ईरान के ख़िलाफ़ छेड़ी गई अमेरिका और इसराइल की जंग बेमक़सद नहीं। उसका स्पष्ट उद्देश्य है। वह हासिल हो न हो, यह बात दीगर है। इस पर हम बता करेंगे लेकिन यह तो साफ़ है कि ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमले ने इस दुनिया के सभ्य कहे जाने वालों देशों का असली औपनिवेशिक चरित्र फिर से उजागर कर दिया है। उनकी क्रूरता, बल को ही नैतिकता मानने की उनकी प्रवृत्ति और उनकी कायरता, ईरान पर थोपी गई इस जंग में यह सब कुछ उभर आया है। उनसे बिना पूछे अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला किया। लेकिन अमेरिका और इसराइल को पाबंद करने की जगह उन्होंने इस जंग की हिमायत ही नहीं की, इसे जायज़ ठहराने के लिए अपनी तरफ़ से तर्क देने लगे।
क्या ईरान ने ऐसा कुछ किया था जिससे अमेरिका या यूरोप को इतना ख़तरा पैदा हो गया कि ईरान को रोकने के लिए उस पर हमला करना ज़रूरी हो उठा था? इसका जवाब हम सब जानते हैं। अभी एक साल पहले ईरान पर दोनों मुल्कों ने हमला किया था। 12 दिनों की उस जंग के बाद युद्ध विराम के लिए अमेरिका और इसराइल तैयार हुए। उनका तर्क यह था कि ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता नष्ट कर दी गई है और इस तरह इस युद्ध का मक़सद हासिल कर लिया गया है।
युद्ध विराम भले ही गया हो, इसराइल ने मध्य पूर्व में वृहत्तर इसराइल बनाने का अपना सपना देखना बंद नहीं किया था। ग़ज़ा में भी कहने के लिए युद्ध विराम है, पश्चिमी तट में इसराइल का हमला जारी है। पहले ग़ज़ा पर हमले का तर्क यह था कि हमास ने इसराइल पर हमला करके उसे मजबूर किया है। लेकिन पश्चिमी तट में फ़िलस्तीनियों पर हमले का क्या तर्क हो सकता है?
वास्तव में इसराइल को अपनी हिंसा और क्रूरता के लिए कोई तर्क नहीं चाहिए। यही बात हमें विचित्र लगती है कि उसे अभी भी तर्क देने की ज़रूरत मालूम पड़ती है। इसराइल का कहना है कि उसके पास दैवी अधिकार है कि वह मध्य पूर्व में इसराइल का क्षेत्र विस्तार करे। उसे कोई दुनियावी तर्क नहीं चाहिए। वह एक यहूदी साम्राज्य स्थापित करना चाहता है।
हम चूँकि तर्क की दुनिया के लोग हैं, अचरज में पड़ जाते हैं कि इसराइल जो करे, आख़िर यूरोप की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह इसराइल के इस खुले हिंसक विस्तारवाद का समर्थन करने को बाध्य महसूस करता है? क्यों इसराइल का हर युद्ध यूरोप का अपना युद्ध है?
यूरोप की घटती आर्थिक ताक़त के कारण अमेरिका की बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा नज़र नहीं आता। अगर उनमें थोड़ी भी हिचकिचाहट हो तो ट्रम्प की एक घुड़की पर वे उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं। अमेरिका का मक़सद साफ़ है। पूँजी को अपने साम्राज्य विस्तार के लिए अब ऐसे इलाक़े चाहिए जो पूरी तरह उसके क़ाबू में हों। इसराइल के अख़बार ‘हारेट्ज़’ के एक लेख में जोशुआ लाइफ़र ने लिखा है कि अमेरिका का इरादा मध्य पूर्व को पूँजी के स्वर्ग के तौर पर विकसित करने का है। पूरे मध्य पूर्व को दुबई में बदल देना है। हथियारों के उद्योग, ए आई और वित्तीय पूँजी को ऐसी जगह चाहिए जो जनतंत्र की अस्थिरता से मुक्त हो।
अमेरिका को क्या चाहिए?
