पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान में अब महज दस दिनों का समय बचा है। सत्ता के दावेदारों यानी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी ने तो बड़े पैमाने पर अपना प्रचार शुरू कर दिया है। लेकिन इस बार वोटरों की चुप्पी ने इन दोनों को बेचैन कर दिया है। उनको यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस बार ऊंट आखिर किस करवट बैठेगा।
फिलहाल, एसआईआर के दौरान कटे नाम ही राज्य में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गए हैं। बंगाल के वोटरों को राजनीतिक रूप से काफी जागरूक माना जाता है। यहां नुक्कड़ से लेकर चौराहों और मोहल्ले की चाय-पान की दुकानों पर महीनों पहले से चुनावी राजनीति पर बहस होती रही है। लेकिन इस बार तस्वीर अलग है।
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विश्लेषकों का कहना है कि इस चुनाव पर ईरान युद्ध की छाया भी नजर आ रही है। पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव ने राष्ट्रीय स्तर पर जितनी सुर्खियां बटोरी थी। इस बार इसकी वैसी चर्चा नहीं हो रही है। उनके मुताबिक, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के अलावा कोई नया मुद्दा नहीं होने के कारण वोटरों में खास उत्साह नहीं नजर आ रहा। इसके साथ ही एसआईआर में कटे नामों ने भी उनको हताश कर दिया है। ऐसे लाखों मामले हैं जहां परिवार के चार में तीन सदस्यों के नाम मतदाता सूची में हैं लेकिन एक का नहीं। इससे लोगों में असंतोष है।
वोटरों की यह नाराजगी और असंतोष किसे भारी पड़ेगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। फिलहाल सत्ता के दावेदार अपने-अपने समीकरण बनाने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार शनिवार को उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में रात गुजारी और वहां रैलियों को संबोधित करने के अलावा लंबा रोड शो किया। इस दौरान वो करीब सौ मीटर पैदल भी चले। इससे पता चलता है कि पार्टी इस बार बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए कितनी बेचैन है।

उत्तर बंगाल को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ही इलाके में लगातार बेहतर प्रदर्शन करती रही है। लेकिन इस बार असम से सटे कुछ इलाकों में भारी गुटबाजी के कारण उसकी स्थिति कुछ कमजोर हुई है।

शायद यही वजह है कि अपने इस गढ़ को बचाने के लिए प्रधानमंत्री और अमित शाह समेत पार्टी के कई नेता वहां बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। पहले चरण में जिन इलाकों में मतदान होना है उनमें उत्तर बंगाल की सीटें भी शामिल हैं।

ममता का बीजेपी के संकल्प पत्र पर हमला

दूसरी ओर, ममता बनर्जी भी जानती हैं कि तृणमूल कांग्रेस वहां कमजोर है। इसी वजह से उन्होंने अपने चुनाव अभियान ही उत्तर बंगाल से शुरू किया है। वो अब तक एक दर्जन से ज्यादा चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुकी हैं। अपने तमाम भाषण में वो भाजपा के संकल्प पत्र में किए गए वादों को हवा-हवाई बताते हुए कहती रही हैं कि चुनाव बाद कोई भी नेता बंगाल में नजर नहीं आएगा।
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इस बार तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए बीजेपी ने ममता बनर्जी का ही फॉर्मूला अपनाया है। इसके तहत राज्य सरकार की लक्ष्मी भंडार और युवा साथी जैसी कामयाब योजनाओं की नकल करते हुए पार्टी ने कम से कम चार ऐसी योजनाएँ शुरू करने का वादा किया है जिनके तहत लाभार्थियों के बैंक खाते में हर महीने पैसे भेजे जाएंगे। लक्ष्मी भंडार और युवा साथी जैसी योजनाओं के तहत हर महीने तीन-तीन हजार रुपए मिलेंगे।

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी किसी दौर में विपक्षी दलों की ऐसी योजनाओं की तुलना रेवड़ियां बांटने से करते रहे हैं। लेकिन अब भाजपा भी उसी राह पर बढ़ रही है। ममता बनर्जी अपनी हर रैली में लोगों से कहती हैं कि राज्य की तमाम सीटों पर वही (ममता) ही उम्मीदवार हैं। यही सोच कर वोट डालें। अब प्रधानमंत्री मोदी भी अपनी रैली में यही अपील कर रहे हैं। लेकिन आखिर आम लोग इस बार इतने चुप क्यों हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में अब पारंपरिक मुद्दे वोटरों को प्रभावित नहीं करते। रोजमर्रा के जीवन में महंगाई, रसोई गैस की किल्लत और एसआईआर के दौरान कटे नाम ही उनके लिए ज्यादा अहम हैं।
तृणमूल कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राज्य के वोटरों में भाजपा और केंद्र सरकार के प्रति भारी नाराजगी है। इसलिए वो चुप्पी साधे बैठे हैं। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को पहले से ज्यादा सीटें मिलेंगी।
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दूसरी ओर, भाजपा नेताओं का दावा है कि लोग तृणमूल कांग्रेस के कुशासन से आजिज आ गए हैं और उन्होंने इस बार बदलाव का मन बना लिया है। पार्टी इस बार यहां अकेले अपने बूते बहुमत हासिल करेगी।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे कैसे देखते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव से पहले हर पार्टी बढ़-चढ़ कर दावे तो करती ही है। लेकिन चुनाव बाद लोग भी उसे भूल जाते हैं और संबंधित राजनीति पार्टी भी। इसलिए राज्य के लोग चुनावी वादों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।