प्रोफ़ेसर गणेश देवी चाहते हैं कि मैं एक नोट तैयार करूँ जिसमें बताया जा सके कि पिछले 13 सालों में भारत के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी द्वारा की गई तबाही के बाद वापस उनकी असली शक्ल में वापस लाने को क्या करना होगा। उसके पहले समझना होगा कि यह किस क़िस्म की तबाही है? एक रूपक जो हाल में नेपाल में आई बाढ़ से हुई तबाही का है जिसमें पूरे के पूरे गाँवों के नामोनिशान मिट गए। या, भूकंप से हुई तबाही का। ऐसी तबाही अपने ऊपरी निशान छोड़ जाती है। लेकिन एक तरह की तबाही सूखे की होती है या महामारी की जिसमें इमारतें, गाँव, शहर तो पहले की तरह खड़े रहते हैं, लेकिन उनके भीतर जीवन का स्रोत सूख जाता है। खेतों को फिर से कैसे उपजाऊ बनाएँ, इसकी जुगत लगानी पड़ती है।
यह कहना ज़रूरी होगा कि विश्वविद्यालयों की तबाही का ज़िक्र आज करना इस देश के उन सैंकड़ों विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए बेमानी मालूम होगा जो पिछले कई दशकों से सिर्फ़ नाम को कॉलेज या विश्वविद्यालय रह गए हैं। वहाँ प्रायः अध्यापक नहीं हैं, कक्षाएँ नाम को होती हैं, परीक्षाएँ होती हैं लेकिन उनमें परीक्षा कहना मज़ाक़ होगा। विद्यार्थी डिग्री ले तो लेते हैं लेकिन उन्होंने कक्षाओं की सूरत शायद ही देखी होती है। ऐसे विद्यार्थियों से हमारी मुलाक़ात हुई है जो स्वीकार करते हैं कि स्नातक के तीन सालों में वे एक बार भी कक्षा में नहीं बैठे। कई राज्यों में अध्यापकों को कई महीनों के अंतर पर एकमुश्त तनख़्वाह मिला करती है। सेमेस्टर, आंतरिक मूल्यांकन जैसे शब्द आप सबसे सुनेंगे लेकिन अगर ईमानदारी से आप बात करें तो जान जाएँगे कि शिक्षण नाम मात्र को होता है। कोचिंग संस्थाएँ जलकुंभी की तरह छा गई हैं।
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कुलपतियों की नियुक्ति
यह किसी एक राज्य की कहानी नहीं है। कुलपतियों की नियुक्ति में जाति और पैसा निर्णायक तत्त्व है। अध्यापकों की नियुक्ति के मामले पेचीदा हैं। मसलन, बिहार में, जहाँ कुलपतियों की नियुक्ति में भ्रष्टाचार के क़िस्से आम हैं, पिछले सालों में अध्यापकों की नियुक्ति के बारे में हर किसी का कहना है कि वह ईमानदारी से की गई है और गुणवान अध्येता बिहार आए हैं। लेकिन जैसा पिछले साल मुझे महाराष्ट्र के एक अध्यापक ने कहा कि वहाँ के निजी कॉलेज के अध्यापकों के वेतन से एक हिस्सा कटकर वहाँ चला जाता है जिनकी कृपा से उनकी नियुक्ति हुई है।
राज्यों के अध्यापकों के लिए अकादमिक आज़ादी एक अजनबी शब्द है क्योंकि पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या के निर्माण में उनकी भूमिका नगण्य है। अकादमिक जीवन के किसी पहलू को उनका निर्णय प्रभावित नहीं करता।
हाल में अपने पटना कॉलेज गया और उसकी बदहाली देख कर मन खिन्न हो उठा। घास के मैदान जैसे जंगल में तब्दील हो गए हैं, दरवाज़ों पर मानो सदियों से धूल जमा है, शानदार प्रशासन भवन की काठ की सीढ़ियों पर काँटी से जड़ दी गई दरी फट चुकी है और वह बदरंग हो गई है।
