अपूर्वानंद के इस लेख पर यह तस्वीर बहुत कुछ बता रही है। AI Generated
क्या भारत की संवैधानिक संस्थाएँ नहीं चाहतीं कि भारत में सत्ता परिवर्तन हो? क्या भारतीय जनता पार्टी नीत गठबंधन को सत्ता में बनाए रखने में उनका कोई स्वार्थ है? क्या वे इस ख़याल से घबरा रही हैं कि सरकार बदल जाएगी और भाजपा की विरोधी पार्टियाँ सत्ता में आ जाएँगी? क्या चुनाव आयोग, भारत की नौकरशाही, पुलिस और भारत का सर्वोच्च न्यायालय, सब मिलकर भाजपा को सत्ता में बनाए रखना चाहते हैं? क्या भारत के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी भी यही चाहते हैं?
यह सवाल सबसे पहले एक दूसरे तरीक़े से कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने उठाया था। उन्होंने कहा और उसे दुहराया कि विपक्ष की मुश्किल यह है कि उसे सिर्फ़ भाजपा या आर एस एस से मुक़ाबला नहीं करना है, बल्कि उसे पूरे राजकीय तंत्र से लड़ना है। कुछ लोगों को राहुक गांधी की इस बात में अतिशयोक्ति नज़र आई थी। लेकिन इण्डियन एक्सप्रेस की चुनाव आयोग से जुड़ी खबरों ने बतलाया है राहुल गांधी की आशंका या चेतावनी में दम था।
इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने जनता का सम्मान और विश्वास खो दिया है। यह जनतंत्र के लिए सामान्य बात है। इसी से सत्ता परिवर्तन की शुरुआत होती है। लेकिन वह परिवर्तन हो पाए ,इसके लिए ज़रूरी है कि संवैधानिक संस्थाएँ, जैसे चुनाव आयोग, न्यायपालिका के साथ नौकरशाही और पुलिस बल, निष्पक्ष हों। जब वे निष्पक्ष होती हैं तब वे जनता की इच्छा का सम्मान करती हैं।और तब सत्ता परिवर्तन हो पाता है।जनता चुनाव में चलती आ रही सरकार के प्रति अपना अविश्वास ज़ाहिर करती है। फिर दूसरी सरकार बनती है। निष्पक्ष संवैधानिक संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन को संभव बनाती हैं।
यह कहना ज़रूरी है कि जनतंत्र में जनता का सत्ता परिवर्तन का यह अधिकार सर्वोपरि है। उसकी हर क़ीमत पर रक्षा की जानी चाहिए।मज़बूत से मजबूत सरकार इस अधिकार के रास्ते नहीं आती। इसी तरह जनतंत्र में सरकारें बदलती हैं।
हाल ही में मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि कोई सरकार गद्दी नहीं छोड़ना चाहती। वह एक हद तक ठीक थे, लेकिन पूरी तरह नहीं। क्या भारत के इतिहास में कोई सरकार ऐसी आई जिसने गद्दी में बने रहने के लिए उस प्रक्रिया को ही विकृत कर दिया जिसके ज़रिए उसे हटाना संभव होता? इंदिरा गांधी को बार-बार तानाशाह कहा जाता है।लेकिन आपातकाल हटाने के बाद जो चुनाव हुआ, क्या उन्होंने उसे प्रभावित करने का कोई प्रयास किया? उसके पहले पिछली सदी के सातवें दशक में जब भारत की राज्य की संरचना और राजनीतिक ढाँचे से ‘कांग्रेस सिस्टम’ को अलग करना तक़रीबन नामुमकिन था, कांग्रेस पार्टी को छह राज्यों में सत्ता से बाहर होने से कोई रोक नहीं सका।
अधिक सही यह कहना होगा कि कांग्रेस ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यह सत्ता परिवर्तन बाधित होता। 1984 में भूतपूर्व बहुमत हासिल करने के बाद अगले चुनाव में राजीव गांधी की सरकार को जनता के रोष का सामना करना पड़ा और कांग्रेस सत्ता से बेदख़ल हुई। 2004 में भी अत्यंत लोकप्रिय माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सत्ता से बेदख़ल हुई।और 10 साल सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस पार्टी 2014 में सत्ता से बेदख़ल हुई।
जब तक यह प्रक्रिया चलती रहती है तब तक जनतंत्र की जनतांत्रिक संभावनाएँ जीवित रहती हैं। राजनीतिक दल, भले ही न चाहते हों, सत्ता से हटने को तैयार रहते हैं।
यही वजह है कि 1952 से लेकर 2014 तक किसी राजनीतिक दल और नेता ने कभी यह दावा नहीं किया कि वह 50 साल सत्ता में रहेगा। बल्कि उसने चुनाव हारने की संभावना से इनकार नहीं किया। 1950 के दशक के नेहरू के भाषणों को पढ़ने से मालूम होता है कि वे बार-बार कह रहे हैं कि वे चुनाव हारने को तैयार हैं लेकिन अपने उसूलों से समझौता उन्हें क़बूल नहीं है। नेहरू अपने दल के सदस्यों को कह रहे थे कि वे सांप्रदायिकता से समझौता नहीं कर सकते, भले ही वे चुनाव हार जाएँ। मतलब यह कि नेहरू चुनाव हारने और सत्ता से बाहर रहने को तैयार थे। यही बात बाद के प्रधान मंत्रियों के बारे में कही जा सकती है।
- 2014 के बाद कुछ बदल गया। भारतीय जनता पार्टी के नेता दावा करने लगे कि अगले 50 साल तक उन्हें कोई सत्ता से हटा नहीं सकता। यह विश्वास उन्हें क्यों है? क्यों उन्हें यह यक़ीन है कि वे सत्ता में बने रहेंगे?
