चुनाव आयोग के मनमाने आदेशों के खिलाफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और आयोग के बीच तनाव बढ़ गया है। विधानसभा चुनावों से पहले विरोध प्रदर्शन, धरने और अदालती मामले तेज हो गए हैं।
सीईसी ज्ञानेश कुमार और सीएम ममता बनर्जी।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और शीर्ष अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादले के मुद्दे पर राज्य सरकार और चुनाव आयोग की बीच टकराव लगातार तेज हो रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एसआईआर के मुद्दे पर तो पहले से ही आयोग पर आक्रामक थी. उन्होंने इस मुद्दे पर आयोग को अब तक नौ पत्र लिखे हैं. इसके अलावा वो कई बार सड़कों पर उतर चुकी हैं और पांच दिनों तक धर्मतल्ला इलाके में धरना भी दे चुकी हैं.
लेकिन चुनाव की तारीखों के एलान के बाद रातों-रात बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले के बाद ममता ने आयोग पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. इस बारे में आयोग के अधिकारियों पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है. इस पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की उम्मीद है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के बंगाल दौरे पर आने पर तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने जगह-जगह काले झंडे दिखाए और नारेबाजी की. उन लोगों ने ज्ञानेश कुमार को लोकतंत्र का हत्यारा बताने वाले पोस्टर और बैनर ले रखे थे.
शनिवार को कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज के मौके पर भी ममता ने आयोग को आड़े हाथों लिया. मुख्यमंत्री का आरोप है कि राज्य में इस समय अघोषित आपातकाल लागू है. इसे राष्ट्रपति शासन का अघोषित रूप भी कहा जा सकता है. ममता का कहना है कि उनको मिली जानकारी के मुताबिक तार्किक विसंगति में जिन 60 लाख वोटरों के नाम हैं उनमें से 22.6 लाख मामलों का निपटारा हुआ है और उसमें दस लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. ऐसे लोगों में अल्पसंख्यक बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर के खास समुदाय के वोटरों की तादाद ही ज्यादा है.
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट की निगरानी में बंगाल, ओडिशा और झारखंड के सात सौ से ज्यादा न्यायिक अधिकारी विचाराधीन सूची में शामिल 60 लाख लोगों के दस्तावेजों की जांच में जुटे हैं. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, जांच के बाद चरणबद्ध तरीके से कई पूरक सूचियां जारी की जाएगी और ऐसे लोग वोट दे सकेंगे. ऐसी पहली सूची शुक्रवार को जारी होनी थी. फिर कहा गया कि यह शनिवार को जारी होगी. लेकिन अब इसे सोमवार को जारी करने की बात कही गई है.
ममता ने इस पर निशाना साधते हुए कहा है कि आयोग इसी तरह टालमटोल कर समय बर्बाद कर रहा है. उन्होंने आशंका जताई कि पता नहीं चुनाव से पहले यह काम पूरा भी होगा या नहीं.
मुख्यमंत्री का कहना है कि चुनाव के समय अधिकारियों के तबादले तो होते ही हैं. लेकिन राज्य सरकार से सलाह-मशविरा किए बिना आदी रात को मुख्य सचिव और गृह सचिव जैसे अहम अधिकारियों को हटाने से चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की मंशा साफ हो गई है. वो राज्य के प्रशासन को पंगु बना कर चुनाव जीतना चाहते हैं. लेकिन राज्य के लोग ही इसका जवाब देंगे.
ममता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार बिहार के कुछ हिस्सों और उत्तर बंगाल को मिला कर नया राज्य बनाने का प्रयास कर रही है. मोदी सरकार ने देश का कानून और संविधान खरीद लिया है.
ममता ने कहा है कि वो एसआईआर के जरिए भारी तादाद में वोटरों के नाम काटे जाने के खिलाफ अदालती और राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगी.
इसबीच, सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के जजों की अध्यक्षता में राज्य के 23 जिलों के 19 न्यायाधिकरणों का गठन किया है. तार्किक विसंगति वाले जिन वोटरों के नाम मतदाता सूची से कटेंगे, वो न्यायाधिकरण में अपील कर सकते हैं. लेकिन ममता का कहना है कि इसके लिए ज्यादा समय ही नहीं बचा है.
मुख्यमंत्री ने कहा है कि चुनाव से ठीक पहले राज्य के 50 से ज्यादा वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले के कारण अगर कोई समस्या पैदा होती है तो इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग और केंद्र पर होगी.
यहां राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि ममता और चुनाव आयोग के बीच यह टकराव चुनाव बाद तक जारी रहने की संभावना है.