विद्यार्थी कुपोषित जान पड़ रहे थे। वे दो घंटे एक सेमिनार में बैठे रहे, यह मेरे लिए ताज्जुब की बात थी। इससे सिर्फ़ उस प्यास और जीवट का पता चलता है जो नौजवानों में बावजूद उनके साथ की गई सारी क्रूरता के बचा रह जाता है।
यह सब कुछ इतने अरसे से चल रहा है कि अब राज्यों में यह चर्चा का विषय भी नहीं रहा। यह कहना ज़रूरी है कि लंबे वक़्त से हो रही इस बर्बादी के लिए आरएसएस या बीजेपी को ज़िम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। पश्चिम बंगाल का वाम मोर्चा हो, बिहार और बाक़ी जगह कांग्रेस या राष्ट्रीय जनता दल या समाजवादी पार्टी हो या द्रविड़ पार्टियाँ या विभिन्न प्रकार के समाजवादी दल, सबके सर यह अपराध है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी का हाल
इस तबाही से कुछ शिक्षण संस्थान एक हद तक बचे हुए थे। भारत के केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसे संस्थान उनमें गिने जा सकते हैं। राज्य के संस्थानों के मुक़ाबले उनकी आर्थिक दशा बेहतर थी। अध्यापकों की नियुक्ति में वैयक्तिक पक्षपात के क़िस्से कम नहीं हैं, लेकिन काबिल विद्यार्थी यह उम्मीद कर सकते थे कि उन्हें अध्यापन का काम मिल जाएगा। पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या के फ़ैसले संबंधित विभाग और अध्यापक ही लेते थे। प्रवेश परीक्षाओं की प्रक्रिया भी शिक्षण संस्थान के हाथ में थी। आप परिसरों में अलग-अलग तरीक़े की बौद्धिक गतिविधि देख सकते थे, एक-दूसरे से भिन्न विचारों को सुन सकते थे। छात्र राजनीति की जगह भी थी। परिसर का पर्यावरण इस बौद्धिक और राजनीतिक विविधता से निर्मित और समृद्ध होता था।
ये अभिजन शिक्षा संस्थान थे जिन्हें राज्य के शिक्षा संस्थान ईर्ष्या की निगाह से देखते रहे थे। आज भी इन्हें बाहर से देखने पर किसी के लिए भी यह जान पाना मुश्किल होगा कि उनके भीतर किस तरह का ध्वंस चल रहा है या हो चुका है। कक्षाएँ चल रही हैं, परीक्षाएँ हो रही हैं, देर सबेर नतीजे भी निकल जाते हैं। हर साल नया सत्र शुरू होता है और नई विद्यार्थी अलग-अलग विषयों में दाख़िला लेते हैं। उनकी संख्या घट रही हो, अब तक इसका सबूत नहीं। लेकिन एक बार आप इन संस्थानों में समय बिताना शुरू करें तब मालूम होगा कि बाहर से पुख़्ता दिखने वाली इमारत भीतर से खोखली हो चुकी है।
13 सालों में, और इनमें अभी इज़ाफ़ा होगा, बीजेपी और आरएसएस नामक दीमक इसे धीरे-धीरे चाट चुके हैं। अब इनका सदस्य बने रहना शान की नहीं, बल्कि शर्म और लाचारी की बात है। क्योंकि तब एक अध्यापक के तौर पर आपको स्वीकार पड़ेगा कि न तो कक्षा पर, न पाठ्यक्रम पर, न परीक्षाओं पर, शिक्षण के किसी भी पहलू पर आपका कोई अख़्तियार नहीं।
आपको यह क़बूल करना पड़ेगा कि कक्षा में पढ़ाते वक़्त आप ख़ुद पर नज़र रखते हैं, ख़ुद को सेंसर करते हैं ताकि अगर कोई आपको रिकॉर्ड कर रहा हो तो रिकॉर्डिंग आपको जेल न पहुँचा दे या आपकी नौकरी पर न बन आए। इन संस्थानों के इतिहास में अध्यापक इतना भयभीत, दयनीय कभी न था।
विश्वविद्यालयों में नियुक्ति और आरएसएस
