राहुल गांधी का यह बयान मीडिया में दब गया कि आरएसएस बच्चों को पढ़ने नहीं देना चाहता। जानेमाने विचारक अपूर्वानंद ने आज सत्य हिन्दी पर वक्त-बेवक्त कॉलम में लिखा है- धीरे धीरे सरकारी-गैरसरकारी शिक्षा संस्थान आरएसएस द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिरों के संस्करण बनते जा रहे हैं।
मुज़फ्फर नगर में युवा कांवड़ यात्री और राहुल गांधी
“आर एस एस युवकों को विद्यार्थी नहीं बनने दे रहा है”: राहुल गाँधी के इस बयान को अख़बारों की सुर्ख़ी में होना था। लेकिन प्रायः लोगों ने इसे अनसुना कर दिया लगता है क्योंकि वे इसकी सच्चाई और महत्त्व को ठीक से समझ नहीं पाए।अभी जब यह खबर पढ़ी कि मेरठ और मुज़फ़्फ़रनगर में कांवड़ यात्रा के कारण सारे स्कूल, कॉलेज और मदरसे एक हफ़्ते और दस दिन के लिए बंद कर दिए गए हैं तो राहुल गाँधी की बात याद आ गई। कहा जा सकता है कि कांवड़ियों के चलते यातायात बाधित रहेगा और विद्यार्थियों को स्कूल, कॉलेज तक पहुँचने में दिक़्क़त होगी इसलिए प्रशासन ने यह कदम उठाया है। इस तर्क से तो सारे दफ़्तर और दुकानें भी बंद कर देनी चाहिए थीं। क्या स्कूल, कॉलेज इसलिए बंद किए गए हैं कि प्रशासन विद्यार्थियों और अध्यापकों को कांवड़ यात्रा में भाग लेने को अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित कर रहा है?
इसे कुछ दूर की कौड़ी लाना कहा जा सकता है लेकिन इसका एक आधार तो है ही। अभी 4 साल पहले उत्तर प्रदेश की लखीमपुर खेरी में सावन के हर सोमवार को स्कूल बंद कर दिए गए थे।इतना ही नहीं, अध्यापकों को कहा गया कि वे कांवड़ियों की सेवा करेंगे। हंगामा होने पर कह दिया गया कि यह स्वैच्छिक है। लेकिन उसने उन अध्यापकों की फ़ेहरिस्त भी जारी की जिन्होंने यह सेवा की थी। इसका मतलब साफ़ था कि सेवा में शामिल नहीं होने वाले अध्यापकों के नाम भी नोट कर लिए गए थे।
पिछले सालों में भी मेरठ, बदायूँ, गाज़ियाबाद, मुज़फ़्फ़रनगर, बरेली, हरिद्वार, हापुड़ में कांवड़ यात्रा के दौरान एक हफ़्ते के लिए स्कूल बंद किए गए थे। जुमे की नमाज़ सड़क पर पढ़ने से जिस देश में पहाड़ टूट पड़ता है क्योंकि आधे घंटे के लिए भी यातायात रुकने से देश की प्रगति रुक जाती है, वहाँ कांवड़ियों के चलते हफ़्ते भर तक स्कूल, कॉलेज बंद रहने की खबर पर चूँ तक नहीं होती। ज़ाहिर है, शिक्षा अब समाज की प्राथमिकता सूची में नीचे खिसकती जा रही है।क्या स्कूल और कॉलेज अब शिक्षा के लिए अप्रासंगिक हो गए हैं?
आर एस एस तो स्कूल,कॉलेज बंद करने की माँग नहीं कर रहा है। इसलिए उस पर आरोप लगाना क़ानून के मुताबिक़ ग़लत कहा जाएगा।वैसे ही जैसे बाबरी मस्जिद के ध्वंस या गाँधी की हत्या का आरोप लगाते ही उसके लोग अदालत जाने की धमकी देने लगते हैं। लेकिन क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में आर एस एस की संसदीय पार्टी की ही सरकार है? शासकीय नैतिकता अब संवैधानिक नहीं बल्कि आर एस एस की नैतिकता है? उसी के मुताबिक़ सारे प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं?
