loader

बीजेपी के हिंदू बनाम तृणमूल के बांग्ला राष्ट्रवाद में जंग

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी जहां ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए राज्य के करीब साढ़े पांच करोड़ हिंदू वोटरों को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है, वहीं ममता के पास इसकी काट के लिए बांग्ला राष्ट्रवाद ही प्रमुख हथियार है। यही वजह है कि ममता अक्सर बंगाली अस्मिता और पहचान का मुद्दा उठाती रही हैं। 
प्रभाकर मणि तिवारी

पश्चिम बंगाल देश के उन चुनिंदा राज्यों में शुमार है, जहां बंगाली अस्मिता, संस्कृति, परंपराओं और नायकों का पुरजोर समर्थन और सम्मान किया जाता रहा है। यहां सियासी दल भी शुरू से ही इस मुद्दे को भुनाते रहे हैं। बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड या हिंदू राष्ट्रवाद के मुकाबले के लिए मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इस बांग्ला राष्ट्रवाद को ही अपना हथियार बनाने का फ़ैसला किया है। लेकिन इसके साथ ही सवाल उठ रहा है कि उनका यह फ़ैसला कितना कारगर होगा।

राज्य में बीजेपी के उदय के साथ ही ममता ने बांग्ला राष्ट्रवाद का कार्ड खेलना शुरू कर दिया था। खासकर साल 2018 के पंचायत चुनावों और उसके बाद बीते लोकसभा चुनावों में भगवा पार्टी को मिली कामयाबी के बाद उन्होंने इसे तुरुप का पत्ता बना लिया है।
यही वजह है कि ममता अक्सर बंगाली अस्मिता और पहचान का मुद्दा उठाती रही हैं। वैसे, यह बात बीजेपी भी अच्छी तरह समझ रही है कि बंगाल के लोगों में अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और नायकों के प्रति गहरा भावनात्मक लगाव है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह और जे.पी. नड्डा समेत तमाम बड़े बीजेपी नेता राज्य के दौरे पर अपने भाषणों में चैतन्य प्रभु, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का जिक्र करना नहीं भूलते।
ताज़ा ख़बरें

पश्चिम बंगाल में अपने नायकों का सम्मान करने और उन पर गर्व करने की परंपरा आजादी से भी पहले से चल रही है। बंगाल के विभाजन से पहले वह चाहे विद्रोही कवि नजरुल हों, नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर, समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर या फिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस, इन सबको जितना सम्मान मिलता रहा है, वह दूसरे राज्यों में वहां के नायकों के लिए कम ही देखने को मिलता है। 

नायकों को पूजने की परंपरा 

अपने नायक तलाशने और उनको सम्मानित करने की इसी परंपरा के तहत दुनिया के किसी भी देश में बसा कोई बंगाली मूल का व्यक्ति अगर अहम उपलब्धि हासिल करता है तो मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों में उसे अपना बताते हुए हीरो बनाने की होड़ मच जाती है। यह बात दीगर है कि वह व्यक्ति कभी बंगाल नहीं आया हो या दशकों पहले विदेश में बस गया हो। उस पर अखबारों के पन्ने रंगे जाते हैं और कई दिनों तक टीवी कवरेज चलती है। 

tmc vs bjp in west bengal election 2021 - Satya Hindi
नायकों को लगभग पूजने की इस परंपरा में अमर्त्य सेन से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी समेत कई लोगों के नाम गिनाए जा सकते हैं। इस मामले में सबसे ताजा मिसाल बांग्ला अभिनेता सौमित्र चटर्जी की है। उनके निधन पर स्थानीय अखबारों और चैनलों में जैसी व्यापक कवरेज हुई देश में उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती।
आगामी विधानसभा चुनाव टीएमसी और उसे जोरदार मुक़ाबला दे रही बीजेपी- दोनों के लिए बेहद अहम है। टीएमसी चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने के बावजूद अंदरुनी कलह और गुटबाजी से जूझ रही है।

बीजेपी को ‘बाहरी’ बताती हैं ममता

ममता यह बात अच्छी तरह जानती हैं कि वे पैसों और कार्यकर्ताओं के मामले में बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर सकतीं। इसलिए वह बांग्ला राष्ट्रवाद को ही अपना प्रमुख हथियार बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। वैसे, वे पहले से ही अपने बयानों में इसका संकेत देती रही हैं। वे कई बार कह चुकी हैं कि बंगाल में बंगाली ही राज करेगा, गुजराती नहीं। अपने भाषणों में ममता बीजेपी को ‘बाहरी’ कहती रही हैं। 

