नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी
बंगाल की नई विधानसभा के चुनाव में कौन जीतेगा? इसकी जगह हमें पूछना चाहिए कि बंगाल में किसे जीतना चाहिए। इस प्रश्न पर विचार करने से पहले हमें इस पर भी सोचना चाहिए कि दिल्ली के विश्लेषकों का ध्यान सबसे अधिक बंगाल पर क्यों है। चुनाव तो केरल, तमिल नाडु, असम और पुदुचेरी में भी हुए हैं। लेकिन चर्चा सबसे अधिक बंगाल की हो रही है।उसका एक बड़ा कारण यह है कि दक्षिण के इन राज्यों में इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दावेदार नहीं दीख रही। वह चुनावों में भाग ज़रूर ले रही है लेकिन इनमें से कहीं भी वह अभी के सत्तासीन दलों के लिए गंभीर प्रतिद्वंद्वी नहीं है।
इस वजह से दिल्ली के विश्लेषकों के लिए भी वे राज्य उतने महत्त्त्वपूर्ण नहीं हैं। अलावा इसके कि इसका एक कारण यहाँ भी हो सकता है कि दक्षिण अभी भी उत्तर भारतीय कल्पना में हाशिए पर है। असम के नतीजे पर सब लगभग एकमत जान पड़ते हैं। इस वजह से वह भी बहुत आकर्षक नहीं रह गया है। चुनाव के बाद उस पर चर्चा होना शुरू होगी कि क्या भाजपा मुख्यमंत्री बदलेगी या हिमंता बिस्वा सरमा ही मुख्यमंत्री के रूप में वापस शपथ लेंगे।
बंगाल ख़ास है। क्योंकि वह भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार सबसे अधिक ख़ास है। उसने इस बार बंगाल पर क़ब्ज़ा करने का हर संभव उपाय कर लिया है।चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय उसकी इच्छापूर्ति के रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए, कर रहे हैं। चुनाव करवाने के लिए बाहर के राज्यों से जो प्रशासनिक अधिकारी और सुरक्षा बल के जवान बंगाल में तैनात किए गए हैं, उनमें भी भाजपा की तरफ़ झुकाव देखा गया है।
दिल्ली का पैसेवाला मीडिया भी चाहता है कि इस बार बंगाल पर भाजपा का झंडा लहराए। इस जाती हुई विधान सभा के लिए जो चुनाव 2022 में हुआ था, उसमें तो मीडिया ने भाजपा को जिता ही दिया था। नतीजे उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ आए। इस बार उसे लग रहा है कि चुनाव आयोग और पूरा राजकीय तंत्र शायद उसकी इच्छा पूरी कर दे।
बंगाल में किसे जीतना चाहिए? अगर चुनाव सामान्य संसदीय प्रतिद्वंद्विता के वातावरण में होते और अगर बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक सामान्य संसदीय जनतांत्रिक दल होता तो संभवतः इस उत्तर को लेकर बहुत बहस न होती। तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में 15 साल हो गए हैं। उसकी ताजगी ख़त्म हो गई है। स्थानीय नेताओं की गुंडागर्दी बढ़ती जा रही है।भ्रष्टाचार और शासकीय ढीलाढालापन जगज़ाहिर है। तृणमूल कांग्रेस को जिन उम्मीदों के साथ बंगाल की जनता सत्ता में लाई थी, वह उन्हें पूरा नहीं कर पाई है।
2011 में वाम मोर्चे को जनता ने तब सत्ता से हटाया था जब वह अपराजेय लग रही थी। समाज की हर संस्था पर उसका क़ब्ज़ा था और हिंसा राजनीति की भाषा थी।अहंकार वाम मोर्चे, ख़ासकर सी पी एम के सर चढ़कर बोल रहा था। इन सबने मिलकर ऐसी परिस्थिति तैयार कर दी थी कि जनता किसी तरह वाम से छुटकारा चाहती थी।
आज स्थिति कुछ कुछ वैसी ही है।इसलिए सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक और उचित होता। बंगाल के दुर्भाग्य से तृणमूल कांग्रेस के सामने न तो कांग्रेस पार्टी और न ही वाम मोर्चा टिकने की हालत में हैं।2011 में सत्ता से बाहर होने के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की जैसे इच्छाशक्ति ही चुक गई है और कांग्रेस ने बहुत पहले ही बंगाल से हाथ धो लिया है।ऐसी हालत में मात्र भाजपा ही तृणमूल का विकल्प दिखलाई देती है।
सारी परिस्थिति ऐसी है कि भाजपा का सत्ता में आना ही स्वाभाविक मालूम पड़ता है। फिर कुछ लोग क्यों यह कह रहे हैं कि उसे सत्ता में नहीं आना चाहिए?
