पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 23 अप्रैल को जिन 152 सीटों पर मतदान होना है उनमें उत्तर बंगाल की 54 सीटें भी शामिल हैं। इनमें से करीब 35 सीटें चाय बागान इलाक़े में हैं। इन बागान मज़दूरों के वोट समय-समय पर निष्ठा बदलते रहे हैं और ये 54 सीटें राज्य में सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाती रही हैं।
कभी वाममोर्चा का गढ़ रहे इस इलाके के वोटरों ने वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया था। उसके बाद वर्ष 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव में इनका झुकाव बीजेपी की ओर हुआ था।
वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने इलाक़े की 54 में से 28 सीटें जीती थीं। वर्ष 2016 में भी इलाके में पार्टी का दबदबा कायम रहा। लेकिन वर्ष 2019 में तस्वीर तेजी से बदली। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इलाके की आठ में से सात लोकसभा सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य के बाकी हिस्सों में बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहने के बावजूद उसने 30 सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम रखा था।
चाय बागानों के 15 लाख से ज्यादा वोटर इलाके की सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यहाँ के प्रमुख मुद्दे कम मज़दूरी, ज़मीन का मालिकाना हक और बंद बागान हैं।

अब उत्तर बंगाल में वाममोर्चा और कांग्रेस तो राजनीतिक हाशिए पर हैं, लेकिन यहाँ तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधे टकराव की जमीन तैयार हो गई है। यही वजह है कि दोनों पार्टी के दिग्गज नेताओं ने इस इलाके पर बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान चलाया है।

श्रमिक वोटरों के नाम हटाए गए- टीएमसी

टीएमसी ने दावा किया है कि हज़ारों आदिवासी श्रमिकों के नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाए गए हैं या उन्हें अन्यायपूर्ण तरीके से विचाराधीन सूची में रखा गया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार की ओर से चाय मजदूरों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ उन्हें इस चुनाव में ज़रूर मिलेगा। तृणमूल नेतृत्व का कहना है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चाय श्रमिकों के लिए 'चा सुंदरी' आवास योजना, भूमि पट्टा और पट्टे की जमीन पर घर बनाने के लिए 'चा सुन्दरी एक्सटेंशन' के तहत 1 लाख 20 हजार रुपये की सहायता प्रदान की है।

बीजेपी का ममता सरकार पर आरोप

वहीं, भाजपा ने राज्य सरकार पर बागानों को खोलने में विफल रहने का आरोप लगाया है। पार्टी ने चाय बागान मजदूरों को स्थायी भूमि पट्टे और बेहतर मजदूरी का वादा किया है और उनके दावों को ‘पहचान की लड़ाई’ बताया है। बीजेपी का आरोप है कि डुआर्स के कई बागान अब भी बंद पड़े हैं और राज्य सरकार उन्हें खोलने में पूरी तरह नाकाम रही है। बीजेपी का मुख्य मुद्दा मजदूरों की 'न्यूनतम मजदूरी' लागू न होना है। पार्टी का दावा है कि मजदूर अब भी भाजपा के साथ हैं और वे राज्य की विफलताओं का जवाब वोट से देंगे।
इलाके की एक खासियत ने इस बार भाजपा को चिंता में डाल दिया है। यहां कुछ साल के अंतर पर वोटरों की निष्ठा बदलती रही है। खासकर जलपाईगुड़ी जिले में बागान मजदूरों और दूसरे तबके की मिली-जुली आबादी अक्सर रोजगार और आधारभूत ढांचे के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के समर्थन का फैसला करती रही हैं।

15 सीटों पर ये निर्णायक स्थिति में

इलाके के राजबंशी और कामतापुरी तबके कम से कम 15 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं। पहचान के सवाल पर इस इलाके में अलग राज्य की मांग में आंदोलन भी होते रहे हैं। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में भाजपा और तृणमूल अपने स्थानीय सहयोग पर निर्भर हैं। तृणमूल कांग्रेस ने जहां भारतीय जनमुक्ति मोर्चा के साथ हाथ मिलाते हुए तीनों सीटें उसके लिए छोड़ दी हैं वहीं बीजेपी ने भी गोरखा मुक्ति मोर्चा के साथ तालमेल किया है।
कभी अलग गोरखालैंड की मांग में सुर्खियां बटोरने वाले दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अब इस आंदोलन की गूंज नहीं सुनाई देती। इस मांग में आंदोलन करने वाली स्थानीय पार्टियां भी कई गुटों में बंट चुकी हैं। उत्तर बंगाल में कम से कम 15 सीटें ऐसी हैं जहां हार-जीत का अंतर बहुत कम होता है। एकाध फीसदी वोट इधर-उधर होने की स्थिति में भी इनके नतीजे बदल सकते हैं।
कुछ नेताओं के दल बदलने से भी चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। बीजेपी के पूर्व राज्यसभा सदस्य अनंत महाराज अब तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं तो तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक अर्घ राय और शाही परिवार के बंशी बदन बर्मन भाजपा में शामिल हो गए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थिति में भाजपा इलाके की इन सीटों पर अपना दबदबा कायम रखने में कामयाब होगी या इस बार तृणमूल कांग्रेस यहां सेंध लगाने में सफल रहेगी। यही सीटें सत्ता का रास्ता तो खोलेगीं ही, यह भी तय करेंगी कि कौन सी पार्टी सत्ता का मीठा स्वाद चखेगी।