राहुल गाँधी इससे गहरी बात कह रहे थे।वे कह रहे थे कि आज प्रायः सारे शिक्षा संस्थानों पर आर एस एस का कब्जा है। आर एस एस द्वारा नियंत्रित इन संस्थानों में विद्यार्थी को अपने धर्म का पालन करने की इजाज़त नहीं। वह धर्म है प्रश्न करने की स्वतंत्रता, अपना विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता और अपने शौक के मुताबिक़ काम करने की आज़ादी। पिछले 12 सालों में धीरे धीरे सारे केंद्रीय विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों, शोध संस्थानों में कुलपति और निदेशक के पदों पर ऐसे लोग बिठा दिए गए जो या तो आर एस एस की विचारधारा में दीक्षित हैं या उसके मुताबिक़ काम करने को प्रस्तुत हैं।
यह अब आम जानकारी है कि पिछले 10 वर्षों में अध्यापकों की बहाली में ख़ास ध्यान रखा गया है कि ‘राष्ट्रवादी’ विचार के लोग ही नियुल्ट हों। जो अपने विद्यार्थी जीवन में आर एस एस के आलोचक रहे हैं, उनमें से अनेक ने प्रयत्नपूर्वक अपना राष्ट्रवादीकरण किया क्योंकि उसके बिना नियुक्ति संभव नहीं थी। ऐसे अध्यापक या तो स्वेच्छा से या बाध्यतावश इस राष्ट्रवाद को कक्षा और परिसर में स्थापित और प्रसारित करते हैं। जो अध्यापक ऐसे नहीं हैं, वे धीरे धीरे चुप होते गए हैं या बहुत सावधानी से कक्षाओं में अपनी बात कहते हैं। राष्ट्रवाद के प्रहरी चारों तरफ़ हैं, कक्षाओं में भी हैं।
‘राष्ट्रवादियों’ की शिकायत के चलते अध्यापक निलंबित हुए हैं, काम से निकाले गए हैं। यहाँ तक कि जिन किताबों से राष्ट्रवादियों को दिक़्क़त है, उनके पुस्तकालय में होने के कारण कॉलेज के प्राचार्य और अध्यापक दंडित किए गए हैं।
कक्षा अब भय का स्थान है। वहाँ स्वतंत्र अकादमिक संवाद अपने जोखिम पर ही किया जा सकता है।यह बात अब दिल्ली विश्वविद्यालय पर ही नहीं, जिंदल या अशोका पर भी लागू होती है। कक्षा को प्रायः पाठ्यक्रम ही संचालित करता है। उस पर कड़ी निगाह रखी जा रही है। पाठ्यक्रम में कोई भी बात या प्रसंग जो हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के लिए असुविधाजनक है, जगह नहीं पा सकता। जाति, जेंडर, समाज में द्वंद्व, विभाजन के आथ्यों और प्रसंगों को सेंसर किया जा रहा है।ऐसे लेखक और विचारक निकाले जा रहे हैं जिन्हें आर एस एस वामपंथी मानता है।
परिसर हमेशा कक्षा और पाठ्यक्रम के अलावा अन्य गतिविधियों के ज़रिए विद्यार्थियों और अध्यापकों को अपनी सर्जनात्मकता और स्वतंत्र मेधा को व्यक्त करने के अवसर देते हैं। पिछले 12-13 सालों से परिसरों में आर एस एस के प्रचारकों या उसके समर्थकों के अलावा शायद ही किसी विदुषी या अध्येता को आमंत्रित किया जाता है। अगर गलती से किसी को बुला लिया गया तो तुरत अनामंत्रित कर दिया जाता है। नतीजा है, विद्यार्थी विचारों की विविधता के अनुभव से वंचित रह जाते हैं। जबकि यह उनका बुनियादी अधिकार है।
धीरे धीरे शिक्षा संस्थान आर एस एस द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिरों के संस्करण बनते जा रहे हैं। शिशु मंदिरों की पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और दिनचर्या के अध्ययनों से मालूम होता है कि वहाँ तरुण मस्तिष्कों का हिंदुत्ववादी अनुकूलन किया जाता है। यही काम आर एस एस की शाखाओं और बौद्धिकों के माध्यम से किया जाता है। अनुकूलन की इस दीर्घ प्रक्रिया के कारण विद्यार्थी स्वंतत्र रूप से सोचने की क्षमता खो बैठते हैं। उनके दिमाग़ पिलपिले हो जाते हैं। उनमें से कुछ को मौक़ा मिलता है कि वे इस जाल से निकल पाएँ। तब उन्हें अहसास होता है कि उनके साथ इतने सालों तक धोखा किया गया था।वे सही मायनों में शिक्षा प्राप्त नहीं कर रहे थे। वे घृणा और अलगाव के हिन्दुत्ववादी विचार में दीक्षित किए जा रहे थे।
आर एस एस के एक स्वयंसेवक से बात हो रही थी। उन्होंने वितृष्णा से कहा कि संघ में सबकी खोपड़ी बंद होती है और ये इससे बहुत डरते हैं कि लोग ख़ुद से सोचने लगें।
जिनकी खोपड़ी बंद होती है, वे खुले दिमागवालों की खोपड़ी डंडे से खोलते हैं।ऐसी बंद खोपड़ियों से नौजवानों का सामना है। उनके हाथ में डंडा है, नौजवानों के पास बुद्धि है। जीत किसकी होगी?