‘हिंदू समाज के बीभत्स चित्र’: कोई 90 साल पहले प्रेमचंद ने इस शीर्षक से एक नहीं, तीन लेख लिखे थे। इन लेखों में उन्होंने हिंदू प्रथाओं की आलोचना की। पहले लेख ‘लाश की दुर्गति’ में मृत्यु के बाद के हिंदू रीति-रिवाजों की धज्जी उड़ाई। दूसरे लेख में निकम्मे हिंदू बाबाओं पर उन्होंने हमला किया। तीसरे लेख में उन्होंने हिंदू मंदिरों की दुर्दशा और उनके संचालकों के पाखंड की बखिया उधेड़ी।
आज कोई प्रेमचंद की हैसियत का लेखक या संपादक नहीं जो इस शीर्षक से लेख लिखे और छाप सके।तीनों लेख अभी भी लिखे जा सकते हैं। मृत्यु के बाद का पूरा कर्मकांड आज भी प्रायः उतना ही दुखदायी है जितना प्रेमचंद के वक्त था। आज के हिंदू बाबाओं को देखते तो अपने वक्त के बाबा प्रेमचंद को संत जान पड़ते। हिंदू मंदिर उतनी ही बुरी हालत में हैं और प्रायः वैसे ही पाखंडियों के हाथ में हैं। लेकिन अब इन विषयों पर चर्चा बंद ही हो गई है।
प्रेमचंद के समय दो शब्द प्रचलित थे: कुरीति और कुप्रथा। लोग समाज को कुरीतियों और कुप्रथाओं से मुक्त करने के बारे में सोचते और बोलते थे। इसके साथ एक और शब्द था:सुधार। हिंदू समाज में सुधार अभियान, आंदोलन चला करते थे। हिंदू समाज को ये शब्द अब सिर्फ़ किताबों में पढ़ने को मिलते हैं।वह भी कम से कम 75 साल पहले की किताबों में।
ऐसा लगता है, अब हिंदू समाज में कोई समस्या नहीं रह गई या अगर है तो इतनी गंभीर नहीं कि उसपर सार्वजनिक चर्चा की जाए। अब हिंदू अपनी कुरीतियों के ख़िलाफ़ कोई अभियान नहीं चलाते, अपने सुधार का कोई आंदोलन नहीं करते। उनकी निगाह अब बाहर की तरफ़ है:वे मुसलमानों के भीतर की कुप्रथाओं को दूर करने के लिए अधिक उत्सुक जान पड़ते हैं। उनमें मुसलमानों का सुधार करने का उत्साह कहीं अधिक है।
हिंदुओं की निगाह में मुसलमान पिछड़े हुए हैं, जबकि हिंदू स्वभावतः प्रगतिशील हैं; उनमें धार्मिक कट्टरता बहुत है, जबकि हिंदू उदार होते हैं; मुसलमान असहिष्णु होते हैं जबकि हिंदू अत्यंत सहिष्णु हैं; हिंदू पारंपरिक रूप से आधुनिक होते हैं जबकि मुसलमान रूढ़िग्रस्त ।
हिंदू समाज अब अपने बारे में कम सोचता है, दूसरे धर्मों के बारे में अधिक। अपूर्वानंद, जाने-माने विचारक
प्रेमचंद के लेखों के संदर्भ में अपूर्वानंद की अपने लेख में टिप्पणी
यह भी बुरा न होता अगर उसमें उन धर्मों के प्रति उत्सुकता होती, वह उनका अधिक परिचय प्राप्त करने की कोशिश करता। वह यह नहीं कर रहा।हालाँकि मुसलमान हिंदुओं के क़रीब सैंकड़ों सदियों से रह रहे हैं, लेकिन वह उनकी धार्मिक प्रथाओं, उनके रोज़मर्रा के जीवन में धार्मिक आचार-व्यवहार, आदि के बारे में बहुत कम जानता है।वह उनके धार्मिक चरित्रों के बारे में भी नहीं के बराबर जानता है। मुसलमान और ईसाई हिंदू धर्म, उनके आचार व्यवहार, उनके धार्मिक चरित्रों के विषय में जानकारी रखते हैं। रामायण और महाभारत की कहानियाँ भी उन्हें मालूम हैं। यही बात हिंदू अपने बारे में नहीं कह सकते।
होली, दीवाली आते ही लोग उनके बारे में मुसलमान शायरों के गीत, नज़्में और ग़ज़लें उद्धृत करने लगते हैं। लेकिन हिंदू कवियों ने, अगर आप मैथिलीशरण गुप्त जैसे अपवाद को छोड़ दें; कर्बला, हसन-हुसैन, मुहम्मद साहब, ईद, बक़रीद,शबे-बरात, या बड़ा दिन या नौरोज़ पर शायद ही कुछ लिखा हो। ईद के मौक़े पर ‘हिंदू’ लेखक प्रेमचंद की कहानी के अलावा और कुछ याद नहीं आता।
अपनी इस सांस्कृतिक उदासीनता के बारे में हिंदू समाज के भीतर कोई विचार विमर्श हुआ हो, याद नहीं आता।
इस लेख में हम अभी इस उदासीनता की बात नहीं कर रहे। 90 साल पहले लिखे गए प्रेमचंद के लेखों की याद करते हुए उस शृंखला में आगे कुछ जोड़ना चाहते हैं। आज के हिंदू समाज के बीभत्स चित्र कैसे हैं? उसके पहले बीभत्स क्या है, इसे समझने की कोशिश करते हैं। वामन शिवराम आप्टे के कोश के अनुसार बीभत्स शब्द का अर्थ है: घृणोत्पादक,घिनौना,दुर्गंधयुक्त, भीषण, जुगुप्साजनक। बर्बर, क्रूर,गर्हित भी इसके अर्थों में गण्य हैं।
