भारतीय मुसलमानों को क्या करना चाहिए? यह सवाल पिछले 11 वर्षों में अलग-अलग जगह, अलग-अलग मौक़े पर कई बार पूछा गया है। इस सवाल को कैसे समझें? यह सवाल , या इस तरह का सवाल कब, किन हालात में पूछा जाता है। भारतीय हिंदू या जैन अपने आप से यह सवाल तो नहीं करते। यह सवाल एक तरह से ग़लत भी है। क्या भारतीय मुसलमान कोई एक चीज़ है जिसे जीने का कोई एक तरीक़ा या नुस्ख़ा बतलाया जा सकता है? भारतीय मुसलमान की संज्ञा तो करोड़ों औरतों, मर्दों, या दूसरे यौन रुझानों के लोगों, बच्चों, जवानों और बूढ़ों को समेटे हुए है। यह समूहवाचक संज्ञा है लेकिन यह समूह अनेकानेक व्यक्तिवाचक और दूसरी समूहवाचक संज्ञाओं को अपने भीतर समाहित किए हुए है। एक दूसरे से अलग परिस्थितियों, संस्कृतियों, भाषाओं की पृष्ठभूमिवाले इन तमाम लोगों को एक समूहवाचक संज्ञा में शेष करना कितना मुनासिब है और क्या यह मुमकिन भी है?
डॉक्टर, अध्यापक, श्रमिक, लेखक, संगीतकार, किसान: कब ये पहचानें धुँधली पड़ने लगती हैं और इनके ऊपर सिर्फ़ एक पहचान हावी हो जाती है? सबसे ताज़ा उदाहरण संगीतकार ए आर रहमान का है। दो हफ़्ता पहले तक वे संगीतकार थे लेकिन अब वे सिर्फ़ मुसलमान हैं। यह घटना अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के साथ बार बार घटती है। हाल में भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने पहले सलमान ख़ान को मौत के घाट उतारने की बात कही, फिर खुद को सुधार कर कहा कि  वास्तव में शाहरुख़ ख़ान के क़त्ल की बात कर रहे थे। क्या उन्होंने कोई ऐसा जुर्म किया है कि उन्हें मौत की सज़ा होनी चाहिए? या उनका अपराध सिर्फ़ यह है कि वे मुसलमान हैं?आमिर ख़ान अभिनेता हैं लेकिन उनकी मुसलमान पहचान ने उनके अभिनेता की पहचान को पीछे कर दिया है।या सैफ़ अली ख़ान , मोहम्मद शमी, या मोहम्मद सिराज  के बारे में कब मालूम हुआ कि वे मुसलमान हैं? कब बच्चों के लिए ऑक्सीजन का इंतज़ाम करनेवाले डॉक्टर कफ़ील ख़ान मुसलमान बनकर रह गए? कब एक मार्क्सवादी उमर ख़ालिद मुसलमान बन गए?
मैंने पिछले 11 साल में अनेक ऐसे लोगों को देखा है जो अपने जीवन में शायद पहली बार यह महसूस करने लगे हैं  कि वे भले ही जज़, वकील, डॉक्टर या वैज्ञानिक रहे हों, हैं वे आख़िरकार एक मुसलमान ही। उन्हें अपनी मुसलमान पहचान का अहसास इस तरह पहले कभी नहीं हुआ था।
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भारत में इस वक्त मुसलमान होने की क़ीमत अलग-अलग हो सकती है लेकिन अब वह प्रायः हर मुसलमान को देनी ही पड़ती है। हालाँकि आज़ादी के बाद से मुसलमानों को लगभग नियमित अंतराल पर सामूहिक हिंसा झेलनी पड़ती रही है लेकिन पहली बार उनके ख़िलाफ़ हिंसा का रूप भी बदल गया है। अब एक अकेले मुसलमान को भी नहीं मालूम कि उसके साथ कब क्या हो जाए। मुंबई जयपुर एक्सप्रेस में सो रहे उन 4 मुसलमानों को क्या मालूम था कि मुसाफ़िरों की हिफ़ाज़त करनेवाला एक पुलिसकर्मी उनका नाम पूछकर उन्हें मार डालेगा? 
एक मुसलमान औरत ने अपनी रेल यात्रा के बारे में लिखा: एक बच्चे ने उनके पति से पूछा कि क्या वे मुसलमान हैं और फ़ौरन कहा कि मुसलमानों को गोली मार देनी चाहिए। इस अनुभव ने उन्हें इतना हिला दिया कि उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि आगे वे ट्रेन से सफ़र नहीं करेंगी। जब मैं यह क़िस्सा मुंबई की एक बैठक में सुना रहा था तो एक मुसलमान नौजवान ने कहा कि लोकल ट्रेन में उसे अकसर इस तरह के बयानों का सामना करना पड़ता है।

