आरएसएस स्वयंसेवक का अंतिम संस्कार कराती हुई इरफाना इक़बाल। संघ-बीजेपी को यह पसंद नहीं आया।
मुहर्रम के रोज़ केरल के कासड़कोड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक नारायणन थोट्टाथोडी का अंतिम संस्कार करवाते हुए इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग और कासड़कोड ज़िला पंचायत की सदस्य इरफ़ाना इक़बाल की तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब प्रसारित हुई। अख़बारों ने भी इसका नोटिस लिया। घृणा से जलते इस देश की देह पर जैसे सद्भाव के कुछ शीतल छींटे पड़े। लेकिन इस देश में एक ऐसी संगठित शक्ति है जिसे सद्भाव बर्दाश्त नहीं। भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाई ने प्रेस वक्तव्य दिया कि वास्तव में ‘सेवा भारती’ ने नारायणन के अंतिम संस्कार का सारा खर्च और इंतज़ाम किया था। उसने इरफ़ाना इक़बाल पर इल्ज़ाम लगाया कि वह दाह-संस्कार का श्रेय लेकर राजनीतिक लाभ लेने की साज़िश कर रही हैं।
वह समाज अभागा है जहॉं सद्भाव को तुरत अवैध ठहराया जाए। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सद्भाव को अपने लिए सबूत पेश करना पड़े। भाजपा के बयान के बाद इरफ़ाना बाध्य हो गईं कि वे सारे काग़ज़ात जारी करें जिनसे साबित होता है कि कैंसर से पीड़ित नारायणन लावारिस पड़े थे और न तो उनके परिवार और न ही अपने आपको हिंदुओं का परिवार घोषित करनेवाले आर एस एस ने उन्हें पानी भी दिया, हस्पताल ले जाने की बात दूर रही। इरफ़ाना की संस्था शेख़ ज़ाएद फाउंडेशन के सदस्यों ने नारायणन को साफ़ सुथरा करके हस्पताल में दाखिल किया जहाँ उनकी मौत हो गई।
परिवार ने अंतिम संस्कार करने में असमर्थता ज़ाहिर की और ज़ाएद फाउंडेशन से इसके लिए आग्रह किया। फिर फाउंडेशन ने श्री नित्यानंद योग आश्रम से, जो कोंडेवूर मठ के नाम से प्रसिद्ध है, संपर्क किया कि वह हिंदू रीति से संस्कार करने में फाउंडेशन की मदद करे। मठ ने रघु नाम के एक व्यक्ति को भेजा जो इत्तफ़ाक़ से सेवा भारती के अध्यक्ष हैं। लेकिन एंबुलेंस, संस्कार की सामग्री आदि सबका खर्च और इंतज़ाम ज़ाएद फाउंडेशन ने किया। इरफ़ाना ने बतलाया कि इसके पहले भी वे 12 हिंदुओं का अंतिम संस्कार मठ के सहयोग से कर चुकी हैं।
नारायणन मुँह के कैसर से पीड़ित थे और लावारिस पड़े थे। इरफ़ाना इक़बाल ऐसे मरीज़ों की देखभाल के लिए एक आश्रय स्थल चलाती हैं। नारायणन की हालत ऐसी न थी कि वे आश्रय ले जाए जाते। इसलिए उन्हें हस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। इतना भर करके इरफ़ाना नारायणन को भूल नहीं गईं।उनकी मृत्यु के बाद भी उनका ध्यान रखा।
इरफ़ाना को अपने सद्भाव का सबूत क्यों देना पड़ा? क्यों यह बतलाना पड़ा कि मुसलमान के भीतर करुणा और मानवीयता सहज है और वह हर किसी के लिए उपलब्ध है, सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं?