भाजपा का सत्ता में आना बंगाल के लिए क्यों ख़तरनाक है, यह उसके चुनाव प्रचार ने ही ज़ाहिर कर दिया है। जिस प्रकार उसने राजकीय संस्थाओं का उपयोग अपने लिए किया है, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा को संसदीय और संवैधानिक मर्यादाओं की तनिक भी परवाह नहीं है। ऐसा राजनीति दल अगर सत्ता में आएगा तो वह राज्य की संस्थाओं और संसाधनों का इस्तेमाल जनता के लिए नहीं, अपने हित में करेगा। कुछ कुछ पुराने राजाओं की तरह।
दूसरे, अपने चुनाव प्रचार में भाजपा ने साफ़ कर दिया है कि वह बंगाल के मुसलमानों को पराया मानती है। उसने मुसलमानों का विश्वास जीतने के लिए कोई संकेत नहीं दिया। उलटे, उसके सारे नेताओं ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि उसका सत्ता में आना मुसलमानों के दुर्दिन का आरंभ होगा। मुसलमानों को अपमानित करने के लिए भाजपा के हर प्रचारक ने उनके ख़िलाफ़ हिंसक भाषा का प्रयोग किया। मुसलमानों को उर्दू भाषा और बांग्लादेश से जोड़कर उन्हें ग़ैर बंगाली साबित करने की कोशिश हर भाजपा नेता ने की। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने हर बार घुसपैठियों को एक एक कर बंगाल से बाहर कर देने की धमकी दी। इसका मतलब मुसलमानों के लिए क्या है, यह बताने की ज़रूरत नहीं।
भाजपा जिस राज्य में भी सत्ता में आई है, वहाँ मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा का प्रचार तो बढ़ा ही है, उनके ख़िलाफ़ रोज़ाना हिंसा की घटनाएँ आम हो गई हैं।ओडिशा इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। वहाँ भी भाजपा पहली बार अकेले सत्ता में आई है।उसके सरकार बनाते ही राज्य एक अलग-अलग हिस्से से मुसलमानों के साथ रोज़ रोज़ हिंसा की खबर मिल रही है। सड़क पर, ट्रेन और बस में, घरों में घुसकर मुसलमानों पर हमले की घटनाएँ अब सामान्य बात है।ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा पर तो लोगों का ध्यान भी नहीं जाता।
हालाँकि इसकी बात कोई नहीं करता लेकिन यह सत्य है कि भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों और ईसाइयों का जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है और वे तरह-तरह के भेदभाव और हिंसा का सामना करते हैं। वे जानते हैं कि राज्य उनके साथ कभी खड़ा नहीं होगा।
यह बात अपने आप में पर्याप्त कारण है कि भाजपा बंगाल में सत्ता में न आए।
बहुत सारे लोगों को यह कारण उचित नहीं लगता। क्या मुसलमानों की सुरक्षा और उनकी इज़्ज़त इतनी बड़ी चीज़ है कि राज्य में परिवर्तन न हो? जो ऐसा कहते हैं, वे भी अपने लिए बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा, बेहतर जीवन-स्तर चाहते हैं।अगर पिछले 10, 15 सालों के आँकड़ों को देखें तो मालूम होगा स्वास्थ्य, शिक्षा, बच्चों का पोषण, उनकी वृद्धि,नवजात शिशुओं के बचे रहने की दर की कसौटी पर भाजपा शासित राज्य तमिल नाडु, केरल जैसे राज्यों से काफी पीछे हैं। व्यवसाय के मामले में भी भाजपा शासित राज्यों की हालत अच्छी नहीं है।
भाजपा शासित राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता में भी ख़ासी गिरावट देखी जाती है। उनके स्कूलों और कॉलेजों से पढ़कर निकले लोगों का स्तर अन्य की अपेक्षा बहुत नीचे है।उन्हें शैक्षिक दुनिया में इज्जत की निगाह से नहीं देखा जाता।
इसका मतलब यह है कि सामाजिक सद्भाव की बलि चढ़ाकर आर्थिक समृद्धि हासिल करना संभव नहीं है।
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इसके अलावा यह भी देखा गया है कि भाजपा के नेताओं में एक राजसी दिमाग़ है। वे जनता को अपनी प्रजा समझते हैं। तो सवाल सिर्फ़ मुसलमानों के अपमान का नहीं। हिंदू जनता भी अपनी सत्ता और संप्रभुता गँवा बैठती है।
भाजपा धीरे धीरे सारी संसदीय प्रक्रियाओं को निष्क्रिय कर देती है और पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका को भी अपने अधीन कर लेती है। इसके चलते जनता निर्बल होती जाती है।
ये सारे कारण हैं कि भाजपा बंगाल के लिए तृणमूल की जगह बेहतर विकल्प नहीं है। लेकिन जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, बंगाल का फ़ैसला हो चुका है। सिर्फ़ यह जानना बाक़ी है कि क्या बंगाल उत्तर प्रदेश और गुजरात का अनुकरण करेगा या नहीं।