किसी भी शासन का मूल्यांकन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसने समाज में उदात्त या शुभ भावों या वृत्तियों को उन्नत या प्रोत्साहित किया है या व्यक्ति या समुदायों में दबी हुई निम्न वृत्तियों को उकसाया और बढ़ावा दिया है। हम जानते हैं कि हर समाज, या समुदाय में दोनों प्रकार की वृत्तियाँ रहती हैं। साथ रहने की इच्छा, सभ्य आचरण करने या सभ्य दिखलाई पड़ने की आकांक्षा, दूसरों की मदद करने या उनसे मानवीय रिश्ता बनाने की प्रवृत्ति, व्यापकता, उदारता, क्षमाशीलता, सहिष्णुता, अन्य के प्रति उत्सुकता, सहानुभूति, सद्भावना, ख़ुद को व्यापक बनाने की महत्वाकांक्षा हर समुदाय में होती है या हो सकती है। इसके साथ ही असत्य, छल-कपट, दुराव, विद्वेष, घृणा, संकीर्णता, दूसरे के प्रति संदेह, अलगाव और हिंसा की प्रवृत्ति भी प्रत्येक समुदाय में विद्यमान होती है। हर व्यक्ति या समुदाय में कहीं भीतर अश्लीलता छिपी होती है लेकिन उसे प्रकाशित करने में उसे संकोच होता है। वरना वह असांस्कृतिक और असभ्य माना जाता है।
परिष्कृत भाषा का अभ्यास, सतहीपन की जगह जटिलता को समझने की इच्छा भी प्रत्येक समाज में होती है। साथ ही क्षुद्रता, फूहड़पन, अश्लीलता और सतहीपन भी। ख़ुद को स्वाधीन मानना, ख़ुदमुख़्तार समझना और अधिकार संपन्न मानना और सरकार को अपने अधीन मानना जनतांत्रिक चेतना का प्रमाण है। दूसरी तरफ़, किसी एक को दैवी शक्ति युक्त मान लेना और स्वयं को उसके सुपुर्द कर देना और वह भी बिना किसी ज़बरदस्ती के, स्वेच्छा से: यह भी जनतांत्रिक चेतना का दूसरा पक्ष है। ऐसा करते हुए लगता है कि यह निर्णय हमें ख़ुद ही किया है। विनम्रता, दूसरों से सीखने की प्रस्तुति और आत्मालोचना के बरक्स अहंकार, श्रेष्ठता बोध और ख़ुद को सर्वज्ञानी समझने की बीमारी भी मौजूद रहती है।
कौन सा समाज किस दौर में है, इसे जाँचने का एक तरीक़ा यह देखना भी है कि उसने अपने लिए किस प्रकार का नेतृत्व चुना है। या उसका आदर्श क्या है? वह नेतृत्व उसके साथ क्या करता है? क्या वह एक भीड़ को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के समूह के रूप में देखना चाहता है या व्यक्ति को भीड़ का हिस्सा बना देना चाहता है? क्या वह ख़ुद को व्यक्ति और समाज के प्रति जवाबदेह मानता है? या व्यक्तियों को अपने अनुयायियों में तब्दील कर देना चाहता है?
कहा गया है कि महाजन जिस रास्ते जाते हैं, प्रायः जनता भी उसी रास्ते चलती है। एक तरह से महाजन वह आईना है जिसमें लोग अपना चेहरा देखते हैं।
कौन सा नेता अच्छा है? वह, जो आपको निर्भय करे, या वह, जो भयभीत करे? जो आपको स्वाधीन करे या जो आपको परनिर्भर बना दे? जो प्रश्न करने का साहस और विवेक दे या जो प्रश्न को अपराध बना दे?
