न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग, सीएजी या संसद संस्था कोई भी हो, भ्रष्टाचार किसी भी संस्था में हो सकता है, यह कोई नयी या अनोखी बात नहीं है। यहाँ तक कि संस्थान का रूप ले चुके कुछ व्यक्तिगत पद जैसे- प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या लोकसभा अध्यक्ष भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ सकते हैं या उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लग सकते हैं। लेकिन समस्या तब आती है जब इसे संस्थाओं द्वारा छिपाने या नकारने के लिए अप्रत्याशित और ग़ैर-आनुपातिक रूप से संवैधानिक और क़ानूनी बल का इस्तेमाल किया जाता है। किसी संस्था द्वारा ऐसी कोशिशें इस बात की स्वीकारोक्ति होती है कि भ्रष्टाचार सिर्फ़ ‘आरोप’ के रूप में नहीं है बल्कि उसका अस्तित्व निश्चित रूप से उस संस्था में है।
इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि भारत की न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का वह स्तंभ है जिसने पिछले 75 सालों में, कई बार अकेले ही और सफलतापूर्वक इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा की है। संविधान निर्माताओं ने देश के संवैधानिक न्यायालयों (सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट) के न्यायधीशों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान की है जिससे न्यायपालिका मजबूत से मजबूत कार्यपालिका के सामने भी रीढ़ सीधी रख सके। केशवानंद भारती(1973), एस आर बोम्मई (1994) और लिली थॉमस (2013) जैसे अनगिनत मामले हैं जहाँ न्यायपालिका ने सरकार की आँख से आँख मिलाकर संविधान की मूल भावना को जागृत रखा है।
न सिर्फ़ न्याय हो, बल्कि दिखना भी चाहिए
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार से परे है। अन्य संस्थाओं की तरह यहाँ भी भ्रष्टाचार है। लेकिन न्यायपालिका पर किसी भी किस्म की टिप्पणी से पहले उसका आधार बहुत मज़बूत होना चाहिए क्योंकि यह संस्था भारतीय नागरिकों की उम्मीदों का अंतिम छोर माना जाता है। यहाँ से होने वाली निराशा और हताशा लोकतंत्र की सम्पूर्ण अवधारणा को ख़तरे में डाल सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार की बात न्यायधीशों और उनके कार्यकलापों पर भी लागू होती है। उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि यदि उन्हें इतना अधिक संवैधानिक संरक्षण और नागरिकों का भरोसा प्राप्त है, तो उन्हें भी न सिर्फ़ न्यायप्रिय होना होगा बल्कि दिखना भी होगा।
कई बड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट का रवैया
सुप्रीम कोर्ट यदि ऐसी घटनाओं की अनदेखी करता है जहाँ एक राज्य का मुख्यमंत्री प्रतीकात्मक रूप से मुसलमानों के नरसंहार को प्रोत्साहित कर रहा है तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट देश की एकता और अखंडता को लेकर गंभीर नहीं है; यदि विपक्षी राज्यों के मुख्यमंत्री और तमाम विपक्षी नेता भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं, सत्ता के प्रति उसके झुकाव को लेकर बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाते हैं और सुप्रीम कोर्ट इसे लेकर कैजुअल रहता है, चुनावी बांड के अपने ही फ़ैसले में आगे कोई कार्यवाही नहीं करता, चुनावों के पहले विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों को जेल भेजने के केंद्र के ग़ैर तार्किक रवैये पर आश्चर्य नहीं करता तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट गंभीर नहीं है, एक लोकतान्त्रिक देश में निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण और ज़रूरी बात है, पर उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर नहीं है।
यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश के ऊपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है और उसकी जांच और सुनवाई खुद मुख्य न्यायाधीश ही करता है तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट क़ानून की सबसे पुरानी और आवश्यक अवधारणा को लेकर गंभीर नहीं है; यदि सुप्रीम कोर्ट देश के शिक्षित युवाओं को 5-5 सालों तक बिना ट्रायल जेल में बंद रखने के सरकारी ज़िद के साथ खड़ा रहता है, तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ‘जीवन के अधिकार’ को लेकर गंभीर नहीं है; यदि कपिल मिश्रा जैसे लोगों को बचाने में केंद्र सरकार को हो रही असुविधा के चलते रातों-रात एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश का तबादला कर दिया जाये, उसे सर्वोच्च न्यायालय ना पहुँचने दिया जाये; यदि कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले मध्य प्रदेश के मंत्री के ख़िलाफ़ FIR का आदेश देने वाले जज को हतोत्साहित करने के लिए उसका ट्रांसफर कर दिया जाये, तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर नहीं है।
यदि सुप्रीम कोर्ट दशकों से स्थापित ‘प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट’ और इस संबंध में अपने ही फैसलों को नकार के फिर से देश को सांप्रदायिक तनाव की ओर धकेल दे तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट देश के सेक्युलर फैब्रिक को लेकर गंभीर नहीं है
बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट
यदि स्पष्ट रूप से बुलडोज़र एक्शन के ख़िलाफ़ यूपी और अन्य सरकारों के ख़िलाफ़ निर्देश जारी करने के बावजूद सरकार विरोधी और अल्पसंख्यकों के घरों का गिराया जाना जारी रहता है, और सुप्रीम कोर्ट संबंधित सरकारों को कठघरे में नहीं खड़ा करता तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ‘न्यायालय की अवमानना’ और ‘कानून के शासन’ को लेकर गंभीर नहीं है; यदि उत्तराखंड और असम जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री अपने संवैधानिक चरित्र और संविधान की शपथ लेकर उससे उलट जाकर धार्मिक और सांप्रदायिक चरित्र में बदल जाते हैं, अपने अपने राज्यों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों और उनके अपमान में या तो सीधे भागीदार बनते हैं या फिर इसे अंजाम देने वाले तत्वों को कानून और प्रशासन से संरक्षित करते हैं और सुप्रीम कोर्ट ‘सू मोटो’ नाम का एक्शन नहीं लेता तो इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक शपथों को लेकर गंभीर नहीं है।
सोचना ज़रूरी है कि जो न्यायालय देश की एकता और अखंडता, जीवन का अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, देश के सेक्युलर फैब्रिक, न्यायालय की अवमानना, क़ानून का शासन और संवैधानिक शपथों को लेकर गंभीर नहीं है, उसके बारे में प्रतिक्रियाएँ कब तक रोकी जा सकती हैं? न्यायपालिका सर्वोच्च है मतलब उसे बढ़त जरूर प्राप्त है और होना भी चाहिए लेकिन वो भी आलोचना से परे नहीं है। अगर NCERT ने कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर कुछ लिख दिया तो उस पर सर्वोच्च न्यायालय ने इतनी आपत्ति क्यों कर दी? देशभर में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लगातार चल रहे खुलेआम नरसंहार की बातों पर माननीय को आपत्ति क्यों नहीं? वहाँ कोई ‘गहरी साजिश’ नहीं है? अल्पसंख्यक ‘ब्लीड’ नहीं कर रहे हैं? क्या अल्पसंख्यकों के नरसंहार की बातों पर, धर्मांतरण और लव जिहाद के नाम पर हो रहे उत्पीड़न पर किसी ‘ब्लैंकेट बैन’ की जरूरत नहीं है? लेकिन कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताबों पर बैन की जरूरत है? मैं इसे दुर्भाग्यपूर्ण बात कहती हूँ। अधिनायकवादी सरकार और न्यायपालिका