इसका मतलब यही है कि आज भारत में एक औसत मुसलमान का जीवन अनिश्चित है। उसे नहीं मालूम कि उसके साथ कब क्या होगा, कौन कैसे बर्ताव करेगा। हिंसा और हत्या इस बर्ताव का एक रूप है। यह बर्ताव एक साधारण पड़ोसी, राहगीर से लेकर पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी का भी हो सकता है।

एक स्थिति की कल्पना कीजिए। स्कूल में दो बच्चों में मारपीट होती है। एक दूसरे को चाकू मार देता है। अगर दोनों हिंदू हों, तो अधिकारी क्या करेंगे? और अगर उनमें से एक मुसलमान हो तो वे क्या करेंगे? क्या हिंदू बच्चे का घर गिराया जाएगा? मुसलमान बच्चे के माँ-बाप का घर ज़रूर ढाह दिया जा सकता है। ऐसी एक घटना में राजस्थान के उदयपुर में अधिकारियों में बच्चे के माँ बाप का मकान गिरा दिया। वह भी बिना मालूम किए कि वह उनका अपना मकान है या नहीं! एक दूसरी स्थिति की कल्पना करें: आप अकेले चले जा रहे हैं। अचानक 4 या 10 हिंदू आपको घेर लेते हैं और मारपीट शुरू कर देते हैं। इसमें आप घायल भी हो सकते हैं, आपकी जान भी आ सकती है। यह ट्रेन में, सड़क पर, बाज़ार में: कहीं भी हो सकता है।
बेएतबारी उसके वजूद का हिस्सा है: कब उसका कौन हिंदू सहकर्मी, या दोस्त, या पड़ोसी या अजनबी राह चलता हिंदू उसके ख़िलाफ़ कुछ कर बैठे, उसे नहीं मालूम। ग़ैर यक़ीनी, बेएतबारी उसके वजूद को विकृत कर देती है। उसे हमेशा एक चौकन्ना हालत में रहना पड़ता है।यह सामान्य जीवन नहीं है।
क्या  अब  सिनेमा हॉल में ऐसी फ़िल्म देखी जा सकती है जिसमें हिंदू दर्शक और वे साथ साथ एक तरह का आनंद ले सकें? अब क्या मुसलमान विरोधी घृणा बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का एक आज़माया हुआ ज़रिया या नुस्ख़ा नहीं?
भारत में धारावाहिक हिंसा के बावजूद मुसलमान को एक भरोसा यह रहा है कि वह किसी भी दूसरे भारतीय की तरह का ही एक मतदाता है। उसके पास और कुछ हो न हो, एक वोट का अधिकार तो है। उससे यह कोई नहीं छीन सकता और इस एक वोट के कारण वह भारत की राजनीति और राज्य के लिए महत्त्वपूर्ण बना रहेगा।लेकिन अब वह अधिकार भी ख़तरे में है। मतदाता सूची से नाम काटे जाने से लेकर मतदान केंद्र जाने से रोकने तक: मुसलमान अब इन सबसे जूझ रहे हैं। अपनी आबादी के अनुपात के अनुसार मुसलमान विधायक या सांसद बन पाएँगे,यह सोचना तो उन्होंने पहले ही छोड़ दिया है।

जब अपनी पहचान छिपानी पड़े जिससे हम सुरक्षित रह सकें तब उसका मतलब यही है कि उस पहचान को  मिटा देने की कोशिश हो रही है। लेकिन आज पहचान का साफ़ न होना भी जुर्म हो सकता है। एक मुसलमान की दुकान का नाम ‘पिंटू स्वीट्स’ नहीं हो सकता। लेकिन अगर वह सलमान स्वीट्स हो तो मुमकिन है कि उसकी दुकान पर हिंदू आना कम कर दें, अगर पूरी तरह से बंद न भी करें। एक गैरमामूली स्थिति है। इस स्थिति में मुसलमान क्या करे?

