच संबंध

1950 से ही भारत ईरान के बीच के संबंध बहुत मजबूत रहे हैं। इसके पीछे, जैसा कि हाल में हुए रायसीना डायलॉग, दिल्ली में ईरान के उप-विदेश मंत्री ने कहा, दोनों देशों के बीच सदियों पुरानी साझा सांस्कृतिक विरासत है। यहाँ तक कि 1979 में हुए इस्लामिक रिवोल्यूशन के बाद ईरान ने ‘ना पूर्व, ना पश्चिम’ की नीति अपनाई जोकि गुटनिरपेक्ष नीति का ही एक रूप था। भारत के साथ ईरान के संबंध लगातार बेहतर होते गए 2003 में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी को गणतंत्र दिवस परेड पर मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया। 2016 में लंबे समय से चल रही बातचीत के बाद भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसी समझौते को लेकर मोदी इतना भावविह्वल थे कि एक टीवी इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि ‘चाबहार पोर्ट को लेकर मेरा बहुत बड़ा काम हो गया है जी’। 

भारत पर प्रतिबंध की अमेरिकी धमकी

इस बीच अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाने को लेकर लगातार धमका रहा था। लेकिन भारत का फाउंडेशन इतना मजबूत है कि भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर कोई चिंता नहीं थी। अमेरिकी धमकी के बीच ही मई, 2024 में मोदी सरकार ने चाबहार पोर्ट के शाहिद बहेश्ती टर्मिनल को लेकर ईरान के साथ 10 साल का समझौता कर लिया और पोर्ट में अवसंरचना विकास के ऋण व मशीनरी ख़रीद के लिए कुल मिलाकर 37 करोड़ डॉलर का वादा किया। इसी माह मई में ही भारत के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री अमीर-अब्दुल्लाहियन के अंतिम संस्कार में शामिल होने तेहरान गए थे, जिनकी मौत हेलीकॉप्टर क्रैश के कारण हो गई थी। इसके बाद ईरान में नया नेतृत्व आया। मोदी जितना जल्द से जल्द हो सके इस नेतृत्त्व से मिलना चाहते थे। अक्टूबर 2024 में इसका मौक़ा मिल गया जब कज़ान, रूस में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी ने ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियाँ से सम्मेलन के इतर जाकर बातचीत की।
विमर्श से और
भारत लगातार ईरान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था। मई 2025 में ईरान और भारत के विदेश मंत्री दिल्ली में नियमित रूप से जॉइंट कमीशन मीटिंग के लिए मिले। जब एक महीने बाद जून में इसराइल ने ईरान पर हमला किया तो पीएम मोदी ने चिंता व्यक्त करते हुए नेतन्याहू और पेज़ेश्कियाँ दोनों से बात की और बातचीत की टेबल पर आने को कहा। मोदी वही कर रहे थे जो भारत करता रहा है। एक बड़े और जिम्मेदार लोकतान्त्रिक देश होने के नाते बातचीत करने और युद्ध ख़त्म करने की वकालत करना। सितंबर, 2025 में भारत और ईरान ने अपने कूटनीतिक संबंधों की 75वीं वर्षगाँठ को मनाया और एक महत्वपूर्ण चीनी बॉर्डर रोड इनिशिएट (BRI) का प्रतिद्वंद्वी 7200 किमी लंबे नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के विकास पर चर्चा की गई जिसका उद्देश्य मुंबई, तेहरान, मॉस्को और बाकू को समुद्र, रेल और रोड से जोड़ना है।

असल में मोदी ईरान को लेकर बड़े ही उत्साहित थे और लगभग वही नीति अपना रहे थे जो पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने अपनाई थी। भारत-ईरान के बीच संबंध बिल्कुल सामान्य थे। भारत के ऊपर अमेरिकी टैरिफ धमकियों का भी कोई असर नहीं था। अगस्त 2025 तक ट्रम्प भारत पर 50% का टैरिफ लगा चुका था लेकिन भारत झुका नहीं था।

एपस्टीन फाइल्स विवाद

19 नवंबर, 2025 को ट्रम्प ने एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए। इसका मतलब था कि अब एक महीने के भीतर न्याय विभाग को फाइल्स को सार्वजनिक करना ही होगा। 19 दिसंबर 2025 को फाइल्स का पहला बैच जारी किया गया, अभी तक सबकुछ सामान्य था। लेकिन जैसे ही 30 जनवरी 2026 में 30 लाख और फाइल्स जारी की गईं और उनमें पीएम मोदी, मंत्री हरदीपपुरी और अनिल अंबानी का नाम और उनके मिलनसार संबंध उजागर होने शुरू हुए कहानी बदलनी शुरू हो गई। 31 जनवरी को फाइल्स से एक ईमेल बाहर आया जिसमें नाबालिग बच्चियों के बलात्कार का दोषी प्रेसिडेंट ट्रम्प का ‘मित्र’ एपस्टीन दावा कर रहा था कि ट्रम्प की सलाह पर मोदी 2017 में इसराइल की यात्रा पर गए। जिस दिन पीएम मोदी की 2017 की इसराइल यात्रा ख़त्म हुई उस दिन के एक ईमेल में एपस्टीन कहते हुए पाया गया कि ‘भारतीय प्रधान मंत्री मोदी ने सलाह ली और अमेरिकी राष्ट्रपति के लाभ के लिए इसराइल में नृत्य किया और गाया। वे कुछ हफ्ते पहले मिले थे। यह काम कर गया! (sic)"। यह सब बहुत तेजी से पूरे देश दुनिया में फ़ैल गया। अगले दिन 1 फ़रवरी को मोदी सरकार ने बजट पेश किया और जिस चाबहार पोर्ट और ईरान को लेकर इतनी उत्सुकता थी उस पोर्ट के लिए बजट में कोई धनराशि आवंटित ही नहीं की गई। इसके अगले दिन 2 फ़रवरी, 2026 को भारत ने अमेरिका के साथ ‘ट्रेड डील’ साइन कर ली, जिसे तमाम विपक्षी नेताओं ने शर्मनाक और पीएम मोदी का ‘अमेरिका के सामने सरेंडर’ की संज्ञा दी।

युद्ध से पहले पीएम इसराइल क्यों गये?

