कल्पना कीजिए कि महात्मा गांधी ‘हरिजन’ मंदिर प्रवेश आंदोलन करने की जगह उनके मंदिर प्रवेश के अधिकार की माँग करते हुए आज के सर्वोच्च न्यायालय के सामने खड़े हैं। भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता उनकी अर्जी का विरोध कर रहे हैं। गांधी के हरिजन शब्द का विरोध नहीं, जिसकी आलोचना डॉक्टर आम्बेडकर के समर्थक अवश्य करते। लेकिन वे गांधी की इस माँग के साथ अवश्य खड़े होते कि मंदिर प्रवेश का अधिकार दलित जन का है। इस माँग का समाज में व्यापक विरोध हो रहा है। इस माँग के पहले की शांति छिन्न-भिन्न हो गई है। अशांति फैल गई है। मेहता को इस शांति की चिंता है।
मेहता की दलील है कि यह हिंदू धर्म का भीतरी मामला है। इसमें अदालत के दख़ल की कोई जगह नहीं। किसी धर्म का आचार-व्यवहार उस धर्म के लोग करेंगे। उसका बहुमत यह फ़ैसला करेगा।इसमें अदालत के दख़ल की कोई जगह नहीं।
गांधी यह कहते कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग नहीं है और उसके बिना भी हिंदू धर्म की पूर्णता बनी रहेगी।अदालत अगर उनसे सहमत होती जान पड़ती तो मेहता यह तर्क देते कि यह अदालत का काम नहीं कि वह यह तय करे कि किस धर्म की कौन सी प्रथा, या परंपरा उसके लिए अनिवार्य है और कौन नहीं।
वे मंदिर प्रवेश के लिए संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते। भेदभाव के ख़िलाफ़ बराबरी के अधिकार की माँग करते। वे कहते कि आख़िर दलित भी हिंदू हैं और उन्हें अपने देवता या देवी की आराधना का अधिकार है। गांधी संवैधानिक नैतिकता का हवाला देते। संविधान के परिवर्तनकारी वादे की याद दिलाते। वे दलील देते कि जैसे सवर्ण हिंदू मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं, दलित जन को भी उसका अधिकार है।
महाधिवक्ता तुषार मेहता अदालत से गांधी की इस मांग को ठुकरा कर उनकी अर्ज़ी ख़ारिज करने का आग्रह करते। उनका तर्क होता कि इस माँग से परंपरा भंग होगी। हर धर्म को, उसके संप्रदाय विशेष को इसका अधिकार होना चाहिए कि वह कुछ सीमाएँ तय करे, कुछ नियंत्रण लगाए। दलितों के धार्मिक अधिकार का इससे कोई उल्लंघन नहीं हो रहा है। वे दूसरी जगहों पर, अपने घरों में पूजा-अर्चना कर ही सकते हैं। सवर्णों के मंदिरों में जाने की ज़िद क्यों?
