इसराइल के सत्ताधारी दल ने अपने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि उसने चुनाव चोरी होने दिया है। इसकी वजह यह है कि प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका है। भारत के लोगों को यह बात ज़रा विचित्र लगेगी क्योंकि यहाँ विपक्ष चुनाव आयोग पर वोटों की चोरी का आरोप लगा रहा है। विपक्ष ही नहीं, कई अख़बार भी दिखा रहे हैं कि आयोग ऐसे मतदाताओं को ख़ासकर निशाना बना रहा है जिन्हें भारतीय जनता पार्टी अपने मतदाता नहीं मानती। जैसे मुसलमान और दलित।
साफ़ दिख रहा है कि चुनाव आयोग पूरी कोशिश कर रहा है कि भाजपा के लिए असुविधाजनक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए जाएँ। लेकिन इसराइल में बिलकुल उलटी बात हो रही है। सत्ताधारी दल चुनाव आयोग से इसलिए ख़फा है कि उसने अरब लोगों को मतदान करने दिया है जिसका नतीजा यह है कि अरब पार्टियों को अच्छी संख्या में सीटें मिली हैं और सत्ताधारी दल सबसे अधिक सीटें लाने के बावजूद सरकार बनाने लायक़ नहीं रह गया है।
लेकिन इस बार इसराइल में सत्ताधारी दल सिर्फ़ चुनाव आयोग पर आरोप नहीं लगा रहा। वह अरब, फ़िलिस्तीनी मतदाताओं पर इल्ज़ाम लगा रहा है कि उन्होंने चुनाव चुरा लिए हैं। इसकी वजह यह है कि इस बार के चुनाव में अरब या फ़िलिस्तीनी लोग बड़ी संख्या में बाहर आए और उन्होंने मतदान किया।इस वजह से अरब पार्टियों को 19 सीटें मिल गई हैं। नेतन्याहू के दल को 53 सीटें मिली हैं जबकि उदार मानी जाने वाली ज़ायनवादी पार्टी को 49 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सीटें चाहिए। वह किसी के पास नहीं।
सालों से नेतन्याहू को सरकार से बाहर करने का अभियान चलनेवाली ज़ायनवादी पार्टी के पास एक मौक़ा है कि वह अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाए। लेकिन ख़ुद को उदार और जनतांत्रिक कहनेवाली पार्टी भी यह करने से इनकार कर रही है। ऐसा इसलिए कि अरब लोगों को सरकार में जगह देने का मतलब यह है या स्वीकार करना कि इस्राइल पर उनका भी हक़ है और वे यह तय कर सकते हैं कि इसराइल किस तरह चलेगा, उसकी नीतियाँ क्या होंगी। इसराइल की यहूदी पार्टियाँ कितनी भी उदार हो जाएँ, अरब लोगों को बराबर का अधिकार देने को तैयार नहीं।वे यह मानने को तैयार नहीं कि वे इस्राइल में यहूदियों के बराबर के नागरिक हैं।
तो क्या दो ज़ायनवादी पार्टियाँ साथ मिलकर सरकार बनाएँगी? नेतन्याहू ने कहा है कि सारे ज़ायनवादी लोगों को एक हो जाना चाहिए। लेकिन विपक्षी पार्टियाँ सालों से नेतन्याहू के ख़िलाफ़ अभियान चलाती रही हैं। यह चुनाव उनके लिए आख़िरी मौक़ा था कि वे नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर सकें। वह संभावना अभी भी है। क्या वे ऐसा करना चाहेंगी? या वे ज़ायनवाद के प्रति अपनी वफ़ादारी के कारण नेतन्याहू से समझौता कर लेंगी?