अब सबकुछ उल्टी दिशा में और बहुत तेज बदल रहा था। तमाम आशंकाओं के बावजूद पीएम मोदी 25 फ़रवरी को दो दिवसीय यात्रा पर इसराइल पहुँच गए। जिस ईरान के साथ गले मिल रहे थे उसी के दुश्मन देश को उसके साथ खड़े रहने का वादा करके चले आए। पीएम मोदी के भारत वापस आने के दूसरे दिन 28 फ़रवरी को सुबह सुबह अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर अचानक हमला कर दिया। अगले दिन ईरान के सर्वोच्च नेता समेत तमाम बड़े लोग एक हमले में मारे गए। लेकिन ताज्जुब की बात कि भारत के उसी पीएम ने जिसे चाबहार उसका अपना ‘बड़ा काम’ लग रहा था, जिसकी सरकार ने एक साल पहले ही अपने उपराष्ट्रपति को अंतिम संस्कार के लिए ईरान भेजा था, 4 महीने पहले ही जिस देश के साथ कूटनीतिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने पर हर्षोल्लास मनाया था उस देश के सबसे प्रिय और सर्वोच्च नेता की हत्या हो जाने के बाद पीएम मोदी ने फ़ोन पर बातचीत तो बहुत दूर, ईरान के दुःख में एक ट्वीट भी करना ज़रूरी नहीं समझा, उनको श्रद्धांजलि तक नहीं दी। जिस हिन्द महासागर में भारत की तूती बोलती थी उसी हिन्द महासागर में अमेरिका ने घुसकर उस निहत्थे ईरानी शिप को डुबो दिया जो भारत का मेहमान बनकर आया था। इस हमले में लगभग 140 ईरानी नेवी अधिकारी शहीद हो गए।
सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें
पीएम नरेंद्र मोदी, ट्रम्प और नेतन्याहू और एपस्टीन के बीच क्या संबंध थे, मुझे नहीं मालूम। कोई संबंध थे भी या नहीं, मुझे यह भी नहीं मालूम। लेकिन जिस तरह घटनाक्रम आगे बढ़ा है कोई भी समझ सकता है कि सबकुछ सामान्य नहीं है। इस मुद्दे पर देश के लोगों द्वारा सोचा जाना चाहिए और पीएम मोदी से सवाल किए जाने चाहिए। आख़िर ऐसा क्या हुआ कि भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता खो दी? आख़िर ऐसा क्या हुआ कि एक फ्रिंज राष्ट्रपति ट्रम्प भारत को लगातार धमका रहा है, पीएम मोदी का करियर बर्बाद करने की धमकी दे रहा है? अमेरिका का वित्त मंत्री भी भारत को आदेश दे रहा है कि कब तेल खरीदना और कब बंद करना है, किस देश से तेल लेना है किस देश से बंद करना है। मेरी नजर में यह भारत की गरिमा और गौरव के ख़िलाफ़ है। भारत ने 75 सालों में इतनी सेना, इतना शौर्य और पराक्रम इसलिए विकसित नहीं किया कि एक 8000 किमी दूर बैठा आदमी भारत के प्रधानमंत्री को धमका सके और एक करोड़ आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला आधुनिक हिटलर नेतन्याहू, भारत के लिए फैसले ले।

ट्रंप के ख़िलाफ़ चुप्पी क्यों?   

मोदी सरकार अपने इन कार्यों और देश के अपमान को काउंटर करने के लिए कुछ नहीं कर रही है। पीएम मोदी से ट्रम्प के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं निकलता लेकिन जिस आदमी ने भारत को आज़ाद करवाया, 10 सालों तक ब्रिटिश हुकूमत ने जिसे जेल में रखा, जिसने भारत की नींव रखी, देश की साख बनाई उसे नीचा दिखाना, उसकी बुराई करने में मोदी कभी नहीं चूकते। संसद का शायद ही कोई भाषण हो जब पीएम मोदी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपमानित ना किया हो। यह बहादुरी नहीं कमजोरी है। नेहरू कभी कंप्रोमाइज्ड नहीं रहे उन्होंने स्वतंत्र भारत की स्वायत्त विदेश नीति की नींव रखी। बिना नेहरू के कोरिया युद्ध (1950-53), स्वेज संकट (1956), हंगरी की क्रांति (1956) और कांगो संकट (1960-64) जैसे मुद्दों के समाधान के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। वैसे तो तुलना बेमानी है पर दूसरी तरफ़ पीएम मोदी हैं जो वैश्विक संकट में कोई किरदार निभा सकें यह तो बहुत दूर की बात है, मोदी तो भारत के दोस्तों को भी समेट नहीं पा रहे हैं, साथ नहीं दे रहे हैं जिसकी वजह से भारत के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में एक कमजोर देश होने का संकेत जा रहा है।
यह शर्मनाक है कि भारत को विश्वगुरु की यात्रा पर ले जाने का वादा करने वाले पीएम ने इस देश को पश्चिमी देशों के आदेशों का ग़ुलाम जैसा बना दिया है। पीएम मोदी से इस बारे में सवाल किया जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?