कहा जा सकता है कि उन्हें यह नहीं करना चाहिए था। क्या हमने यह कहावत नहीं सुनी है: ‘नेकी कर दरिया में डाल’ या बाएँ हाथ को न मालूम हो कि दाएँ ने क्या दिया है? सद्भाव का प्रदर्शन अरुचिकर है। लेकिन इरफ़ाना को ऐसा इसलिए करना पड़ा कि भाजपा या आर एस एस धर्मनिरपेक्ष सद्भाव की किसी भी संभावना से ही इनकार करते हैं और उसे मिथ्या बतलाते हैं। निश्चय ही इरफ़ाना इक़बाल को बुरा लगा होगा कि वे इसके बारे में सार्वजनिक रूप से सफ़ाई दें।
मैंने भी जब यह खबर इस तस्वीर के साथ देखी जिसमें एक मुसलमान औरत चिता पर लकड़ी रख रही है तो लगा कि इसका प्रचार क्यों। लेकिन भाजपा ने बतला ही दिया कि क्यों यह यह कहते रहना आवश्यक है कि इस देश में सद्भाव जीवित है।
सद्भाव में भी शक्ति होती है। इस बात को भारत के लोग भूलते जा रहे हैं क्योंकि निरंतर घृणा प्रचार से पैदा होने वाली उत्तेजना ने उनके विवेक को शिथिल कर दिया है।
घृणा का मात्र मानसिक प्रभाव नहीं पड़ता, वह शारीरिक तंत्र पर, हमारे स्नायुओं पर भी असर डालती है। जिससे घृणा की जाती है, मात्र उस पर नहीं, जो घृणा करता है, उस पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्तचाप बढ़ना, हृदय गति का असामान्य होना, स्नायुओं में तनाव, बेचैनी, पाचन तंत्र में गड़बड़ी, एकाग्र होने में कठिनाई: यह सब घृणा के परिणाम हैं। घृणा से पीड़ित लोगों का अध्ययन और उनका इलाज करनेवाले विशेषज्ञ इसकी चेतावनी देते हैं कि घृणा के संसर्ग में लंबे समय तक रहने पर लोग पी टी एस डी के शिकार हो सकते हैं। आप घृणा करनेवालों को देखें: उनके चेहरे और भाषा में एक ख़ास तरह की विकृति आ जाती है। वह मात्र घृणा के तीव्र क्षणों में नहीं, बाद में भी बनी रहती है। घृणा से क्रोध, आक्रामकता का सीधा रिश्ता है। यह आक्रामकता भाषा से लाकर हमारे शारीरिक व्यवहार में देखी जा सकती है।
यह सब घृणा करनेवालों को मालूम नहीं होता। घृणा की आरंभिक उत्तेजना हमें कुछ भी सोचने से रोक देती है। यह कुछ विचित्र जान पड़ सकता है लेकिन घृणा में एक विचित्र आनंद भी है। उससे हमें ताक़त का अहसास भी होता है।घृणा से भ्रम होता है कि हम किसी और के बारे में निर्णय कर सकते हैं। दूसरे को हीन समझने का एक पक्ष ख़ुद को श्रेष्ठ समझना भी है।
घृणा सामुदायिकता का निर्माण करती है और उसका क्षरण भी करती है। जिससे घृणा की जाती है, उससे किसी भी प्रकार के मानवीय संबंध की संभावना ख़त्म हो जाती है।लेकिन घृणा करनेवालों का एक समुदाय बन जाता है। जिनसे वास्तविक जीवन में कोई लेना देना नहीं, उनसे इसलिए अपनापन मालूम पड़ता है कि वे भी उसी से घृणा करते हैं, जिससे हम घृणा करते हैं। लेकिन जो घृणा के निशाने पर है, वह दायरे के बाहर हो जाता है।
हम अभी जिस घृणा की बात कर रहे हैं, वह किसी व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि समुदाय के ख़िलाफ़ घृणा है। किसी व्यक्ति से निजी घृणा के लिए आप ठोस कारण दे सकते हैं। लेकिन जब समुदाय से घृणा की जाती है तो उसके सारे व्यक्तियों में हम एक ही प्रकार के वे अवगुण देखते हैं जिनके चलते हम उनसे घृणा करते हैं।
यह भी हो सकता है कि जिस समुदाय से घृणा है, उसके सदस्य किसी व्यक्ति से हमारी निजी घनिष्ठता हो। मसलन, भारत में मुसलमानों से घृणा करनेवाले हिंदुओं में ऐसे लोग मिल जाएँगे जिनके कुछ मित्र मुसलमान हैं। उन मित्रों को वे अपनी घृणा से मुक्त कर देते हैं। इसके लिए उनका तर्क यह होता है कि उनका मित्र मुसलमान अच्छा आदमी है और उसमें वे ‘अवगुण’नहीं हैं, जिनके कारण वे आम तौर पर मुसलमानों से घृणा करते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनके अच्छे मुसलमान मित्र के गुण का उन हिंदुओं को कुछ भी पता नहीं, जो मुसलमान विरोधी घृणा के समुदाय के सदस्य हैं और जो उस विशेष मुसलमान को नहीं जानते। हो सकता है कि वह अच्छा मुसलमान किसी दिन इस आम मुसलमान विरोधी घृणा का शिकार हो जाए। आपके घर से वह चाय पीकर निकले और सड़क पर उस भीड़ के हाथों मारा जाए, मुसलमान को देखते ही जिसकी घृणा उबल पड़ती है। आप ख़ुद उस घृणा के समुदाय के सदस्य हैं। क्या इस हत्या का कुछ जिम्मा आपका भी होगा?
- जैसे घृणा व्यक्ति निरपेक्ष होती है और समुदाय आधारित होती है, सद्भाव भी मात्र अपने परिचित या मित्र तक सीमित नहीं रहता। नारायणन इरफ़ाना के मित्र न थे, बल्कि मुसलमानों को शत्रु माननेवाले आर एस एस के सदस्य रहे थे। फिर भी इरफ़ाना ने यह न माना कि नारायणन उनके सद्भाव के पात्र नहीं।
इरफ़ाना को सद्भाव के इस अभ्यास से क्या मिला? चैन, अपने पर भरोसा, आत्मविश्वास, इत्मीनान! शायद वे इसके बदले कुछ न चाहती हों।लेकिन सद्भाव की इस ख़बर से जो छटपटा उठे,उनके बारे में क्या कहें?