क्या इसका कारण यह है कि सत्ता परिवर्तन को संभव बनाने वाले राजकीय तंत्र ने अपना गठजोड़ भाजपा के साथ कर लिया है? क्या भाजपा का हित ही अब उनका हित है?
अगर ऐसा नहीं तो चुनाव आयोग ने क्यों मतदाताओं की सूची से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटने का अभियान चला रखा है? क्यों बार बार सारे ग़ैर भाजपा दलों के एतराज और साधारण जनता की आपत्तियों को धता बताते हुए वह मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा रहा है? क्यों वह मतदाताओं से ऐसे और इतने काग़ज़ात माँग रहा है जो अधिकतर मतदाता दे ही नहीं पाएँगे? क्यों वह ख़ासकर मुसलमानों के नाम काटने की कोशिश कर रहा है?
इसके अनेक सबूत सामने आ चुके हैं कि भाजपा और चुनवा आयोग इस मामले में साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसके प्रमाण हैं कि मतदाताओं के नाम और उनकी मतदाता संख्या के साथ छपे हुए फॉर्म 7 भाजपा कार्यकर्ताओं के पास थे। वे ये फॉर्म जमा कर रहे थे जिससे मुसलमान मतदाताओं के नाम कटवाए जा सकें।
पश्चिम बंगाल में जब अधिकारियों ने हज़ारों मतदाताओं के नाम वापस मतदाता सूची में शामिल किए तो क्यों चुनवा आयोग ने अपनी तरफ़ से उनके नाम जुड़वाने पर अपनी तरफ़ से पहल करके आपत्ति की? क्यों आयोग यह चाहता है कि लाखों लोग वोट न दें?
उसी तरह जब सर्वोच्च न्यायालय ने ख़ुद देखा और कहा भी कि एस आई आर की प्रक्रिया में झोल है, तब भी उसने क्यों यह प्रक्रिया चलने दी? क्यों अदालत ने यह कहा कि एक बार वोट न देने से कोई पहाड़ टूट नहीं पड़ता? क्यों हाल में जब यह अर्ज़ी लगाई गई कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटाये गए लोगों के आदेवन पर तुरत विचार किया जाए क्योंकि कुछ विधान सभाओं में उपचुनाव होनेवाले हैं तो क्यों मुख्य न्यायाधीश ने यह कहा कि ये तो बस उपचुनाव हैं! क्या इन चुनावों में उन मतदाताओं के अधिकार बहाल करने की जिम्मेवारी अदालत की न थी जिन्हें ग़लत तरीक़े से मताधिकार से वंचित किया जा रहा है?
क्या इससे यह शक पुख़्ता नहीं होता कि चुनाव आयोग की तरह ही अदालत भी अब चाहती है कि भाजपा सत्ता में बनी रहे? वरना उसने क्यों चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया में संशोधन के सरकारी निर्णय को रद्द नहीं किया?
इन संस्थाओं में चुनाव आयोग की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है। वह यह सुनिश्चित करता है कि जनता निर्बाध रूप से अपनी इच्छा ज़ाहिर कर सके। उसका मत चुनाव के दौरान व्यक्त हो सके। सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका यह तय करने की है कि मतदाता के अधिकार का हनन न हो। पिछले 2 साल में बार-बार यह दिखलाई पड़ रहा है कि आयोग और अदालत भाजपा सरकार की तरफ़ से कमा कर रही है?
क्या यह किसी डर के कारण है? क्या हम यह मान लें जैसा कुछ वरिष्ठ वकील कहते हैं कि कई न्यायाधीश भ्रष्ट हैं और वे इस भय से सरकार के ख़िलाफ़ नहीं जाते कि वह उनके राज जानती है? या इस सरकार को उनका समर्थन वैचारिक है?
यही बात नौकरशाही के बारे में कही जा सकती है और पुलिस बल के बारे में भी। क्या मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ उनकी कार्रवाइयाँ सरकार के दबवा के कारण हैं या इस कारण कि उनमें से अधिकतर भाजपा से वैचारिक रूप से सहमत हैं? कि वे भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं?
वक़्त-बेवक़्त से और खबरें
बुलडोज़र राजनेता नहीं चला रहे। वे प्रशासनिक अधिकारी चला रहे हैं। मुसलमानों को ग़लत तरीक़े से गढ़े गए मामलों में राजनेता नहीं, पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार कर रहे हैं। तबलीगी जमात के ख़िलाफ़ फर्जी मामला राजनेताओं ने नहीं पुलिस ने बनाया था। नोएडा में मज़दूरों के आंदोलन का साथ देने के लिए कलाकार आकृति पर झूठा मुक़दमा भाजपा नेताओं ने नहीं, नोएडा की ज़िलाधिकारी ने बनाया था।
उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के ख़िलाफ़ जो चार्जशीट लिखी गई है, वह भाजपा कार्यालय में नहीं, दिल्ली पुलिस के दफ़्तर में लिखी गई है।
बाबरी मस्जिद की ज़मीन विश्व हिंदू परिषद के लोगों को अदालत ने दी। उसी तरफ़ ज्ञानव्यापी मस्जिद को अदालत ने विवादास्पद बनाया।
यह फ़ेहरिस्त लंबी है। क्या इससे यह शक यक़ीन में नहीं बदलता कि भारत की राजकीय और संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी प्रतिबद्धता बदल ली है, और अब उनका निर्देशक संविधान नहीं रह गया है?