मुसलमान क्या करे का जवाब कौन दे? उसके पहले देखना चाहिए कि वह क्या कर रहा है। वह हर चंद कोशिश कर रहा है कि वह भारत का मतदाता बना रह सके।भारत की अपनी नागरिकता और नागरिक के तौर पर अपने अधिकार को बचाए रखने के लिए उसे जो भी मशक़्क़त करनी पड़े, वह कर रहा है।वह एक ऐसे राजकीय तंत्र से जूझ रहा है जो उसके साथ नहीं, बल्कि प्रायः उसके ख़िलाफ़ है। वह इस तंत्र को अपना बनाने के लिए इसका हिस्सा भी बनने की कोशिश कर रहा है। 
सारे पूवग्रहों से जूझते हुए पुलिस या प्रशासन में दाखिल होने का प्रयास कर रहा है। हालाँकि इसे भी साज़िश माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने ही मुसलमानों के राजकीय तंत्र में प्रवेश पर चिंता ज़ाहिर की, उसे घुसपैठ ठहराया। मुसलमान अपने सामुदायिक संसाधनों से शिक्षा हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।वे शिक्षा संस्थान स्थापित कर रहे हैं, छात्रवृत्तियाँ दे रहे हैं। लेकिन इसे भी संदेह की निगाह से देखा जा रहा है और शिक्षा जिहाद कहा जा रहा है।

इस माहौल में मुसलमान क्या करे?

इस वक्त मुसलमानों का सबसे अधिक साबका क़ानून से पड़ रहा है। नफ़रतअंगेज़ भाषण या प्रचार, गिरफ़्तारियाँ, ज़मानत, बुलडोज़र की धमकी या बुलडोज़र-ज़ुल्म, रोज़गार पर हमला, शारीरिक हिंसा, हत्या: मुसलमान इस शाब्दिक और शारीरिक हिंसा का मुक़ाबला वे अदालतों में कर रहे हैं। अदालत जाना आसान नहीं है। तमाम धमकियों, भय के बीच अदालत जाने के लिए ख़ास क़िस्म की हिम्मत चाहिए और इंसाफ़ के लिए सालों साल अदालत में टिके रहने के लिए ख़ास क़िस्म का धीरज चाहिए। ज़किया जाफ़री ने कोई 20 साल यह लड़ाई लड़ी। इंसाफ़ के संवैधानिक अधिकार के लिए अदालत पर उनके भरोसे को अदालत ने ही शक की नज़र से देखा। आख़िर कोई इतनी लंबी इंसाफ़ की लड़ाई कैसे लड़ सकती है, और वह भी एक औरत? ज़रूर इसमें कोई साज़िश होगी। इंसाफ़ की उनकी लगन को अदालत ने ऐसा जुर्म माना जिनके लिए उनपर मुक़दमा चलना चाहिए। बिलकीस बानो, या क़त्ल कर दिए गए मोहम्मद जुनैद की निरक्षर माँ, या ‘लिंचिंग’ के शिकार बीसियों मुसलमानों के परिवार: ये सब बरसों बरस अदालतों को याद दिला रहे हैं कि इंसाफ़ उनका हक़ है और इन्साफ़ देना अदालतों का फ़र्ज़।

नागरिक अधिकारों से धीरे धीरे वंचित किए जाने के बावजूद मुसलमान राजनीतिक दलों को याद दिला रहे हैं कि बराबरी का हक़ उनका है और राजनीतिक दलों का उनके प्रति एक संवैधानिक फर्ज है। हालाँकि राजनीतिक दल, जो ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, मुसलमानों की छाया से भी दूर रहना चाहते हैं। वे  चाहते हैं कि मुसलमान बस एक वोट में अदृश्य हो जाएँ।

मुसलमान गिड़गिड़ा नहीं रहे, रहम की भीख नहीं माँग रहे। उन्होंने अपने ऊपर जुल्म करनेवालों के आगे घुटने नहीं टेक दिए हैं।वे बतौर हिंदुस्तानी, बतौर इंसान अपना हक़ तलब कर रहे हैं। वे हिंदुस्तान की ज़मीन और उसके ख़याल पर अपना बराबरी का दावा पेश कर रहे हैं।उन्होंने अपना ईमान नहीं छोड़ा है। यही बात भारतीय जनता पार्टी और आर एस एस को नागवार गुजर रही है।

मुसलमानों को क्या करना चाहिए? इस सवाल का जवाब ख़ुद मुसलमानों ने दिया है। जो उन्हें करना चाहिए, वे कर रहे हैं। उनकी आनेवाली पीढ़ियाँ उनको लेकर शर्म नहीं, गर्व महसूस करेंगी। जब सब कुछ उनके ख़िलाफ़ था, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी।’मुसलमानों को क्या करना चाहिए?’ भारत के लिए ग़लत सवाल है। सही सवाल है: “हिंदुओं को क्या करना चाहिए?”