जिस तरह संविधान का अभिरक्षक होने के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के अतिक्रमण का अधिकार नहीं है बिलकुल उसी तरह किसी भी तरह का चुना हुआ प्रतिनिधि हो, चाहे वह किसी राज्य का मुख्यमंत्री हो या भारत का प्रधानमंत्री, उसे ‘कानून और व्यवस्था’ के अतिक्रमण का अधिकार बिलकुल नहीं है। क़ानून और व्यवस्था किसी मुख्यमंत्री के मातहत काम करने वाला तंत्र नहीं होता। यह लोकतंत्र का एक बिल्कुल स्वतंत्र घटक है जिसके बिना एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसके बिना आर्थिक उन्नति और देश का विकास असंभव है, क़ानून और व्यवस्था अगर किसी प्रतिनिधि की कठपुतली बन गयी तो देश कोई भी हो उसका पतन निश्चित होता है। ‘कानून और व्यवस्था’ (जिसके नियम मुख्यमंत्री के ड्राइंग रूम में नहीं बनते उसे) बनाये रखने का पूरा उत्तरदायित्व राज्य के मुख्यमंत्री का ही होता है। लेकिन क्या हो जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री ही ‘कानून और व्यवस्था’ को बर्बाद करने का काम करे?

सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज करे, बेकार की शब्दावलियों का इस्तेमाल करे, असहमति को दुश्मन की तरह देखे और भेदभाव करने में अंतरराष्ट्रीय चैंपियन बनने के लिए लालायित हो जाए? यदि प्रतिनिधि ऐसा हो तो उसके लिए ‘असंसदीय’ (अन-पार्लियामेंट्री) शब्द हमेशा ही कम पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति के लिए ‘संसद-विरोधी’ (एंटी-पार्लियामेंट्री) शब्द का इस्तेमाल करना पड़ेगा। संसद विरोधी इसलिए क्योंकि वो न सिर्फ़ असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करता है बल्कि संसदीय मूल्यों को भी ठोकर मारता रहता है जिसके बिना संसदीय प्रणाली ही अस्तित्व में नहीं रह सकती। ऐसे प्रतिनिधि को भारत के लोकतंत्र के लिए एक ख़तरे के रूप में समझा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हिमंता की भाषा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा एक ऐसे ही ख़तरे के रूप में उभरे हैं। वो जिस शब्द और भाषा का इस्तेमाल विपक्षी दलों के नेताओं और मुसलमानों के लिए करते हैं वह सिर्फ़ असभ्य ही नहीं है बल्कि यह शब्दावली सरमा को भारत के भीतर किसी भी संवैधानिक पद के लिए उन्हें अयोग्य ठहराती है। ताज़ा मामला कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का है जिन्होंने सीएम सरमा की पत्नी पर भारत के अतिरिक्त तीन अन्य देशों के पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था। अभी तक भारत के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से पवन खेड़ा के आरोपों का खंडन नहीं किया है। हालाँकि, विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गरेटा ने कहा कि पवन खेड़ा द्वारा पेश किए गए दस्तावेज फ़र्ज़ी हैं लेकिन अभी तक विदेश मंत्रालय ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके या संसद में खड़े होकर पवन खेड़ा की बात को झूठा साबित नहीं किया है और न ही पवन खेड़ा ने अपने आरोप वापस लिए हैं इसलिए यह मामला अभी भी संदिग्ध है। खैर, जो भी हो इस मामले में सरकार को अपना आधिकारिक स्टैंड लेना है, और पवन खेड़ा ग़लत हैं या सही यह माननीय न्यायालय को तय करना है।
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गौरव गोगोई की पत्नी पर हिमंता के आरोप कैसे?

