बंगाल विधानसभा में बगावत के बाद अब संसद में भी ममता बनर्जी को सांसदों से बड़ा झटका लग सकता है। टीएमसी के लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। इससे पहले, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले 60 विधायकों ने खुद को 'असली तृणमूल' बताया था।
विधानसभा में क़रीब 60 विधायकों से झटका लगने का ममता बनर्जी का घाव भरा भी नहीं है कि अब क़रीब 20 सांसदों के बीजेपी के संपर्क में होने की रिपोर्ट आ रही है। तृणमूल कांग्रेस के कुल 41 सांसद हैं जिनमें लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। लेकिन, कोलकाता में ममता बनर्जी के प्रदर्शन में गिने-चुने क़रीब छह सांसद ही पहुँचे थे। विधायक भी क़रीब इतनी ही संख्या में पहुँचे थे। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने खुद को 'असली तृणमूल' बता दिया है और उन्होंने विधानसभा में अपना विपक्षा का नेता बना लिया है। तो क्या अब विधायकों के बाद सांसदों से भी ममता को बड़ा झटका लगने वाला है?
कम से कम मीडिया रिपोर्टों में तो सूत्रों के हवाले से यही कहा जा रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में चल रही बगावत अब संसद तक पहुंचने वाली है। एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि टीएमसी के कम से कम 20 सांसद बीजेपी के साथ संपर्क में हैं और पार्टी बदलने की तैयारी कर रहे हैं। सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ये चर्चाएं सबसे ऊपरी स्तर पर चल रही हैं। सांसदों ने अपनी तरफ से निष्ठा बदलने में रुचि जताई है।
बंगाल में ऑपरेशन लोटस?
लोकसभा और राज्यसभा में कुल मिलाकर टीएमसी के 41 सांसद हैं। यदि लोकसभा के ये 20 सांसद भी बीजेपी में चले गए तो ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगेगा। वैसे कहा जा रहा है कि विधायकों की बगावत से बीजेपी को कुछ फायदा नहीं होना वाला है और उसका असली मक़सद सांसदों को तोड़ना ही है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि बीजेपी को लोकसभा में बहुमत नहीं है और वह चाहेगी कि संसद में वह मज़बूत हो।
लोकसभा में दो-तिहाई यानी करीब 20 सांसद टूट जाएँ तो यह बीजेपी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। बीजेपी के पास फिलहाल 240 सांसद हैं, बहुमत के लिए 272 चाहिए। टीएमसी के 20 सांसद जुड़ने से बीजेपी बहुमत के करीब पहुंच जाएगी और एनडीए सहयोगियों पर निर्भरता कम हो जाएगी। टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार पहले ही पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे चुकी हैं और नाराजगी जता रही हैं। राज्यसभा के 245 सदस्यों में बीजेपी के 113 सांसद हैं, बहुमत के लिए 123 चाहिए। आप के 7 सांसदों के दल-बदल से बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ाई है, लेकिन अभी भी बहुमत से दूर है। दोनों सदनों में बीजेपी को बहुमत नहीं होने से मनचाहे विधेयकों को पारित कराने में दिक्कतें आती हैं।
हाल ही में लोकसभा सीटें 850 करने वाला और डिलेमिटेशन से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सका था, जिससे बीजेपी का 2029 चुनाव का प्लान प्रभावित हुआ।
विधानसभा में पहले ही टूट चुकी है पार्टी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हारने के बाद ही टीएमसी में बगावत शुरू हो गई थी। अब पार्टी आधे-आधे में बंट चुकी है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों के एक गुट ने खुद को 'असली तृणमूल' बताया है। इस गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित किया और विधानसभा स्पीकर ने भी इसे मंजूरी दे दी है। ये गुट खुलकर ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है।टीएमसी में बगावत के बड़े कारण
हाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को भारी बहुमत मिलने से टीएमसी की 15 साल की सत्ता चली गई। इस हार के बाद पार्टी में असंतोष फूट पड़ा। कई नेता हार की जिम्मेदारी नेतृत्व पर डाल रहे हैं।
- अभिषेक बनर्जी के खिलाफ गुस्सा: ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर पार्टी को 'फैमिली सेंट्रिक' और 'I-PAC के जरिए चलाने' का आरोप है। कई विधायक मानते हैं कि सत्ता अभिषेक और उनके करीबियों के हाथ में केंद्रित हो गई थी, जिससे पुराने नेताओं को किनारे किया गया।
- फर्जी सिग्नेचर विवाद: विधायक दल के नेता नियुक्ति के लिए दाखिल पत्र में कई विधायकों के हस्ताक्षर जाली बताए गए। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने शिकायत की, जिसके बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया। यह विवाद बगावत की चिंगारी बना।
- अंदरूनी कलह और सत्ता का संघर्ष: ऋतब्रत बनर्जी जैसे नए चेहरे ने क़रीब 58-60 विधायकों का समर्थन जुटाकर खुद को विपक्ष का नेता घोषित करा लिया। विधानसभा स्पीकर ने इसे मान्यता भी दी। कई मेयरों के इस्तीफे और सांसदों में भी नाराजगी है।
कई नेता अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बुलाए बैठक में शामिल हो रहे हैं। साफ़ है कि मौजूदा बगावत चुनावी हार, अभिषेक-केंद्रित नेतृत्व और फर्जी हस्ताक्षर विवाद से उपजी है। ममता इसे बीजेपी की साजिश बता रही हैं, लेकिन अंदरूनी असंतोष साफ दिख रहा है। पार्टी में फूट की आशंका बढ़ गई है।
सांसदों के लिए ऑपरेशन लोटस?
रिपोर्ट में पार्टी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि आने वाले दिनों में लोकसभा और राज्यसभा में और भी सांसद टूट सकते हैं। इससे अलग हुए गुट की ताकत और बढ़ेगी। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी अब पूरा ध्यान पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह बचाने पर लगा रही हैं। महाराष्ट्र के उदाहरण को देखते हुए यह काम आसान नहीं लग रहा है।
ममता पर भारी दबाव
फिरहाद हकीम जैसे बड़े नेता के इस्तीफे, विधानसभा में विपक्ष के नेता का पद गंवाने और पार्टी संरचना के तेजी से ढहने से ममता बनर्जी काफी दबाव में हैं। वे अपनी पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की जद्दोजहद में लगी हुई हैं। यह घटनाक्रम विपक्षी दलों के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि संसद में टीएमसी विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। यदि टीएमसी टूटती है तो पूरे विपक्ष की ताक़त कमजोर पड़ जाएगी।
ममता बनर्जी और उनकी टीम इस संकट से निपटने के लिए रणनीति बना रही है। दूसरी तरफ़, बागी गुट और बीजेपी दोनों सक्रिय नज़र आ रहे हैं। क्या TMC में और बड़े टूट की आशंका है? या ममता बनर्जी इस संकट को संभाल लेंगी? यह आने वाले दिनों में साफ होगा।