प्रताप भानु मेहता ने नए साल पर भारतवासियों को मशविरा दिया है कि वे यथार्थ का सामना करने की कुव्वत जुटाएँ।अपनी बनाई फंतासी में यक़ीन करके ख़ुद को भुलावा देने से भला न होगा।अपने लेख का अंत उन्होंने भतृहरि से किया है,“मृगमरीचिका के जल से कभी प्यास नहीं बुझती,पीड़ा और तीव्र ही होती है।”यह संयोग ही है कि प्रताप के लेख के छपने के साथ आनंद तेलतुंबड़े का एक लेख भी प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने भारत के विश्वगुरु होने के दावे और सपने की निर्मममता से परीक्षा की है। दोनों ही लेखकों ने पाठकों को भारत के प्राचीन,गौरवशाली सभ्यता के स्वप्न के छलावे से सावधान किया है।
इसके पहले कि हम इन दोनों विद्वानों की सलाह और चेतावनी पर विचार करें, ज़रा इस पर बात कर लें कि भारत में कौन लोग हैं जो महान सभ्यता होने के कारण विश्व समुदाय में भारत की विलक्षणता के ख़याल में यकीन करते हैं।भारत के मुसलमान, ईसाई और आदिवासी इस भ्रमजाल में बंदी नहीं हैं।हम यही बात आम तौर पर दलितों के बारे में भी कर सकते हैं।क्या भारत में उत्तरपूर्व के लोगों को वाक़ई भारत के प्राचीनतम सभ्यता के दावे में कोई भरोसा है? इस तरह सोचें तो एक बहुत छोटा हिस्सा, जो प्रायः भारत के उच्चवर्णीय हिंदुओं का है, भारत के साभ्यतिक भ्रम को पालते रहने में सुख का अनुभव करता रहा है।
‘भारत किसी समय विश्व का गुरु था; इसके पास जो ख़ास बात रही है, वह है इसकी आध्यात्मिक शिक्षा। विश्व उससे सीखता रहा है। यह क्रम मध्यकाल में टूट गया।फिर औपनिवेशिक दौर आया और हम अपना सभ्यता बोध खो बैठे।’यह भारत के उत्तर भारत के हिंदुओं के सहज बोध का हिस्सा है। अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारत में अंग्रेज़ीयत का राज रहा,यह हीनभाव मात्र हिंदू राष्ट्रवादियों में नहीं था, समाजवादी भी हमें समझाते रहे कि नेहरू आदि नेता मन और विचार से अंग्रेज हैं और वे ही असल भारतीय हैं। नेहरू जैसे लोगों को हटाकर ही असली भारतीयता को वापस बहाल किया जा सकता है।कॉंग्रेस के ख़िलाफ़ जो बात हाल-हाल तक कही जाती रही कि उसने भारतीय साभ्यतिक मूल्यों का दमन किया है।भारत की साभ्यतिक पुनर्स्थापना के लिए उसका हटना ज़रूरी था।
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भारतीय सभ्यता की इस विलक्षणता के प्रमुख स्रोत वेद हैं और उसकी भाषा संस्कृत है।हिंदी को संस्कृत की पुत्री का दर्जा देकर इस लायक़ मान लिया गया कि वह इस सभ्यता की वाहक होगी। जो भूमिका पहले संस्कृत के पास थी अब हिंदी की है।शेष सब भाषाओं को सहयोगी भूमिका निभानी है जैसे राम की सेना में वानरों-भल्लूकों ने निभाई थी। इससे यह स्पष्ट है भारतीय सभ्यता की वापसी के युद्ध का रोमांच मात्र उनको होना है जो ख़ुद को हिंदीभाषी और हिंदू कहते रहे हैं।
सभ्यता का यह स्वप्न आज के यथार्थ को विस्थापित कर सकता है। इसमें एक मोहिनी है।इसलिए तरह-तरह से पूरे भारत में इस सभ्यता के प्रतीकों की स्थापना की जा रही है। संसद में सेंगोल की प्रतिष्ठा से लेकर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण; राम की मूर्तियों की जगह-जगह स्थापना; बनारस, हरिद्वार से लेकर हैदराबाद की चारमीनार तक गंगा आरती; प्रधानमंत्री का बार-बार ऐसे वस्त्राभूषण के साथ सार्वजनिक स्थलों पर उपस्थित होना जिन्हें भारतीय साभ्यतिक परिधान कहा जाता है,धामों को राज्याश्रय और हिंदू राजाओं का महिमामंडन, ये सब उस मिथकीय और इच्छित भारतीय सभ्यता के प्रतीक चिह्न हैं जिसकी वापसी के लिए पिछले 11 सालों से मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।