न्यायपालिका को यह समझना होगा कि यदि किसी अधिनायकवादी सरकार से ख़ुद न्यायपालिका को अपने आप को बचाना है तो उसे नागरिकों की जरूरत होगी। नागरिकों के मन में न्यायपालिका के लिए भरोसा ज़रूरी है लेकिन इसके लिए न्यायपालिका को हमेशा नागरिकों के साथ खड़ा होना होगा, सरकार के साथ नहीं। नागरिकों का साथ देना होगा, निष्पक्षता और पारदर्शिता पर बल देना होगा और हर बार सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। ऐसे काम नहीं चल सकता कि सरकार के वकील ने कहा कि (कोविड लॉकडाउन के दौरान) कोई सड़क पर नहीं है, कोई नहीं मर रहा है और जनता के वकील बोलते रहे कि लोग मर रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का पक्ष मान लिया और बाद में जब बात ग़लत निकली तब सरकार को जवाबदेह भी नहीं ठहराया। यह न्यायपालिका के क़द को नीचे करने जैसा है और इसे नीचे करने का काम ख़ुद न्यायपालिका कर रही है। सुप्रीम कोर्ट को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ है कि एक हाईकोर्ट का जज (जस्टिस यादव) हाईकोर्ट परिसर को मठ की तरह इस्तेमाल करता हुआ मुसलमानों पर अभद्र टिप्पणी करने की हिम्मत कर गया? उसके इस दुस्साहस पर कोर्ट क्या बताने वाला है? कब सफ़ाई देने वाला है? क्या ऐसे जज को भी सम्मान मिलना चाहिए? क्या ऐसे जजों को न्यायपालिका का हिस्सा माना जाना चाहिए? यदि हाँ तो फिर मुझे लगता है कि भारत का जो संविधान 26 नवंबर 1949 को स्वीकृत हुआ था वो अब बदल दिया गया है, शायद मुझे और देश के नागरिकों को इसकी जानकारी नहीं है।
और अगर संविधान वही है जिसे भारत के नागरिक जानते हैं तो सुप्रीम कोर्ट को यहाँ बताना चाहिए कि आख़िर किस आधार पर नक़ली शहद और घी पकड़े जाने, बीमारियों को ठीक करने के अवैज्ञानिक विज्ञापन करने, कोरोना ठीक करने की नक़ली दवा बनाने के बावजूद उद्योगपति रामदेव के ख़िलाफ़ कोई भी एक्शन क्यों नहीं लिया गया? किस आधार पर देश के प्रधानमंत्री को यह अधिकार दिया गया कि वो अपनी डिग्रियाँ देशवासियों को ना दिखायें? किस आधार पर PMCARES फण्ड को सूचना के अधिकार से दूर रखा गया? मैं कितनों की चर्चा करूं, ऐसे अनगिनत मामले हैं। यदि यह पता चल भी जाये कि कौन सा कानूनी आधार है तो संविधान की मूल भावना और RTI की मूल भावना और ‘नेचुरल जस्टिस’ के सिद्धांत को खंगालें और बतायें कि देश का पीएम अपने लोगों को डिग्रियाँ क्यों नहीं दिखाना चाहता होगा जबकि उनके ख़ुद के अनगिनत वीडियो हैं जिसमें वो ख़ुद को अनपढ़ बोल रहे हैं। आख़िर PMCARES फंड के साथ ऐसा क्या हो रहा है, उसका इस्तेमाल ऐसी कौन सी जगह पर हो रहा है कि पीएम को उसके खर्च की मद को बताने में शर्म आ रही है? ये सारी बातें न्यायालय के विचारार्थ हैं और जब वो इनकी अनदेखी करता है और ‘भारत के लोग’ सवाल उठाते हैं तो क्या ये सवाल नाजायज़ हैं? सुप्रीम कोर्ट को ख़ुद गौर करना है वो भी बंद कमरों में और फिर बताना है कि इस देश में कानून का शासन है या फिर सरकार ख़ुद कानून बन चुकी है।
मैं नाम नहीं लूँगी लेकिन किसी भी ऐसे बड़े उद्योगपति के बारे में सोचिए जो नरेंद्र मोदी सरकार के करीब हो, जिसे अनगिनत और बारंबार सरकारी ठेके मिल रहे हों, जिसने लाखों पेड़ भी काट दिए, जिसको लेकर सेबी भी कंप्रोमाइज्ड दिखा और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग भी, जिसके लिए खुलेआम पब्लिक कंपनियों के कोष खोल दिए गए हों, क्या कभी भी ईडी, सीबीआई, और आयकर विभाग छापा न सही, यूँ ही टहलकर इनके ऑफिस घूम आए हों? क्या सत्ताधारी दल का कोई नेता जेल गया? क्या न्यायालय ने यह गौर किया कि एजेंसियों की नजर में विपक्ष का जो नेता बहुत भ्रष्ट था और जेल जाने योग्य था वो बीजेपी में शामिल होते ही अचानक कैसे ‘निर्मल’ हो गया? क्या कारण है कि पेगासस, राफेल डील और जज लोया जैसे मामले कभी परवान नहीं चढ़े? इसी देश की न्यायपालिका थी जिसने एक अदने से मामले को लेकर देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पद योग्य नहीं माना था, पीएम की कुर्सी छोड़ने को कह दिया गया था और आज कोई भी मामला चाहे जितना गंभीर हो, पीएम मोदी चाहे जितनी सांप्रदायिक और ग़ैर-कानूनी बातें चुनावी रैलियों में बोल डालें, न चुनाव आयोग कुछ कहता है न देश का सबसे बड़ा न्यायालय, ऐसा क्यों है?
न्यायपालिका की नज़र में कारण कोई भी हो सकता है लेकिन जनता जानती है कि दाल में बहुत कुछ काला है। देश दुनिया की तमाम रिपोर्ट भी इस ओर इशारा करती हैं। मैं पूरी न्यायपालिका को कठघरे में नहीं खड़ा करना चाहती लेकिन समाधान न्यायपालिका के भीतर से ही आना चाहिए।
वर्ल्ड जस्टिस रिपोर्ट-2024
वर्ल्ड जस्टिस रिपोर्ट-2024 के अनुसार भारत 142 देशों के मुक़ाबले कुल 79वें स्थान पर है। यह सूचकांक ‘कानून का शासन’, भ्रष्टाचार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका पर उसके नियंत्रण को दर्शाता है। यदि सिर्फ़ भ्रष्टाचार का मामला ले लें तो भारत की न्यायपालिका इसमें 97वें स्थान पर है। दक्षिण एशिया में भारत, नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे है। यह तो निश्चित है कि भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की 2025 की रिपोर्ट जिसके आधार पर ‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स’ जारी किया जाता है उसमें भारत 182 देशों के मुक़ाबले 91वें स्थान पर है। यह सच है कि यह सूचकांक सीधे न्यायपालिका से नहीं जुड़ा हुआ है लेकिन इसमें बताया गया है कि कमजोर न्यायिक संस्थाएँ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं और जवाबदेही को कम करती हैं।
इसके अलावा हाल में आई ‘इंटरनेशनल कमीशन ऑफ़ ज्यूरिस्ट्स’ रिपोर्ट-2025 भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जरूरी रौशनी डालती है। इस रिपोर्ट में 2014–2024 के बीच भारत की न्यायपालिका का अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार, भारत में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जो न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रहार करती हैं और पूरी न्यायपालिका को प्रभावित करती हैं। जैसे- नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका और संभावित वीटो, न्यायाधीशों के मनमाने ट्रांसफर, रिटायरमेंट के बाद सरकारी पद (Post-retirement jobs) से संभावित हितों का टकराव और पारदर्शिता की कमी आदि। इसके अलावा रिपोर्ट यह बताती है कि 2022 में न्यायपालिका के ख़िलाफ़ 1600 से अधिक शिकायतें हुईं लेकिन कार्यवाही बहुत ही सीमित स्तर पर की गई। इसके अलावा यह भी कि भारत की न्यायपालिका में विविधता की भारी कमी (लगभग 13% महिला न्यायधीश) है। इन सब कारणों से न्यायपालिका की हालत ख़राब है।
इसके अलावा भी कुछ रिपोर्ट्स हैं जैसे- वी-डेम डेमोक्रेसी रिपोर्ट-2025 भी है जो विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक स्वभाव का विश्लेषण करती है। इसमें न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यपालिका का न्यायपालिका पर नियंत्रण जैसे तत्व भी शामिल किए गए हैं। इसमें दो बातों को बेहद ज़रूरी माना गया है। पहली ये कि भारत में न्यायिक स्वतंत्रता लगातार कम हो रही है और दूसरी यह कि 2018 से भारत में लगातार निरंकुशता की प्रक्रिया जारी है। ऐसे ही फ्रीडम हाउस रिपोर्ट भी है जिसमें भारत को ‘आंशिक रूप से फ्री’ देश माना गया है। साथ ही इसमें भारत में निचली अदालतों में भ्रष्टाचार, न्यायपालिका का राजनीतिकरण, मामलों का भारी लंबित बोझ, इसके अलावा सुरक्षा कानूनों के तहत मनमानी हिरासत जैसी समस्याओं को रेखांकित किया गया है। जो सबसे महत्वपूर्ण बात इस रिपोर्ट में बताई गई है वो ये है कि भारत में ‘कानून के समक्ष समानता’ बहुत कमजोर है। अर्थात् सभी कानून के सामने समान नहीं हैं, सभी को कानून बराबर सुरक्षा प्रदान नहीं करता। ताज्जुब की बात तो ये है कि भारत के संविधान में यह ‘मूल अधिकारों’ में वर्णित है और इसे सरकार अपनी मनमर्जी से लागू नहीं कर सकती और यह भी कि संविधान का ‘अभिरक्षक’ होने के नाते यह सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वो ‘कानून के समक्ष समता’ को सुनिश्चित करे।
मुझे लगता है कि NCERT पर प्रहार करने से अच्छा था कि न्यायालय एकबार ख़ुद के बारे में सोचे और देखे कि पिछले 12 सालों में कितना पानी बह गया जिसे उसने नजरअंदाज किया। NCERT में बहुत कुछ बदला है, इतिहास भी और वैज्ञानिक टेम्परामेंट भी क्या सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें नोटिस किया? अगर नहीं तो अब क्यों? मैं आदर के साथ कहना चाहूँगी कि सुप्रीम कोर्ट को हमेशा जागृत रहना होगा वो अपनी सुविधा से सो और जाग नहीं सकता।