अमेरिका का मानना है कि मध्य पूर्व की सबसे अच्छी व्यवस्था है राजशाही। ऐसी राजशाही जो अमेरिका की कठपुतली है। अधिकार विहीन जनता, चंद अमीर शेख़, जिनके पास ऐय्याशी के अलावा कोई काम नहीं, दक्षिण एशिया के स्वरविहीन मज़दूर: इससे बेहतर अमेरिका के लिए और क्या हो सकता है? ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों जिस तरह भारत के राजाओं और नवाबों ने घुटने टेके थे, वैसे ही मध्य पूर्व के शेख़ अमेरिका और उसके लठैत इसराइल के आगे दोजानू हैं। दिग्विजय के इस रास्ते में सिर्फ़ ईरान एक रोड़ा है और उसे चूर करना अमेरिका के लिए अनिवार्य है।
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इसराइल का मक़सद क्या?
दूसरी तरफ़ इसराइल मध्य पूर्व में अधिक से अधिक ज़मीन हड़पना चाहता है। अमेरिका के लिए यह अच्छा ही है। इसलिए यह जंग बेमक़सद नहीं है, लगती भले हो। अमेरिका ईरान तक नहीं रुकेगा। वेनेजुएला में सत्ता पलटने के बाद अब वह क्यूबा को धमकी दे रहा है। उसे हर जगह अपनी फर्माबरदार सरकार चाहिए। ईरान पर हमले को जायज़ ठहराने के लिए ट्रम्प ने कहा था कि यह जंग वहाँ की सरकार को हटाकर जनता को देश सौंप देगी। अब उसका कहना है कि ईरान में नई सरकार बनाने में उसकी भूमिका निर्णायक होगी। नई सरकार बनाने के फ़ैसले में ट्रम्प अपना दखल चाहता है। साफ़ है कि जनतंत्र वग़ैरह की बात तो सिर्फ़ बहाना थी, असल बात है पूरी दुनिया का मालिक बनने का इरादा। पूँजी की भूख नए नए इलाक़े हड़पे बिना शांत कैसे होगी?
इस युद्ध के लिए तर्क खोजे जा रहे हैं। युद्ध के बाद क्या होगा, क्या अमेरिका के पास इसकी कोई योजना है? इस तरह बात करनेवाले यह नहीं पूछते कि युद्ध हो ही क्यों रहा है। क्या हर देश के ख़िलाफ़ इस तरह की जंग छेड़ने का अधिकार उस देश को दे दिया जाए जिसके पास युद्ध के बाद स्थिरता का कोई मॉडल हो? क्या हम नैतिक रूप से ख़ाली हो चुके हैं कि यह सवाल कर रहे हैं?
ताक़त ही तर्क है। इस सिद्धांत को जो घर में मानता है और अपने से कमजोर को दबाने में जिसे मज़ा आता है, वह घर के बाहर अपने से ताक़तवर के आगे झुक कर रहता है। यही जाति व्यवस्था का भी तर्क है। भारत में अल्पसंख्यकों पर रोज़ाना ताक़त आज़माइश करनेवाली भारत की सरकार अमेरिका के आगे नतमस्तक है। उसका सपना इसराइल बनने का है, यानी अमेरिका का लठैत। इसीलिए देश में मुसलमानों और ईसाइयों को अपमानित करनेवाली सरकार अमेरिका के द्वारा की जा रही बेइज़्ज़ती को चुपचाप निगल रही है। चूँकि भारत की हिंदू आबादी में बहुतेरे अब ताक़त के तर्क को ही जायज़ मानते हैं, वे भारत की इस खामोशी को भी उचित ठहरा रहे हैं।
यह एक बार फिर पूरी दुनिया की नैतिकता की परीक्षा का समय है। उस परीक्षा में किसी के शामिल होने की कोई इच्छा नहीं दिखलाई पड़ रही, स्पेन जैसे देश अपवाद हैं।