लेकिन असम के सीएम ऐसे नेता हैं जो ख़ुद असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई की पत्नी एलिज़ाबेथ गोगोई पर पाकिस्तानी होने, पाकिस्तान के साथ ‘गोपनीय दस्तावेज़’ शेयर करने, पाकिस्तानी सेना के करीबी होने जैसे गंभीर आरोप लगाएं हैं लेकिन अभी तक इन आरोपों पर भारत के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने अपनी मुहर नहीं लगाई है। लेकिन यह ज़रूर है कि पबित्र मार्गरेटा जिन्हें पवन खेड़ा के आरोप ‘विदेश राज्य मंत्री की हैसियत से’ फेक लगे उन्हीं पबित्र का इस संबंध में बयान है कि “हमारे मुख्यमंत्री(हिमंता सरमा) बिना पुख्ता सबूत या ठोस जानकारी के कोई बयान नहीं देते"। ऐसे में समझा जा सकता है कि पवन खेड़ा के आरोपों पर या तो भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का स्पष्टीकरण आए या फिर भारत के विदेश मंत्री इस बात का स्पष्टीकरण संसद के पटल पर दें, तभी कुछ आधिकारिक माना जा सकता है।

हिमंता की पत्नी पर पवन खेड़ा के आरोप कैसे?

जबतक कुछ सिद्ध नहीं होता तबतक कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि असम के सीएम की पत्नी पर जब लगभग वैसे ही आरोप लगे जैसे उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई की पत्नी पर लगाए थे तो सीएम सरमा का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया। यह सरमा के बिगड़े हुए संतुलन का ही परिणाम है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पवन खेड़ा को अंतरिम ज़मानत दे दी। और असम पुलिस द्वारा खेड़ा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। 

असम चुनाव के पहले पवन खेड़ा ने जिस तरह के आरोप लगाए थे सीएम सरमा उससे बुरी तरह झुलसे हुए दिखाई दिए। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनकी कमज़ोर नस को दबा दिया हो।

7 अप्रैल 2026 को मीडिया के सामने सीएम सरमा ने कहा कि “यह चुनाव निश्चित रूप से तय कार्यक्रम के अनुसार होगा, लेकिन मैं आगे कुछ कार्रवाई करने जा रहा हूँ जिसका खुलासा बाद में करूँगा जिससे पवन खेड़ा को ‘पवन पेड़ा’ बना दूँगा, कुछ दिन इंतज़ार कीजिए।” आगे सीएम सरमा अपना आपा खोते हुए कहते हैं कि “यह पवन खेड़ा कौन है? अगर वह नर्क में भी छिप जाए, तो भी मैं उसे घसीटकर बाहर ले आऊँगा।”

सोचना ज़रूरी है कि ऐसे आदमी की मनःस्थिति कैसी होगी? उसने आरोपों पर जवाब देने की बजाय आरोप लगाने वाले को ही सजा देने की सोच ली। अगले दिन 8 अप्रैल 2026 को सरमा की शब्दावली ‘रमेश विधूड़ी लाइन’ (मैं इसे असंसदीय भाषा का सबसे निचला स्तर मानती हूँ) को पार कर गई। सरमा बोले कि “पहले मैं खेड़ा के पीछे जाऊँगा और खेड़ा को पेलूंगा… उसके बाद अगर जांच में और नाम सामने आए तो बाकी लोगों को भी पेड़ा बनाऊँगा”।
विमर्श से और
आश्चर्य और सतर्क होने वाली बात है, यह कोई कॉमेडी सर्कस नहीं और यह व्यक्ति कोई विदूषक नहीं, कुछ लोग हंस देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं पर क्या इस तरह के व्यक्ति को मुख्यमंत्री जैसे पद पर होना भी चाहिए? जिस प्रतिनिधि की भाषा का स्तर इतना नीचे हो उसके नाम के आगे मुख्यमंत्री पद लिखना शर्म का एहसास दिलाता है! चुनकर जाने से व्यक्ति विधायक बनता है, सांसद बनता है पर मुख्यमंत्री नहीं बनता। उसके बाद भी भारत का संविधान चुने गए प्रतिनिधि से एक आचरण की माँग करता है और इसके लिए शपथ भी दिलवाता है। असम के मुख्यमंत्री जिस किस्म की बदसलूकियां कर रहे हैं उससे आज के छोटे बच्चे, कल के दिन वोटर बनने वाले भारतीय और इस देश की आने वाली पीढ़ी क्या सोचेगी?

जिस प्रतिनिधि के लिए कानून और व्यवस्था बस एक खेल हो, जिस प्रतिनधि के लिए गुंडापन और जनता के प्रतिनिधि होने का भेद समाप्त हो गया हो उसे हर एक पद से मुक्त करवाया जाना चाहिए।

लेकिन क्या सबको यह याद भी रखना पड़ेगा कि सरमा बीजेपी के नेता हैं और इस दल में पीएम मोदी भी ‘रमेश विधूड़ी लाइन’ छूने की कोशिश करते हैं?