पहले ‘इस्लामी आक्रमण’ और फिर ‘औपनिवेशिक हस्तक्षेप’ ने इस सभ्यता को ओट में कर दिया था। लेकिन हमारी सभ्यता में कुछ डैम था कि जहाँ रोम, मिस्र,यूनान की सभ्यताएँ नष्ट हो गईं,हमारा नामो-निशाँ बाक़ी है। इस सभ्यता में कुछ बात है कि सदियों ‘दौर-ए-ज़माँ’ के दुश्मन होने के बावजूद हमारी हस्ती मिटती नहीं।
‘हमारी’ में हम कौन हैं? कौन कौन इसमें शामिल हैं? कौन सी एक चीज़ है जो हर तरह के ‘बाहरी’ प्रभाव के बाद भी भारत में बची रह गई है? जो आज भी सारे आधुनिक और संवैधानिक आक्रमणों के बावजूद बची हुई है और उतनी ही ताकतवर बनी हुई है? वह संस्था और विचार है जाति। तो क्या जाति ही भारतीय सभ्यता को परिभाषित करनेवाला सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है? क्या वही भारतीय सभ्यता की निरंतरता को बनाए हुए है?
प्रताप और आनंद, दोनों ही सभ्यता की अवधारणा पर फिर से विचार करने का अनुरोध करते हैं। इस प्रश्न पर विचार करने का कि हम जिस महान सभ्यता का वारिस होने का दावा करते हैं, वह है क्या? और क्या आज हमारा काम इस सभ्यता के गौरव को वापस लाना भर है? क्या आज की पीढ़ियों को यही उपलब्धि होगी? आनंद तो यह बुनियादी सवाल भी उठाते हैं कि इस प्राचीन गौरव का आधार कितना पुख़्ता है।

एक समस्या उस प्राचीन गौरव की पहचान की है जिसे वापस बहाल करना है। दूसरी समस्या संसार के गुरु होने का सपना साकार करने की।’भारत की खोज’ जैसी किताब लिखनेवाले जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि मैं नहीं मानता कि भारत के पास विश्व को सिखलाने के लिए कुछ ख़ास है। असल बात है विश्व समुदाय में बराबरी की जगह लेना। लेकिन आज भारत में बराबरी की जगह के विचार की जगह ऊँची गद्दी हासिल करने का सपना बेचा जा रहा है: एक समय आएगा और वह अब निकट लाया जा रहा है जब भारत से पूरी दुनिया शिक्षा ग्रहण करेगी। हमारे पास क्या है जो बाक़ी दुनिया के पास नहीं?
हम जो अपने बच्चों को अमरीका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में भेजने की जुगत लगाते रहते हैं, जो अपनी धार्मिक और मिथकीय मान्यताओं पर ‘नासा’ की मुहर चाहते हैं,साथ ही यह भी सपना देखते रहते हैं कि हम अगले 20 साल में विश्व के गुरु भी हो जाएँगे। कुछ लोग तो अभी ही मानते हैं कि हम वहाँ पहुँच चुके हैं।
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लेकिन जैसा हमने पहले लिखा, भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से को: मुसलमान, ईसाई, आदिवासी और दलित, यह भ्रम नहीं है। वे सब आज के यथार्थ से अच्छी तरह परिचित हैं क्योंकि वे इस यथार्थ के शिकार हैं। भले लोग इस यथार्थ को स्वीकार करने या इसका सामना करने से बचना चाहते हैं क्योंकि यह कुरूप है।और इस यथार्थ के लिए वे जिम्मेवार हैं। इसलिए इसका कोई भी ज़िक्र उन्हें अपने ऊपर इल्ज़ाम मालूम होता है। और इसी वजह से वे ख़ुद को भुलावा देना चाहते हैं कि वे एक महान साभ्यतिक अभियान के सैनिक हैं।