अगर यह गतिरोध बना रहता है तो दुबारा चुनाव कराना पड़ेगा।नेतन्याहू यही चाहेगा। क्योंकि इस बार संभव है कि अरब लोग दुबारा मतदान के लिए उतनी बड़ी संख्या में न निकलें जितनी संख्या में इस बार वे बाहर आए थे। और वे इसराइली लोग भी, जो दूसरे देशों से उड़ कर वोट देने आए, शायद दुबारा इतना ख़र्च करके न आएँ। और इस तरह नेतन्याहू के विरोधी मतों की संख्या कम हो जाएगी।
पिछले 3 दशक से इसराइल की राजनीति पर नेतन्याहू का ही क़ब्ज़ा रहा है। भ्रष्टाचार के आरोपों में सज़ा से बचने का एक ही उपाय नेतन्याहू के पास है: सत्ता में बने रहना।
हमने पिछले सालों में इसराइल में नेतन्याहू के ख़िलाफ़ बड़े बड़े प्रदर्शन देखे हैं।माना जाता है कि वहाँ बहुमत नेतन्याहू के ख़िलाफ़ है। लेकिन वही बहुमत फ़िलिस्तीनियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। वह उन्हें अपने बराबर नहीं मानता। वह मानता है कि इसराइल पर उसी का एकाधिकार है और या तो अरब लोगों को इसराइल छोड़ देना चाहिए या उन्हें हमेशा दूसरे दर्जे के लोगों की तरह, बिना किसी राजनीतिक अधिकार के रहना चाहिए।
यहूदी श्रेष्ठतावाद और एकाधिकारवाद में विश्वास करने के कारण इस चुनाव की जनतांत्रिक संभावना को चरितार्थ करना कठिन हो रहा है। अरब लोगों से नफ़रत इतनी ताकतवर है कि वह नेतन्याहू जैसे भ्रष्ट और अपराधी के साथ हाथ मिलाने को बुरा नहीं मानती।
इसराइल एक ऐसा मुल्क है जिसके घर घर में ज़यानवाद है। बल्कि ज़ायनवादी यहूदियों के उस ज़मीन पर होने का कारण ही वह विचारधारा है जो उस पर यहूदियों का पहला अधिकार मानती है। उसके मुताबिक़ दैवी विधान से फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर वास्तविक अधिकार यहूदियों का है।
इस चुनाव से यह साबित हो गया है कि ख़ुद को जनतांत्रिक और उदारवादी माननेवाले इस्राइली यहूदियों से यह उम्मीद बेकार है कि फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर फ़िलिस्तीनियों के अधिकार को वे क़बूल करें। यह इसलिए भी है कि पिछले कई दशकों से ग़ाज़ा पट्टी और पश्चिमी तट पर इसराइल को खूँरेजी और फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार को लेकर भी इसराइल के समाज में कोई विरोध नहीं है।
इसराइल का क्या होगा? यह इस पर निर्भर है कि इसराइल के निर्माण में निहित मूल अपराध को इसराइली यहूदी क़बूल करें। वे स्वीकार करें कि 1948 में फ़िलिस्तीनियों का क़त्लेआम और उन्हें उनकी ज़मीन से जलावतन करना जुर्मन था। वे आत्मस्वीकृति करें और यह वादा करें कि वे फ़िलिस्तीनियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को शायद ख़तन नहीं कर सकते क्योंकि अब दूसरी-तीसरी पीढ़ी के इसराइली पैदा हो चुके हैं। वे कहाँ जाएँगे। लेकिन जो किया जा सकता है, वह है फ़िलिस्तीन की बहाली। फिलिस्तीनियों के अपने तरीके से जीने, अपना राष्ट्र राज्य चलाने के अधिकार की स्वीकृति। लेकिन यह तब तक न होगा जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे लेकर प्रतिबद्ध न हो।
इसराइल के इन चुनावों में बावजूद सारी अलोकप्रियता के नेतन्याहू को इतनी सीटें मिलने का मतलब यही है कि इसराइल के यहूदी इस दिशा में कदम बढ़ाने को तैयार नहीं हैं।इसराइल के घर-घर में आई डी एफ़( फ़ौज) मौजूद है। हरेक के माथे पर फ़िलिस्तीनियों का खून है। वे फ़िलिस्तीनियों के दमन, उनके साथ हर तरह की क्रूरता में ख़ुद लिप्त रहे हैं। फिर वे ख़ुद को नेतन्याहू से अलग कैसे कर सकते हैं?