एक दृश्य: मुसलमान बक़रीद की सामूहिक नमाज़ अदा कर रहे हैं। उसके ठीक सामने सैंकड़ों हिंदू ढोलक-करताल के साथ ज़ोर ज़ोर से ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे हैं। जो वे कर रहे हैं, उसे पाठ नहीं कहा जाएगा। वे जैसे जोर-जोर से चालीसा पढ़ रहे हैं। एक तरफ़ नमाज़ का दृश्य है: ख़ामोश,आत्मलीन, हज़ारों श्रद्धालुओं के उठते और झुकते सर देखनेवाले के मन में शांति का संचार कर रहे हैं। वहीं उन्हें घेरे हुए, बेसुरे ढंग से चीख चीखकर हनुमान चालीसा पढ़ते हुए हिंदू। जो वे कर रहे हैं, उसमें श्रद्धा कहीं नहीं है। शांति नहीं है। आत्मलीनता नहीं है। उनका उद्देश्य धार्मिक या आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करना नहीं है। उनके ध्यान का केंद्र हनुमान नहीं हैं, बल्कि वे मुसलमान हैं जो नमाज़ पढ़ रहे हैं।
इस दृश्य को देखकर कोई भी जुगुप्सा से भर जाएगा।यह दृश्य आपके मन में विरक्ति पैदा करेगा ।ट्रेन में एक कोने में या अपनी सीट पर नमाज़ पढ़ते मुसलमान को घेर कर ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाना या हनुमान चालीसा चिल्लाना: इस तरह के दृश्य अब आम होते जा रहे हैं।
हिंदू धार्मिक अवसरों पर जुलूस अब अनिवार्यतः मुसलमानों की बस्तियों से निकाले जाते हैं। अगर इन जुलूसों में दुर्गा या राम की स्तुति हो रही हो तो शायद मुसलमानों को भी आध्यात्मिक लाभ हो। लेकिन इन जुलूसों में राम या दुर्गा या हनुमान की जय के नारे या भक्ति के गीत नहीं बजते, मुसलमानों को गाली गलौज, धमकी देते हुए गाने बजते हैं। राम या दुर्गा नहीं, मुसलमान, मुल्ला, माँ बहन की गाली! यह अपवाद नहीं, नियम बनता जा रहा है।
आप कल्पना करें:एक विदेशी जो हिंदी नहीं जानता, जब यह पूछेगा कि इन गानों में क्या है तो उनका अर्थ सुनकर वह उनके भक्ति सौंदर्य से प्रभावित होगा या घिन से भर उठेगा। अभी बीती रामनवमी के मौक़े पर ऐसे एक धार्मिक जुलूस में हिंदू किशोरियाँ एक गाने पर उछल-उछलकर नाच रही हैं जिसमें मुसलमानों को माँ की गाली दी जा रही है। क्या आप उनके आनंद में शरीक होना चाहेंगे? क्या आप इस दृश्य को बर्दाश्त कर सकेंगे?
हिंदू पर्व त्योहार साल में कई बार आते हैं, इसलिए इस तरह के बीभत्स दृश्य भी कई बार दुहराए जाते हैं। एक प्रकार से यह बीभत्सता अब हिंदू धार्मिकता का अंग बन गई है।
मात्र हिंदू धार्मिकता में नहीं, बल्कि यह घिनौनापन हिंदू स्वभाव बनता जा रहा है। एक मुसलमान बुजुर्ग चले जा रहे हैं। उन्हें घेर कर कुछ हिंदू बार-बार जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं। एक ऑटो रिक्शेवाले को रोक कर उसे जय श्रीराम का नारा लगाने को मजबूर किया जाता है। एक रिक्शेवाले को पीटते हुए जय श्रीराम बोलने को मजबूर किया जाता है, जबकि उसकी बेटी रो रोकर लोगों से उसे छोड़ देने की गुहार कर रही है।
एक कबाड़ी को धमकी दे जाती है कि अगर वह जय श्रीराम का नारा नहीं लगाएगा, तो उसे अपना धंधा करने नहीं दिया जाएगा। अब भारत में ये रोज़मर्रा के दृश्य हैं। हिंदू जीवन के रोज़मर्रापन के अंग। मालूम नहीं, शेष हिंदुओं के मन में इन दृश्यों से किस प्रकार का भाव उत्पन्न होता है। लेकिन कोई ग़ैर हिंदू या विदेशी तो इन्हें देखकर विरक्ति से भर उठेगा।
मुसलमानों को पीटते हुए, गोमूत्र पिलाते, गोबर खिलाते हिंदुओं के वीडियो भी अब खूब प्रसारित किए जा रहे हैं। इन्हें हिंदू ही प्रसारित करते हैं। हो सकता है, हिंदुओं का एक हिस्सा इन्हें देख आनंदित हो कि मुसलमानों को बेइज्जत किया जा रहा है लेकिन यह तय है कि इन्हें देखकर किसी ग़ैर हिंदू या समझदार हिंदू को उबकाई ही आएगी।
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मुसलमानों, ईसाइयों को पीट पीटकर मार डालने की घटना अब भारत में इतनी आम हो गई है कि उसपर लोगों ने बात करना बंद कर दिया है। इनकी बर्बरता, क्रूरता और अश्लीलता जैसे आपकी अंतड़ियों को मथ डालती है।
प्रेमचंद ने हिंदुओं के आचार-व्यवहार की बीभत्सता को उजागर करने के लिए 3 लेख लिखे। अब कोई हिंदुओं के डर के मारे यह नहीं कह पाता कि ख़ुद को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माननेवाले हिंदू समाज की इन हरकतों को देखकर कोई भी सभ्य व्यक्ति उससे किनारा ही करना चाहेगा।