गांधी फिर अदालत से अनुरोध करते कि वह संवैधानिक नैतिकता का ख़याल करे। और मेहता कहते कि यह एक हवाई ख़याल है और उन्हें नहीं मालूम कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ का ठीक ठीक अर्थ क्या है। अदालत को समझना चाहिए कि जनतंत्र बहुमत के विचार से चलता है और अगर बहुमत किसी प्रथा के पक्ष में है तो संवैधानिक नैतिकता के तर्क के सहारे उसे नकारा नहीं जा सकता। संवैधानिक नैतिकता का विचार दुर्भाग्यपूर्ण है। उसे जल्दी से जल्दी ख़त्म कर दिया जाना चाहिए।
गांधी फिर कहते कि डॉक्टर आम्बेडकर ने जिस संविधान की रचना का नेतृत्व किया है उसका महत्त्वपूर्ण उद्देश्य समाज में परिवर्तन लाना है। यह परिवर्तन समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की दिशा में होगा। मेहता फिर कहते कि यह भी वायवीय बात है। परिवर्तनकारी संवैधानकिता भी एक भावुकतापूर्ण प्रलाप है और इसके आधार पर न तो क़ानून बनाए जा सकते हैं और न न्यायिक फ़ैसले किए जा सकते हैं।
मेहता के मुताबिक़ समाज की सामान्य और साझा नैतिकता सर्वोपरि है। सामाजिक नैतिकता की जगह संवैधानिक नैतिकता नहीं ले सकती। सामाजिक या सार्वजनिक नैतिकता वह है जो सारा समुदाय स्वीकार करता है। इससे समाज के साझा मूल्यों से ही सामाजिक नैतिकता का निर्माण होता है। इसके विरुद्ध किसी संवैधानिक नैतिकता को लागू करने से अराजकता फैल सकती है।
मेहता सामुदायिक रीतियों का हवाला देकर पूछते कि गांधी के “‘हरिजन’ मंदिर प्रवेश” के फ़ितूर के पहले सब कुछ ठीकठाक चल रहा था और गाँवों में अमन चैन था। गांधी सामुदायिक और सामाजिक नैतिकता को चुनौती देकर समाज की शताब्दियों पुरानी परंपरा तोड़ रहे हैं और उसके लिए संवैधानिक नैतिकता जैसी विदेशी अवधारणा का इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या संवैधानिक नैतिकता एक अस्पष्ट अवधारणा है? प्रताप भानु मेहता ठीक ही लिखते हैं कि संवैधानिक नैतिकता वास्तव में संवैधानिक संवेदना से पैदा होती है। इसमें आत्म-नियंत्रण,विविधता के प्रति सम्मान, प्रक्रियाओं का आदर,लोकप्रिय संप्रभुता की तानाशाही के प्रति संदेह, और आलोचना की खुली संस्कृति से प्रतिबद्धता शामिल है।
संवैधानिक नैतिकता क्यों ज़रूरी है, डॉक्टर आम्बेडकर ने इसे समझाते हुए कहा था कि भारत की सामाजिक ज़मीन अजनतांत्रिक है। इस ज़मीन पर जनतंत्र का बिरवा फले फूले, इसके लिए यह ज़मीन तोड़नी पड़ेगी। उसका औज़ार संवैधानिक नैतिकता ही हो सकती है। उनके बहुउद्धृत शब्द हैं, “राजनीतिक जनतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक कि उसके पैर सामाजिक जनतंत्र की ज़मीन पर न टिके हों। सामाजिक जनतंत्र का मतलब क्या है? इसका अर्थ है जीने का ऐसा तरीक़ा जिसमें स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार किया गया हो। 

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को एक त्रयी में एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। …समानता के बिना स्वतंत्रता से बहुमत पर चंद लोगों का वर्चस्व स्थापित होगा। बिना स्वतंत्रता के समानता निजी पहलकदमी का गला घोंट देगी…बिना बंधुत्व के स्वतंत्रता और समानता प्राकृतिक रूप नहीं ले सकेंगी।”

सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान भारत के महाधिवक्ता ने संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत के प्रति अपनी अरुचि प्रदर्शित की।उन्होंने यह भी कहा कि यह अकादमिक क्षेत्र के लिए तो ठीक है, लेकिन व्यावहारिक नहीं है। वे सामाजिक नैतिकता के पैरोकार हैं। आज की अदालत में अगर रख्मा बाई भी आतीं तो तुषार मेहता उन्हें जेल भेज देने की सिफ़ारिश करते क्योंकि वे सामाजिक नैतिकता के ख़िलाफ़ निजी स्वतंत्रता और बराबरी का तर्क दे रही थीं। यही आगे चलकर संवैधानिक नैतिकता के तर्क में बदल जाता है।
संवैधानिक नैतिकता समाज में पारंपरिक रूप से कमजोर, पिछड़े हुए लोगों के लिए रक्षा कवच है और जनतंत्र के रास्ते पर चलने में मदद करने वाली टॉर्चलाइट है।सबरीमला में 10 से 50 साल की औरतों के मंदिर प्रवेश का विरोध करते हुए जिस तरह संवैधानिक नैतिकता की टॉर्च को छीनने और बुझा देने की कोशिश की जा रही है, उससे पूरे समाज को सावधान होने की ज़रूरत है।