ऋतब्रत बनर्जी को LoP बनाने के स्पीकर के फैसले पर कलकत्ता HC ने तब सवाल उठाए जब याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि ऋतब्रत किसी पार्टी में नहीं हैं और उनको पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष यानी LoP बनाए जाने के स्पीकर के फ़ैसले पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं। जस्टिस कृष्णा राव की बेंच ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान पूछा, 'क्या स्पीकर बिना पार्टी की सहमति के किसी बागी विधायक को LoP बना सकता है? वह व्यक्ति किसी पार्टी में नहीं है। उसे पार्टी से निकाल दिया गया है।'
तृणमूल कांग्रेस के कुछ बागी विधायकों ने विधानसभा स्पीकर से ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता और उनके समर्थक एक विधायक को चीफ व्हिप नियुक्त करने की मांग की थी। स्पीकर ने इस समूह को मान्यता दे दी। इस फ़ैसले के ख़िलाफ तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऋतब्रत बनर्जी और उनके समर्थक विधायकों को पहले ही पार्टी से निकाल दिया गया था। इसलिए वे तृणमूल कांग्रेस की ओर से विपक्ष का नेता नहीं बन सकते।
'स्पीकर ने सोभनदेब को LoP नहीं माना'
वरिष्ठ वकील कल्याण बंदोपाध्याय ने याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में दलील दी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, '6 मई को तृणमूल कांग्रेस के चुने हुए विधायकों की बैठक हुई थी, जिसमें सोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने का फ़ैसला किया गया। पार्टी की तरफ से स्पीकर को कई बार यह जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद स्पीकर ने 59 बागी विधायकों वाले बागी ग्रुप को मान्यता दे दी।'
कल्याण बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन कानून) में राजनीतिक पार्टी का फ़ैसला सबसे ऊपर होता है, न कि सिर्फ विधानसभा पार्टी का। उन्होंने कोर्ट से अपील की कि स्पीकर के इस फ़ैसले पर तुरंत रोक लगाई जाए क्योंकि 18 जून को विधानसभा की बैठक होने वाली है।
कोर्ट का रुख क्या?
जस्टिस कृष्णा राव ने स्पीकर के फ़ैसले पर कई बार सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या स्पीकर ने LoP की आधिकारिक मान्यता का कोई लिखित आदेश जारी किया है? कोर्ट ने कहा कि बिना उस आदेश को देखे आगे कोई फ़ैसला नहीं लिया जा सकता है।
टीएमसी के याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने फ़िलहाल कोई रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि स्पीकर का पूरा आदेश और संबंधित दस्तावेज कोर्ट में पेश किए जाएँ। अगली सुनवाई 16 जून को होगी।
राज्य सरकार की दलील क्या?
अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने कोर्ट में कहा कि याचिका अधूरी है और स्पीकर के फ़ैसले को रद्द करने की साफ़ मांग नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि राज्य सभी दस्तावेज कोर्ट में जमा करेगा और याचिका की मेनटेनेबिलिटी यानी कानूनी वैधता पर भी आपत्ति उठाएगा।
यह पूरा विवाद तृणमूल कांग्रेस के दो विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के कथित फर्जी हस्ताक्षरों से जुड़ा है। इन दोनों विधायकों को बाद में पार्टी से निकाल दिया गया था। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का आरोप है कि उन्होंने पार्टी के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, बल्कि उनके हस्ताक्षर फर्जी बनाए गए। बाद में दोनों को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद वे बागी होकर स्पीकर के पास गए और LoP की मान्यता मांगी। टीएमसी में बगावत
बागी होकर ऋतब्रत बनर्जी ने अपने साथ 60 विधायकों के होने का दावा किया। रिपोर्टों में कहा गया है कि उन्होंने 59 विधायकों के हस्ताक्षर सौंपकर नेता प्रतिपक्ष पद पर दावा किया और स्पीकर ने दावे को मान भी लिया। विधायकों की बगावत के बाद सांसदों ने भी बगावत का रास्ता चुना। जब ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन की बैठक में व्यस्त थीं तो टीएमसी के कई बागी सांसद दिल्ली में ही बीजेपी मंत्री के घर पहुँचे हुए थे। बाद में बगावत में शामिल सांसद शर्मिला सरकार ने दावा किया कि पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर घोषणा कर दी है कि वे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी से अलग होकर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होना चाहते हैं। हालाँकि, टीएमसी ने कहा कि बागियों के साथ 20 सांसद नहीं हैं। रिपोर्ट आ रही है कि 19 सांसद बागी खेमे में हैं।
बहरहाल, कलकत्ता कोर्ट का यह सवाल बेहद अहम है क्योंकि अगर निकाले गए विधायकों को पार्टी की अनुमति के बिना LoP बनाया जा सकता है, तो एंटी-डिफेक्शन क़ानून कमजोर हो जाएगा। अब 16 जून को कोर्ट में स्पीकर के दस्तावेज पेश होने के बाद आगे का फैसला आएगा। फ़ैसला आने के बाद बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है।