संविधान के प्रति निष्ठा रखने और बिना भेदभाव के न्याय करने की शपथ लेने वाले सीएम जैसे संवैधानिक पद पर बैठे बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अब 'गेरुआ सम्मान यात्रा' निकाल संदेश दिया कि भगवा लहर अब जादवपुर यूनिवर्सिटी के के दरवाज़ों तक पहुँचने के लिए तैयार है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर जादवपुर विश्वविद्यालय चर्चा के केंद्र में तब आ गया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने यूनिवर्सिटी के पास 'गेरुआ सम्मान यात्रा' का नेतृत्व किया। यह यात्रा गोलपार्क से शुरू होकर जादवपुर विश्वविद्यालय के 8बी बस स्टैंड तक पहुंची। इस दौरान बड़ी संख्या में बीजेपी समर्थक, साधु-संत और हिंदुत्व समर्थक संगठन शामिल हुए। शुभेंदु अधिकारी भी गेरुवा कपड़े में यात्रा का नेतृत्व करते नज़र आए। इस यात्रा के ज़रिए उन्होंने संदेश दिया कि भगवा लहर अब इस शिक्षण संस्थान के दरवाज़ों तक पहुँचने के लिए तैयार है।
जादवपुर में 8B बस स्टैंड पर यात्रा के आखिरी पड़ाव पर पहुँचने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कहा, 'सनातन संस्कृति के आह्वान पर हम देश के भीतर उन लोगों को सबक सिखाने के लिए वापस आएँगे जो भगवा और देश का अपमान कर रहे हैं। हम गीता पाठ और हनुमान चालीसा के साथ दो बार वापस आएँगे।' मुख्यमंत्री ने यूनिवर्सिटी परिसर में 'राष्ट्रवाद को फिर से बहाल करने' का भी संकल्प लिया। मुख्यमंत्री ने जादवपुर यूनिवर्सिटी में टीचिंग फैकल्टी के ट्रांसफर की भी बात कही, जिसके लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा में एक बिल पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा, "'कश्मीर की आज़ादी, फ़िलिस्तीन की आज़ादी, किशनजी को लाल सलाम...', ऐसा अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री जानते हैं कि माहौल को कैसे साफ़-सुथरा किया जाए।"
क्या है 'गेरुआ सम्मान यात्रा'?
बीजेपी के अनुसार इस यात्रा का उद्देश्य भगवा रंग की गरिमा, सनातन संस्कृति और राष्ट्रवाद के संदेश को लोगों तक पहुंचाना था। यात्रा में शामिल लोग 'जय श्रीराम' और 'वंदे मातरम्' के नारे लगा रहे थे। बड़ी संख्या में भगवा वस्त्र पहने साधु-संत और समर्थक भी रैली में शामिल हुए। करीब तीन किलोमीटर लंबी यह यात्रा गोलपार्क से निकलकर जादवपुर विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार के पास ख़त्म हुई।
यात्रा ख़त्म होने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में ऐसे लोग मौजूद हैं जो 'कश्मीर मांगे आजादी', 'फ्री फिलिस्तीन' और 'रेड सल्यूट' जैसे नारे लगाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियों को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और राज्य सरकार विश्वविद्यालय के माहौल को बदलने के लिए कदम उठाएगी।
शुभेंदु अधिकारी ने यह भी कहा कि सनातन संस्कृति का अपमान करने वालों को जवाब दिया जाएगा और भविष्य में फिर से गीता पाठ तथा हनुमान चालीसा के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
शिक्षकों के तबादले का भी किया जिक्र
मुख्यमंत्री ने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय के शिक्षकों के तबादले से जुड़ा एक विधेयक विधानसभा में पेश किया जाएगा। उनके इस बयान को विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।विश्वविद्यालय के बाहर लगे नारे
यात्रा जब जादवपुर विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार तक पहुंची तो उस समय विश्वविद्यालय का गेट बंद था। रैली में शामिल लोगों ने गेट के बाहर 'जय श्रीराम' और 'वंदे मातरम्' के नारे लगाए। द वीक की रिपोर्ट के अनुसार एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि विश्वविद्यालय के भीतर कुछ 'दिमागी नक्सल' मौजूद हैं, जो देश विरोधी विचार रखते हैं। उनका कहना था कि अब राष्ट्रवादी सरकार ऐसे विचारों को विश्वविद्यालय परिसर में नहीं चलने देगी। एक अन्य समर्थक ने कहा कि यह यात्रा भगवा के सम्मान के लिए निकाली गई है और अब हर जगह भगवा का सम्मान सुनिश्चित किया जाएगा।
यात्रा के बाद मुख्यमंत्री के बयानों ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने वाला व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है। पूर्व सिविल सर्वेंट आशीष जोशी ने एक्स पर लिखा है, "संवैधानिक नैतिकता की जगह व्यक्तिगत मान्यताओं को नहीं दिया जा सकता है। एक चुना हुआ मुख्यमंत्री धर्म से परे हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करता है। कार्यकारी पद को खुले तौर पर धर्म से जोड़ना मज़बूती नहीं दिखाता, बल्कि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के लिए साफ़ तौर पर पीछे की ओर कदम है।'विश्वविद्यालय परिसर में नहीं हुआ विरोध
इस बार रैली के दौरान विश्वविद्यालय परिसर के अंदर स्थिति शांत रही। वामपंथी छात्र संगठनों ने इस बार कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नहीं किया। हालांकि, छात्र संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालय में विचारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।पहले भी हो चुका है विवाद
जादवपुर विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। कुछ सप्ताह पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी विश्वविद्यालय के बाहर और परिसर के आसपास रैली निकाली थी। उस दौरान एबीवीपी और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच झड़प हुई थी। दोनों पक्षों के बीच बोतलें और जूते फेंके जाने की घटनाएं भी सामने आई थीं। एबीवीपी पर विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर बने प्रतीक चिह्न को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगा था।
जादवपुर विश्वविद्यालय विवाद का केंद्र!
जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से वामपंथी छात्र राजनीति का मजबूत केंद्र माना जाता रहा है। ऐसे में बीजेपी लगातार यहां अपनी राजनीतिक और वैचारिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी विश्वविद्यालय के बाहर आयोजित उस कार्यक्रम में भी शामिल हुए थे, जिसमें हजारों लोगों ने मिलकर 'वंदे मातरम्' का पूर्ण संस्करण गाया था। अब 'गेरुआ सम्मान यात्रा' को भी बीजेपी के इसी व्यापक अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की इस यात्रा और बयानों के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि संविधान के अनुसार सरकार को सभी नागरिकों और शैक्षणिक संस्थानों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए और किसी विशेष धार्मिक या वैचारिक पहचान को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। वहीं बीजेपी का कहना है कि यह यात्रा किसी संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, भगवा रंग और राष्ट्रवादी मूल्यों के सम्मान के लिए आयोजित की गई थी। जादवपुर विश्वविद्यालय पहले से ही वैचारिक टकराव का केंद्र रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और छात्र संगठनों के बीच बहस और तेज होने की संभावना है।