विद्यासागर की प्रतिमा में तोड़फोड़

बीते साल लोकसभा चुनावों के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रोड शो के दौरान ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने के बाद भी उन्होंने इस बांग्ला राष्ट्रवाद को खूब भुनाया था। आखिरी दौर के मतदान से पहले हुई इस घटना को बांग्ला राष्ट्रवाद से जोड़ने का ही नतीजा था कि उस दौर में बीजेपी का खाता तक नहीं खुल सका। महीने भर के भीतर ही ममता ने वहीं पर दोबारा विद्यासागर की प्रतिमा स्थापित की थी।

tmc vs bjp in west bengal election 2021 - Satya Hindi

नेताजी की मौत का मुद्दा 

बंगाल में जन्मे महापुरुषों का बंगाली समाज पर गहरा असर साफ नजर आता है। मिसाल के तौर पर कोई भी कार्यक्रम कविगुरू रवींद्रनाथ के गीतों के बिना शुरू ही नहीं होता। नेताजी के मुद्दे को भी टीएमसी शुरू से ही भुनाती रही है। अब भी ज्यादातर बंगाली मानते हैं कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई थी। खासकर चुनावों के मौके पर नेताजी की मौत का मुद्दा उछलने लगता है।

ममता सरकार बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा का मुद्दा बार-बार उठा कर बांग्ला राष्ट्रवाद की इसी भावना को सींचती रहती है।

वामपंथियों से आगे निकलीं ममता 

वैसे, मूर्ति पूजा से दूर रहने वाले वामपंथी भी अपने नायकों को महान बताते हुए बांग्ला राष्ट्रवाद की इस भावना को भुनाने में पीछे नहीं रहे हैं। इन तमाम नायकों को हमेशा सम्मान मिलता रहा है, भले ही राज्य में किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो। स्कूली पाठ्यक्रमों में इनकी जीवनी भी अनिवार्य है। लेकिन ममता ने बांग्ला राष्ट्रवाद को भुनाने के मामले में वामपंथियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। 

tmc vs bjp in west bengal election 2021 - Satya Hindi
वे सत्ता में आने के बाद से ही हमेशा बांग्ला भाषा और संस्कृति की बात कहती रही हैं। भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रति उनका लगाव टीएमसी सरकार के मां, माटी और मानुष नारे में भी झलकता है। पहले वे पार्टी की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए जिस बांग्ला राष्ट्रवाद का इस्तेमाल करती थीं, अब उसे ही बीजेपी के खिलाफ प्रमुख हथियार बना रही हैं।

बीते साल एक चुनावी रैली में रवींद्रनाथ का जन्मस्थान बताने में अमित शाह की ग़लती को टीएमसी ने फौरन लपक लिया था। तब उसने आरोप लगाया था कि बीजेपी को बंगाल के बारे में कोई जानकारी नहीं है और यह बंगालियों का अपमान है। टीएमसी ने चुनाव अभियान के दौरान एक गीत भी बजाया था जिसमें पहली बार वोट डालने वाले युवाओं से पूछा गया था कि वे बंगाल के पक्ष में वोट डालेंगे या उसके ख़िलाफ़।

बीते साल ममता ने उत्तर 24-परगना जिले के बैरकपुर में अपनी एक रैली में कहा था कि बंगाल में रहना है तो बांग्ला भाषा सीखनी ही होगी। उनका कहना था कि लोग हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भी बोल सकते हैं। लेकिन उनको बांग्ला बोलना भी सीखना होगा।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की आबादी में 15 फीसदी गैर-बंगाली हैं। लेकिन सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अब यह आंकड़ा बीस फीसदी तक पहुंच गया है। ममता ने बीते दिनों इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में बांग्ला मीडियम को शामिल नहीं करने के लिए भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया था।

पश्चिम बंगाल से और ख़बरें

बीजपी की नज़र हिंदू वोटों पर 

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी जहां ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए राज्य के करीब साढ़े पांच करोड़ हिंदू वोटरों को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है, वहीं ममता के पास इसकी काट के लिए बांग्ला राष्ट्रवाद ही प्रमुख हथियार है। 

राजनीतिक पर्यवेक्षक कुशल कुमार जाना कहते हैं, “इस बार विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होंगे। हालांकि इन चुनावों में कई दूसरे मुद्दे भी अहम होंगे। लेकिन असली लड़ाई बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद और ममता के बांग्ला राष्ट्रवाद के बीच ही है। अब यह तो समय बताएगा कि कौन-सा राष्ट्रवाद किस पर भारी पड़ता है।”

सत्य हिन्दी ऐप डाउनलोड करें

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए


गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
प्रभाकर मणि तिवारी
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

पश्चिम बंगाल से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें