सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने शर्त रखी है कि अगर राजनीतिक नेता उनके पति के पास आ कर वादा करें कि संसद के इस सत्र में वे शिक्षा को बहस का विषय बनाएँ तो वांगचुक अपना उपवास तोड़ देंगे। गीतांजलि ने यह स्पष्ट नहीं किया कि राजनीतिक नेताओं से उनकी क्या मुराद है।अब तक वे सरकार से माँग कर रही थीं, अचानक राजनीतिक नेताओं को उन्होंने अपना लक्ष्य क्यों बना लिया? क्या राजनीतिक नेताओं में भारतीय जनता पार्टी के नेता भी शामिल हैं? या मात्र विपक्षी नेता? क्या सरकार में शामिल दूसरे ग़ैर भाजपा दलों के नेता अगर आ जाएँ तो काफी होगा? या दो एक के नेता ? अग्र वे न आएँ तो फिर क्या वही पुराना राग शुरू हो जाएगा कि सारा राजनीतिम वर्ग शिक्षा की आज की सड़न के लिए जिम्मेवार है?
कहना ही होगा कि यह बहुत ही अटपटी माँग है। यह शर्त लगाकर वांगचुक ने अपना और अपने पूरे उपवास का ख़ुद ही मज़ाक़ बना दिया है।
याद रखें कि अभी भी जंतर मंतर पर कुछ विद्यार्थी शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग को लेकर 20 रोज़ से ज़्यादा से उपवास पर हैं।उन्होंने कहा था कि उनका उपवास वांगचुक के समर्थन में है। क्या वे भी गीतांजलि से सहमत हैं? क्या वांगचुक की पत्नी ने उनसे कोई मशविरा किया था? या वे वांगचुक को किसी भी जनतांत्रिक विचार -विमर्श से ऊपर समझती हैं?
क्या गीतांजलि की इस माँग के साथ अब वांगचुक के प्रशंसक भी विपक्ष से माँग करने लगेंगे कि उनकी क़ीमती जान बचाने के लिए उनके हस्पताल के कमरे के बाहर क़तार लगाकर वे वादा करें कि संसद में शिक्षा पर चर्चा करेंगे? ऐसा न करने पर क्या वे विपक्ष पर असंवेदनशील होने के लिए लानत भेजना शुरू करेंगे? और संसदीय रूप से अप्रासंगिक हो चुके राजनीतिक दलों के कुछ नेता वांगचुक की माँग पूरी करने को दौड़ लगा देंगे जैसा तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के बयान से ज़ाहिर है?
वांगचुक ने उपवास शुरू किया था इस माँग के साथ कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें। उन्होंने कहा था कि उनका संघर्ष शिक्षा में बदइंतज़ामी के लिए जबाबदेही तय करने का आंदोलन है जिसका पहला चरण है प्रधान का इस्तीफ़ा। यही माँग कॉक्रोच जनता पार्टी की थी। वांगचुक अड़े हुए थे कि बिना प्रधान के इस्तीफ़े के वे अपना उपवास नहीं तोड़ेंगे। उपवास के 15 दिन गुजरने के बाद किसी ने उनकी स्वास्थ्य रक्षा की गुहार लगाते हुए अदालत में अर्ज़ी लगाई। अदालत ने सरकार से उनके स्वास्थ्य की निगरानी करने को कहा। इस आदेश के बाद वांगचुक की सेहत में गिरावट की खबरें आने लगीं।
लगभग सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने उनकी माँग के पक्ष में बयान दिए, जंतर मंतर पर आकर उनसे एकजुटता ज़ाहिर की और उनसे कहा कि यह बेहिस सरकार शिक्षा मंत्री के उनके इस्तीफ़े की माँग नहीं मानेगी, वह उनसे बात भी नहीं करेगी। वे सरकार से अपने मंत्री को हटाने की उम्मीद न करें और इस माँग के लिए अपनी जान जोखिम में न डालें।
सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस पार्टी ने कहा कि वह पहले से ही इस विषय पर आंदोलन कर रही है और सरकार से जवाबदेही माँग रही है।पार्टी ने कहा कि मसला मात्र एक परीक्षा का नहीं, पूरी शिक्षा प्रणाली का है। यह कहीं व्यापक संघर्ष है। इस बड़ी लड़ाई के लिए दलों ने उनसे अनुरोध किया कि वे अब अनशन तोड़ दें। उस वक्त वांगचुक ने नाराज़ होकर कहा कि उनपर अनशन तोड़ने को दबाव बनाने की जगह सबको सरकार पर दबाव डालना चाहिए। इसके लिए 20 तारीख़ को संसद मार्च का आह्वान किया गया।
इस बीच अदालत के निर्देश की आड़ में दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को जबरन जंतर मंतर से उठाकर कर सफ़दरजंग हस्पताल में दाखिल कर दिया। वांगचुक के साथ बातचीत की जगह इस बदसलूकी को देख देश भर में क्रोध का ज्वार-सा उठा। जो जंतर मंतर वांगचुक के 20 दिन के उपवास के दौरान वीरान पड़ा था, वांगचुक को उठाए जाते ही वहाँ नौजवानों की भीड़ उमड़ पड़ी। देश के अलग-अलग हिस्सों में वांगचुक के साथ सरकार के अपमानजनक व्यवहार के ख़िलाफ़ जनता का रोष उबल पड़ा है। जगह जगह प्रदर्शन हो रहे हैं।
जंतर मंतर पर रात भर हज़ारों लोग पहरा दे रहे हैं कि पुलिस फिर ज़बरदस्ती धरना कर रहे बाक़ी लोगों को ने उठा ले। बहुत सारे लोग दूर शहरों, राज्यों से तकलीफ़देह लंबी यात्रा करके इस विरोध में शामिल होने दिल्ली पहुँचे हैं।
जनता के इस उभार का अर्थ समझना चाहिए।वह शिक्षा के सवाल से कहीं बड़े सवाल को लेकर उद्वेलित है। वह है जनतंत्र में सरकार के अहंकार का प्रश्न। जनता के अपमान का प्रश्न। वे सरकार की इस हिमाक़त के ख़िलाफ़ सड़क पर हैं कि उसके आगे अवाम की कोई वक़त नहीं। इस बात को वे साफ़ तौर पर भले ही सूत्रबद्ध न कर पाएँ लेकिन वे जनतंत्र के मूल अधिकार, यानी जनता के बोलने और सरकार का विरोध करने के अधिकार को वापस हासिल करने को सड़क पर हैं।
एक प्रकार से अब सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की चिंता से से यह आंदोलन कहीं बड़ा हो गया है।वह जनता की संप्रभुता की बहाली का आंदोलन है। जनता के जिस हिस्से को अब तक यह अहसास न था कि सरकार उसकी मालिक बन बैठी है, वह भी अब चौंक कर जाग उठा है।
सरकार से गलती हुई। वांगचुक को चारों तरफ़ से ढँककर जब पुलिस वालों ने उठाया तो जो दृश्य जनता की आँखों में गड़ गया, वह था एक स्वेच्छाचारी, क्रूर सरकार का। सरकार ने वांगचुक को तो अदृश्य किया लेकिन इस एक कृत्य से अपने आप को उघाड़ दिया।
वांगचुक को इस क्षण का महत्व समझना चाहिए। यह उनसे बड़ा है। उन्हें जनता की इस जागृति का धन्यवाद देते हुए अपना उपवास ख़त्म कर देना चाहिए।अब वे सारे राजनीतिक दलों से ऊपर होने की जो कोशिश कर रहे हैं और यह माँग कर रहे हैं कि वे उन्हें नया महात्मा मानें, उससे उनकी लाचारी और दयनीयता ही ज़ाहिर हो रही है। वांगचुक भले अपनी सतह से नीचे गिर रहे हों, जनता तो अपनी सतह से ऊपर उठ रही है। हमारे लिए यही संतोष की बात है।