कुलपति या कॉलेज के प्राचार्य को, अगर उनमें लेश भर ईमान बचा हो, क़बूल करना पड़ेगा कि अध्यापकों की नियुक्ति उनके अपने विषय में उनकी शैक्षणिक योग्यता के कारण नहीं, बल्कि आरएसएस में उनकी पहुँच और पैसे के बल पर की जा रही है। और भी यही बात कुलपतियों, निदेशकों के बारे में कही जा सकती है। उनकी योग्यता अकादमिक प्रशासन की नहीं, आरएसएस से उनकी क़ुर्बत है। उनकी प्रतिबद्धता संस्थान या विद्यार्थी से नहीं, आरएसएस से है। चापलूसी और उद्धतपन एक साथ उनमें पाए जाते हैं। वे लाए इसलिए गए हैं कि आरएसएस के लोगों की भर्ती की जा सके और आरएसएस का हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार किया जा सके।
किसी भी शिक्षा संस्थान की रीढ़ अध्यापक होते हैं। कुलपति या निदेशक 5 या 10 साल के लिए होंगे, एक अध्यापक का जीवन परिसर में औसतन 30 साल का होगा। अगर उनके मामले में समझौता कर लिया गया तो संस्थान की धीमी मृत्यु निश्चित कर दी गई है।
हाल में बिहार की अपनी यात्रा में मेरी मुलाक़ात एक युवा अध्यापिका से हुई। वे अच्छी शोधकर्ता हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में कुछ साल अस्थायी अध्यापिका रह चुकी हैं। फिर वे यहाँ क्यों? उन्होंने कहा कि न तो उनके पास 40 लाख रुपए थे और न आरएसएस की पैरवी! फिर इंटरव्यू देने का क्या लाभ! यह मैं इतने लोगों से सुन चुका हूँ कि इसे मात्र अफ़वाह मानना कठिन है। फ़ारसी के एक मुसलमान शोधार्थी ने कहा कि मुसलमान अगर अध्यापक होना चाहे तो उसे आरएसएस के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच में शामिल होना होगा। एक मुसलमान महिला ने ख़ुशख़बरी दी कि उनकी नियुक्ति हो गई है और उसी साँस में ख़बर दी कि वे आरएसएस में शामिल हो गई हैं। यह सब किंवदंती मालूम पड़ता है लेकिन नियुक्तियों को देखकर सच मालूम पड़ता है।
क्या इन 13 सालों में नियुक्त सारे अध्यापक आरएसएस के हैं? यह इल्ज़ाम सही नहीं है। हम ऐसे अध्यापकों को जानते हैं जो मनसा आरएसएस के नहीं, आए भले ही उस रास्ते हों। क्या उन्होंने पूरी तरह समझौता कर लिया है या वे नैतिक दुविधा से जूझ रहे हैं? जो हो, इसका एक पक्ष यह है कि बड़े पैमाने पर ऐसे लोग अध्यापक बन गए हैं जो अपने विषय जानते भी नहीं। इसकी क़ीमत आनेवाले 30 सालों तक विद्यार्थी चुकाते रहेंगे।
विश्वविद्यालय का एक काम व्यक्तित्व का निर्माण था। अब वहाँ व्यक्तित्व का विघटन होता है।
विश्वविद्यालयों में आरएसएस का हिंदुत्व
शिक्षण संस्थानों में आरएसएस के हिंदुत्व और भारतीयता के अलावा और किसी विचार की जगह नहीं रह गई है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तो संस्थान के द्वारा संरक्षित है। बाक़ी विद्यार्थी संगठन अपराधी माने जाते हैं। परिसर में एक ही रंग है:भगवा। परिसर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के प्रचार के मंच बन गए हैं।
अगर किसी समय भाजपा का शासन समाप्त हुआ तो इन परिसरों को उनके अपने असली काम, दायित्व की याद दिलाने के लिए क्या करना होगा? वह किनके माध्यम से किया जाएगा? इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जाए? क्या प्रोफ़ेसर देवी ख़ुद इन सवालों से नहीं जूझ रहे जिनके सामने उनकी सयाजीराव यूनिवर्सिटी को बीजेपी और आरएसएस ने तोड़ दिया था?