मानव-समाज के इतिहास में, और यह पूरी दुनिया के बारे में कहा जा सकता है, ऐसे दौर आते हैं जब किसी एक राष्ट्र में हम शुभ भावों का प्राधान्य देखते हैं और ऐसा वक्त भी आता है जब अशुभ या निम्न वृत्तियाँ सामाजिक और निजी जीवन पर हावी हो जाती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई ऐसा एक वक्त होता है जब समाज में भलाई ही भलाई होती है, या सारे लोग भले बन जाते हैं। यह ज़रूर होता है कि ऐसे वक़्फ़े आते हैं जिनमें लोग प्रायः भले होना चाहते हैं। या भला दीखना तो ज़रूर चाहते हैं। या भला होना आदर्श माना जाता है।
जवाहरलाल नेहरू की सीख
जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘हिंदुस्तान की खोज’ में गांधीजी के नेतृत्व के बारे में लिखा है। उन्होंने हिंदुस्तान और उसके लोगों के साथ क्या किया? नेहरू लिखते हैं, ‘ उनकी सीख का सार था निर्भयता और सत्य; और इन दोनों के साथ सक्रियता मिली हुई थी…।’ ….’ हमारे इतिहास के ही प्रभात में जनक और याज्ञवल्क्य ने कहा था कि जनता के नेताओं का काम उसको (जनता को) निर्भय बनाना है।’ नेहरू आगे कहते हैं कि गांधी के आने के समय हिंदुस्तानियों को चारों तरफ़ से डर ने घेर रखा था। ‘…इस डर के ही ख़िलाफ़ गांधी की शांत, किंतु दृढ़ आवाज़ उठी: डरो मत।’वक़्त-बेवक़्त से और खबरें
इस तरह गांधी ने मानो अचानक लोगों के ऊपर से डर का लबादा हटा दिया। पूरी तरह नहीं, लेकिन बड़ी हद तक तो निश्चय ही। नेहरू ने लिखा कि इसके साथ ही हम झूठ से भी ज़रा दूर हुए क्योंकि झूठ तो सच का ही करीबी दोस्त है। भारतीय जनता पहले जैसी न रह गई; ‘ हिंदुस्तान की जनता जैसी भी थी, उससे कोई बहुत ज़्यादा सच बोलनेवाली नहीं बन गई और न उस जनता ने …अपने बुनियादी स्वभाव को ही बदल लिया।’
नेहरू उस बदलाव के बारे में, जो गांधी के सान्निध्य में भारत के लोगों में आया, लिखते हैं, ‘जैसे हम पहले थे, उसके मुक़ाबले हम कोई बहुत ज़्यादा सच्चे नहीं बन गए, लेकिन अटल सत्य के प्रतीक गांधीजी बराबर हमारे सामने थे, जो हमको ऊपर खींचते थे और जो सत्य पर डट कर रहने का वास्ता देते थे।’
गांधी के बाद जिस एक शख़्स ने भारतीयों पर गहरा असर डाला, वह ख़ुद नेहरू थे। एक तरह से उन्होंने लोगों को संसदीय जनतांत्रिक आचरण की शिक्षा दी। निर्भय और स्वतंत्र होने का अर्थ आलोचनात्मक होना है, लेकिन उद्धत होना नहीं।
असहमति के लिए जगह बनाई जाती है। आलोचक को सुना जाता है, दुत्कारा नहीं जाता। आप अपने विरोधी को नीचा नहीं दिखलाना चाहते, उसे अपमानित करना नहीं चाहते। नेहरू के समय ने उद्धत समाजवादी राममनोहर लोहिया और उग्र हिंदुत्ववादी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों को अपना स्वभाव संयमित करना सिखलाया। अपने आलोचक को महत्त्व देना और अपने ऊपर संदेह करते रहना नेहरू युग की ख़ासियत थी। वह हीनता बोध से उलट आत्म विश्वास का सूचक था जिसमें हम आलोचना को न सिर्फ़ सुन सकते थे बल्कि उसपर विचार भी कर सकते थे और अपने आप में संशोधन भी करने को तैयार थे।
गांधी प्रभाव
नेहरू इसे गांधी प्रभाव कहते थे। उनसे जब देश की तरक्की की बात पूछी जाती तो वे अक्सर यह कहते थे कि उसकी माप इससे भी होती है कि देश के लोगों की गुणवत्ता क्या है। क्या वे उम्दा क़िस्म के इंसान बन रहे हैं? क्या लोग पहले से बेहतर बन रहे हैं? उसका मतलब यह था कि क्या वे दूसरों का ख़याल रखते हैं, क्या वे जिज्ञासु हैं और क्या उनमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृति के प्रति कौतूहल है। क्या वे अधिक बहिर्मुखी हैं या अंतर्मुखी? उनके मूल्य क्या हैं?भारत का समाज कैसा?
आज एक व्यक्ति के 12 साल तक लगातार प्रधानमंत्री होने के लिए उसका महिमामंडन किया जा रहा है। इन 12 सालों में भारत के समाज की गुणवत्ता के बारे में हम क्या कहेंगे? क्या समाज में भय, मिथ्याचार, छल-कपट, धोखा, विद्वेष, घृणा, हिंसा, फूहड़पन, अश्लीलता, सतहीपन, चापलूसी, संकीर्णता, परस्पर संदेह, अविश्वास के भाव गहरे हुए हैं? क्या समाज में साहस बढ़ा है या गुंडापन? क्या समाज में मूर्खता, अहमन्यता, आत्मकेंद्रिकता, आत्मुग्धता बढ़ी है? चूँकि भारत के आज के प्रधानमंत्री ख़ुद को हिंदुओं का नेता कहलाने में ही गर्व करते हैं तो हमें पूछना चाहिए कि क्या हिंदू समाज औसत रूप में पहले से बेहतर हुआ है या घटिया? क्या वह उन्नत हुआ है या उसका पतन हुआ है? क्या प्रधानमंत्री उसे ऊपर आने की चुनौती दे रहे हैं या उसे अपनी सतह पर नीचे ग़लाज़त में घसीट रहे हैं? शेष विश्व उसे सराहना, प्रशंसा की निगाह से देखता है या वितृष्णा की? इन 12 सालों के आईने में इस समाज को अपनी सूरत कैसी नज़र आती है?