क़ानून व्यवस्था को बंधक बना लिया?

सरमा के कुछ अन्य बयान यह बताते हैं कि भारत की क़ानून-व्यवस्था को इन जनप्रतिनिधियों ने अपना बंधक बना लिया है। सरमा जिस तरह की घोषणायें और दावे करते हैं उससे लगता है कि वे इस देश में जिसको चाहे ‘उठवा’ सकते हैं, जिसको चाहे जेल करवा सकते हैं और जेल में सड़वा भी सकते हैं? क्या इसी सोच से वे राज्य का प्रशासन चलाते हैं? क्या इसी सोच के कारण वे गुजरात से, गुजरात के कांग्रेस नेता जिग्नेश मेवानी को ‘उठवा’ लाये थे? और बिलकुल यही करने के लिए वो अब खेड़ा के बारे में सोच रहे थे? सरमा ने मीडिया के सामने कहा कि “अगर आचार संहिता (MCC) लागू नहीं होती तो पवन खेड़ा दिल्ली से हैदराबाद नहीं जा पाता, मैं उसे बीच रास्ते में ही विमान से उतरवा कर वापस ले आता”।

इसके अलावा सरमा एक और ख़तरनाक बात बोलते हैं जो उनके ऊपर कई सवाल उठाती है। सरमा पत्रकारों से बातचीत में 11 अप्रैल को कहते हैं कि “अगर बीजेपी की सरकार बनती है, तो पवन खेड़ा अपने जीवन के आखिरी दिन असम की जेल में बिताएगा।” सरमा अपने ही कमिश्नर से ख़फ़ा हैं कि उन्होंने पवन खेड़ा को गुवाहाटी से जाने कैसे दिया?

मैं समझने की कोशिश कर रही हूँ कि सरमा एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं लेकिन उनका व्यवहार ऐसा है जैसे वो राज्य का प्रशासन नहीं बल्कि कोई गैंग चला रहे हों।
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हिमंता सरमा के दुस्साहस पर बात करना ज़रूरी है। भारत के संविधान में जो सबसे आवश्यक और पवित्र अधिकार है वो है (जीवन का अधिकार), और सरमा उसे एक झटके में छीन लेने का दावा करते हैं। पर ऐसी ताक़त संविधान ने अपने अभिरक्षक-सर्वोच्च न्यायालय को भी नहीं दी, सरमा जीवन छीन लेने वाली ताक़त को इस्तेमाल करना चाहते हैं। लेकिन अगर ध्यान से सोचें तो समझ में आता है कि ऐसी ताक़त उन्हें मिली कहाँ से? क्या सरमा यह ताक़त सर्वोच्च न्यायालय की नक़ल करके पा रहे हैं? क्योंकि उदहारण मौजूद हैं, केंद्र सरकार ने चाह लिया है कि उमर ख़ालिद के जीवन के अधिकार का कोई औचित्य नहीं है इसलिए 5 सालों से भी अधिक समय से उसे बिना किसी ट्रायल के जेल में बंद रखा गया है। यह बड़ी सामान्य सी सोच है जिसे कोई भी समझ सकता है कि जिस दिन ‘सरकार की कृपा’ से उसे छोड़ा जाएगा सर्वोच्च न्यायालय ‘बड़ी-बड़ी’ बातें करेगी, क्योंकि पहले भी कर चुकी है। लेकिन क्या उसके साथ की गई न्यायिक ज्यादतियों के लिए सुप्रीम कोर्ट कभी अफ़सोस करेगा? सरमा हों या मोदी, यह इस देश का दुर्भाग्य है कि कार्यपालिका यह तय कर रही है कि देश की न्यायपालिका कैसे काम करेगी? किसको कब ज़मानत मिलेगी? न्याय कैसे होगा? और न्याय का स्वरूप क्या होगा?

सरमा के शब्द इतने अधिक ख़राब हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को तत्काल ज़मानत दे दी। ये लैंग्वेज इतनी अधिक निम्नस्तरीय थी कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इसका एकबार भी बचाव नहीं किया।

राहुल, खड़गे के ख़िलाफ़ भी जहर उगला?

यहाँ पर सवाल किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि भारत के प्रतिनिधियों का है, भारतीय लोकतंत्र का है, यहाँ की संसदीय प्रणाली और भारत के संविधान का है। सरमा एक संवेदनशील राज्य के सीएम पद पर बैठे हैं और यह पद एक संवैधानिक पद है, ऐसी निकृष्ट भाषा और असभ्य व्यक्तियों की तरह वो कैसे पेश आ सकते हैं? सरमा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को ‘पागल’ कहते हैं, सरमा राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को भी ‘पागल’ कहते हैं। सरमा के हिसाब से देश का पूरा विपक्ष पागल है? सीएम सरमा सिर्फ़ विपक्ष के ख़िलाफ़ असभ्य नहीं हैं, वो देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं, वे अल्पसंख्यक समुदायों के बीच विवाद और हिंसा फैलाने की भी मंशा रखते हैं। अगस्त 2022 में उन्होंने एक मुस्लिम पत्रकार से कहा कि “मैं पूछना चाहता हूँ क्या आप (मुस्लिम) हमें (हिंदुओं को) जीवित रहने देंगे?” यह सवाल ही उन्हें देश की सोच, संविधान की सोच के विरुद्ध खड़ा कर देता है वो अपने सवालों से चिल्ला चिल्ला कर बता रहे हैं कि वो एक सांप्रदायिक मानसिकता के प्रतिनिधि हैं! 

सितंबर 2024 में उन्होंने मिया मुस्लिम समुदाय पर आरोप लगाया कि वे मछली उत्पादन में यूरिया का उपयोग करते हैं, जिससे किडनी और लीवर की बीमारियाँ बढ़ रही हैं, और सरमा ने इस बात को “रासायनिक और जैविक हमला” बताया। भरपूर गैर जिम्मेदारी से एक राज्य के मुख्यमंत्री सरमा अफवाहों को फैलाते हैं और ऐसी बातों को ‘राज्य के विरुद्ध’ अपराध की श्रेणी में आना चाहिए। मुसलमानों की जनसंख्या को लेकर डर फैलाना, आर्थिक रूप से उनका शोषण करने के लिए आह्वान करना, यह सब सरमा को एक आदर्श ‘फ्रिंज’ के तौर पर स्थापित करता है। 

हिमंता मुख्यमंत्री पद के दायित्व और कर्त्तव्य को नहीं करते जबकि उन्होंने संविधान की शपथ ली है, क्या उन्होंने उस शपथ को भी भुला दिया है जिसे उन्होंने इस संवैधानिक पद को धारण करते समय लिया था?

भारत के संविधान की अनुसूची-3 में तमाम शपथों-केंद्रीय मंत्री, राज्य का मंत्री, सांसद, विधायक, सुप्रीम कोर्ट जज आदि का ज़िक्र है। इसमें किसी राज्य के मुख्यमंत्री के लिए विशेषरूप से किसी शपथ का प्रावधान नहीं है। मुख्यमंत्री भी वही शपथ लेता है जो उसके मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्य लेते हैं। संविधान की शपथ यह कहती है कि “…मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।”

स्पष्ट है कि वे अपनी शपथ का पालन नहीं कर रहे हैं। वो लोगों में भय पैदा करना चाहते हैं, उनकी पत्नी पर आरोप लगे लेकिन उन्होंने उसकी कोई स्वतंत्र जांच नहीं करवाई उन्होंने अपने परिवार की बात आने पर पक्षपात किया, उनके बयान स्पष्ट करते हैं कि उनमें मुसलमानों और विपक्ष के नेताओं के ख़िलाफ़ द्वेष ही द्वेष भरा हुआ है और निश्चित ही सरमा, ना ही संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं और न ही न्याय के शासन के प्रति।

सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही पवन खेड़ा मामले में मजबूत मिसाल पेश की है लेकिन जबतक न्यायालय सरमा जैसे लोगों को भारत के संविधान, न्याय प्रणाली, कानून व्यवस्था और भारत की अखंडता के साथ खेलने पर भी उनसे उदारता से पेश आता रहेगा तब तक भारत का लोकतंत्र ख़तरे में बना रहेगा, यहाँ के लोग खतरे में बने रहेंगे, यहाँ की प्रगति खतरे में बनी रहेगी। भारत में कानून से ऊपर किसी को भी जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, सरमा तो फिर भी एक राज्य के मुख्यमंत्री भर हैं।