गाजियाबाद में असद का एनकाउंटर करने के बाद घर को गिराने का नोटिस लगाया गया
मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा और घृणा प्रचार में नए सिरे से तेज़ी आई है। हालाँकि यह कभी रुका नहीं था। पिछले 12 सालों में शायद ही कोई वक़्फ़ा रहा हो जिसे मुसलमान विरोधी घृणा और हिंसा से मुक्त कहा जा सके लेकिन बीच-बीच में उसका बवंडर-सा उठता है। पिछले दो हफ़्ते से दिल्ली, उत्तर प्रदेश में खुलेआम मुसलमानों के जनसंहार के नारे लगाते हुए गुंडों के गिरोह घूम रहे हैं। इसे हिंदुओं के जायज़ ग़ुस्से की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानकर प्रशासन ने इस तरफ़ से आँखें मूँद ली हैं। हिंदू यूट्यूबर महामारी की तरह फैल गए हैं और मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे हैं।वे गली-गली घूम रहे हैं, मुसलमानों को जबरन पकड़-पकड़कर उन पर हमला कर रहे हैं। मदरसों को सील किया जा रहा है। मुसलमानों के मकानों को ध्वस्त करने की नोटिस दी जा रही है।
ग़ाज़ियाबाद में एक हिंदू किशोर की एक मुसलमान किशोर द्वारा हत्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा के ताज़ा अभियान का नया बहाना बन गई है। सूर्या नाम के लड़के की हत्या के अभियुक्त असद को पुलिस ने तुरत ही ‘मुठभेड़’ में मार डाला। ‘मुठभेड़ें’ कैसे की जाती हैं और क्यों उनमें पुलिसवालों को खरोंच भी नहीं लगती और अभियुक्त मार डाला जाता है, यह भारत की जनता अच्छी तरह जानती है। इस मामले में भी बतलाया जा रहा है कि असद ने पुलिस पर गोली चलाई जिसके चलते पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी और वह मारा गया।
असम और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने ‘आधी मुठभेड़’ जैसी एक चीज़ की ईजाद की है। पिछले 10 सालों में अलग-अलग मामलों में पकड़े गए अभियुक्तों को पैर में गोली मार कर लंगड़ा कर दिए जाने की सैंकड़ों घटनाएँ हुई हैं।इनके बारे में हमें बतलाया जाता है कि ये पुलिस से भाग रहे थे और इन्हें रोकने के लिए पुलिस को इनके पैर में गोली मारनी पड़ी।
असद भाग्यशाली न था कि उसके साथ आधी मुठभेड़ की जाती। हिंदुओं की, मारे गए सूर्या की माँ और परिवार की माँग थी कि उसका ‘एनकाउंटर’ किया जाए।प्रशासन ने जनभावना का आदर करते हुए असद के साथ पूरा एनकाउंटर किया। वह मारा गया। पुलिस ने इस एनकाउंटर का विस्तृत ब्योरा जारी किया है जिसमें वह बतलाती है कि उसे इस घटना का कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिल पाया। इसलिए हमें इस मुठभेड़ के उसके वर्णन को मान लेना चाहिए।
अब हमारे भीतर इतनी भी न्याय भावना नहीं बची कि हम पूछें कि पुलिस का काम जाँच करना है,दंड या न्याय देना नहीं।हमें यह साहस नहीं बचा कि हम कह सकें कि अभियुक्त आरोप साबित होने तक सिर्फ़ अभियुक्त है। हमारा पतन इस हद तक हो चुका है कि हम मुसलमानों से माँग कर रहे हैं कि वे असद के ‘एनकाउंटर’ की तारीफ़ करें।
क्या असद के एनकाउंटर से कुछ हिंदुओं की मुसलमान रक्त-पिपासा शांत हो गई? नहीं। अब यह माँग की जा रही है कि जिस परिवार में असद पैदा हुआ उसे सज़ा दी जानी चाहिए। उसके भाई और पिता गिरफ़्तार हैं। लेकिन वह काफी नहीं है।असद के घर को ध्वस्त करने की नोटिस दे दी गई है। पूरे परिवार का ‘एनकाउंटर’ अभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकेगा। उसका भी वक्त शायद जल्दी ही आए। लेकिन उसे बर्बाद तो किया ही जा सकता है। उसे बेघरबार किया जा सकता है। उसे तरह-तरह के मुक़दमों में फँसा कर पूरे परिवार की ज़िंदगी तबाह की जा सकती है।
लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं है। हिंदू समुदाय के कुछ लोगों के खून की प्यास नहीं बुझ रही। उस समुदाय को दंडित करने की माँग की जा रही है असद जिसका सदस्य था, यानी मुसलमानों को। वह कैसे होगा? इस इलाक़े के मदरसों को सील कर दिया गया है। आख़िर प्रशासन और हिंदू समाज की निगाह में असद जैसे लोग मदरसों में तैयार किए जाते हैं! लेकिन इससे भी बात नहीं पूरी होती है। हिंदुओं के गिरोह मुसलमान बस्तियों में खुलेआम नारा लगाते घूम रहे हैं कि वे उन्हें ईद नहीं मनाने देंगे। नमाज़ नहीं पढ़ने देंगे।
मुसलमानों के जनसंहार की धमकी देते हुए कुछ हिंदुओं के झुंड गली गली घूम रहे हैं। इसे हिंदुओं के क्रोध की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानकर प्रशासन ने इस घृणा प्रचार को पूरी छूट दे दी है। इनमें हिंदू औरतें मुसलमान औरतों को नंगा करके बलात्कार करने और मुसलमानों की हत्या करने की माँग कर रही हैं। क्या यह स्वाभाविक क्षोभ नहीं है और क्या इसे व्यक्त न होने देना चाहिए?
मुसलमानों को अब सिर्फ़ इस घृणा प्रचार का सामना नहीं करना। इस तरह के यू ट्यूबरों की फ़ौज खड़ी हो गई है जो रिपोर्टिंग के नाम पर मुसलमानों को पकड़ पकड़ कर उनसे भद्दे और भड़काऊ सवाल करते हैं। इन यू ट्यूबरों में अच्छी संख्या लड़कियों की है। वे बहुत आक्रामक और हिंसक तरीक़े से मुसलमानों को जबरन रोकती हैं और उनके मुँह में माइक घुसेड़ देती हैं। लड़की या औरत होने का लाभ उन्हें मिलता है क्योंकि शायद ही कोई उनकी आक्रामकता का मुक़ाबला कर पाता है। उनको रोकने का मतलब औरत की इज़्जत पर हमला हो जाता है।अगर लोग बात न करना चाहें तो वे उनपर हमला बोल देती हैं। मुसलमान उन्हें रोक नहीं पाते। इनके सवाल क्या होते हैं, मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की बारिश समझ लीजिए।
मुसलमान हिंसा और घृणा के इस चौतरफ़ा हमले का सामना कैसे करें? यह सवाल एक तरह से बेकार हो गया है क्योंकि अब उन्होंने यह मान लिया है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक सीमित नहीं है।
मुसलमान विरोधी यू ट्यूबर नौजवान हैं।वे जो कार्यक्रम तैयार करती हैं, वे मुसलमानों के विरुद्ध अश्लील नफ़रत के अलावा और कुछ नहीं। उन्हें यक़ीन है कि इसे मज़ा लेकर देखनेवालों की अच्छी संख्या हिंदुओं में है। इससे उन्हें आमदनी होती है। मुसलमान विरोधी घृणा अब सिर्फ़ राजनीतिक तौर पर नहीं, आर्थिक रूप से भी लाभकारी है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि प्रशासन इसे नहीं रोक रहा। लेकिन रोके कौन? अब ऐसे अफ़सरों, पुलिस अधिकारियों और न्यायाधीशों की संख्या भी बढ़ रही है जो खुलेआम मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते हैं। कोई राजनीतिक दल इसकी आलोचना नहीं कर रहा। वे भी चुप हैं जो मुसलमानों से वोट माँगते हैं। उनमें यह हिम्मत नहीं है कि वे अपने हिंदू वोटरों को कहें कि यह घृणा और हिंसा अस्वीकार्य है।
हिंदुओं की तरफ़ से यह जो घृणा की ग़लाज़त फेंकी जा रही है, क्या मुसलमान बस उससे अपना दामन बचाकर निकल जाएँ? क्या इससे वे बच जाएँगे? अभी जो धमकी है, वह क्या अगले घंटे सच न हो जाएगी? और अभी जो धमकी है,क्या वह अपने आप में हिंसा नहीं है?