पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले SIR प्रक्रिया में अब तक 91 लाख मतदाताओं के नाम कट गए हैं। तो क्या ये लाखों वोटर मतदान से वंचित रह जाएंगे? वोटर लिस्ट के फ्रीज होने के बाद उनके सामने अब क्या विकल्प हैं?
बंगाल मतदाता सूची से नाम काटे जाने पर विवाद
पश्चिम बंगाल में एसआईआर की कवायद के बाद लाखों वोटरों का मताधिकार अधर में फंस गया है। वोटर लिस्ट फ्रीज होने की वजह से अब ये लोग न्यायाधिकरण में अपील कर मतदाता सूची में नाम भी शामिल नहीं करा सकते। अब इन वोटरों और राजनीतिक दलों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं जहां अगले सप्ताह इस मामले की सुनवाई होनी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सवाल किया कि अगर लोग मतदान ही नहीं कर सकते तो न्यायाधिकरण के गठन की क्या जरूरत थी?
दूसरी ओर, इतनी भारी तादाद में वोटरों के नाम कटने से सत्ता के दोनों दावेदार यानी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा उम्मीद और आशंका के बीच झूल रही हैं। हालांकि उनका दावा है कि इससे फर्जी वोटर हट गए हैं और उनको इसका चुनावी फायदा मिलेगा। लेकिन भीतर ही भीतर दोनों पार्टियां खासकर उन सीटों के नतीजों को लेकर संशय में हैं जहाँ हार-जीत का अंतर दस हजार से नीचे रहा था।
जाँच के अधीन 60 लाख में से 27 लाख नाम कटे
एसआईआर की कवायद के दौरान तार्किक विसंगति की सूची में शामिल 60 लाख में से क़रीब 27 लाख यानी क़रीब 45 फीसदी वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
चुनाव आयोग की ओर से पहली बार जारी आँकड़ों के मुताबिक, एसआईआर से पहले की मतदाता सूची के मुकाबले अब करीब 91 लाख वोटरों के नाम सूची से काट दिए गए हैं। इससे पहले बीती 28 फरवरी को प्रकाशित मतदाता सूची में विभिन्न वजहों से 63.67 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए थे।
न्यायिक अधिकारियों की सुनवाई
उस सूची में 60 लाख से ज्यादा लोगों के नाम तार्किक विसंगति की सूची में रखे गए थे। इनके दस्तावेजों या नामों में गलती थी या माता-पिता के साथ उम्र के अंतर पर संदेह था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सात सौ से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों की सुनवाई शुरू की थी। आखिर सोमवार को देर रात के समय 12वीं और अंतिम पूरक सूची जारी होने के बाद चुनाव आयोग ने उनकी अलग से सूची जारी की जिनके नाम सूची से हटा दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे वोटरों की सहूलियत के लिए 23 जिलों में 19 न्यायाधिकरणो के गठन का निर्देश दिया था। लेकिन अब तक यह न्यायाधिकरण पूरी तरह काम शुरू नहीं कर सके हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मतदान के लिए नामांकन दायर करने की अंतिम तारीख तक ही सूची में नाम शामिल किए जा सकते हैं। उस लिहाज से सोमवार को पहले चरण के लिए इसकी अंतिम तारीख थी। लेकिन सूची ही देर रात जारी की गई।
अब जिन लोगों के नाम सूची से कट गए हैं वो उसी स्थिति में वोट दे सकते हैं जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करे। लेकिन मौजूदा हालात में इसकी संभावना कम ही है।
दूसरे चरण के मतदान के लिए नामांकन की अंतिम तारीख नौ अप्रैल है। लेकिन तब तक खास प्रगति की उम्मीद नहीं है। इससे लाखों वोटरों के मताधिकार के इस्तेमाल पर सवालिया निशान लग गया है।
नाम कटने वालों की संख्या बढ़ेगी?
चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि तार्किक विसंगति वाले करीब 22 हजार वोटरों के मामले में ई-हस्ताक्षर नहीं होने की वजह से उनके नाम अभी सूची में शामिल नहीं किए गए हैं। उनमें वो नाम भी शामिल हैं जिनको सूची से हटाया जाना है। ऐसे में सूची से कटने वालों की तादाद और बढ़ने का अंदेशा है। एसआईआर की पूरी प्रक्रिया के दौरान अब तक 90.83 लाख वोटरों के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं। तार्किक विसंगति वाली सूची में नाम कटने के मामले में अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। वहां 4.55 लाख वोटरों के नाम सूची से कट गए हैं। उससे पहले अंतिम सूची से 2.84 लाख नाम कटे थे। यानी जिले में कुल मिला कर 7.49 लाख वोटरों के नाम सूची से काट दिए गए हैं।इसी तरह कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले में तार्किक विसंगति वाले करीब सवा तीन लाख वोटरों के नाम कट गए हैं। एसआईआर के दौरान कटे नामों को जोड़ने पर इस जिले में सबसे ज्यादा 12.60 लाख वोटरों के नाम सूची से हट गए हैं। मालदा जिले से कुल 4.59 लाख वोटरों के नाम सूची से कट गए हैं। कोलकाता दक्षिण से 2.49 लाख वोटरों के नाम सूची से हट गए हैं और कोलकाता उत्तर से 4.47 लाख। पूर्व मेदिनीपुर जिले में ऐसे वोटरों की तादाद 1.65 लाख है।
पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
आयोग ने पहले ही बता दिया था कि 30 मार्च के बाद फॉर्म छह के ज़रिए सूची में नाम शामिल करने के लिए आवेदन करने वाले लोग इस चुनाव में वोट नहीं डाल सकेंगे। तार्किक विसंगति वाले वोटरों के सामने वोट डालने का मौका था। लेकिन सूची देरी से जारी होने और न्यायाधिकरण में सुनवाई नहीं होने की वजह से अब उनके वोट डालने पर भी संशय है।
न्यायाधिकरणों की सुनवाई में देरी
पश्चिम बंगाल में तार्किक विसंगति वाले वोटरों की अपील की सुनवाई के लिए गठित न्यायाधिकरणों को दो अप्रैल से ही सुनवाई करनी थी। लेकिन उस दिन वह काम शुरू नहीं कर सके। बाद में काम शुरू करने के बावजूद आयोग ने अब तक नहीं बताया है कि न्यायाधिकरणों में कितने मामलों की निपटारा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर के मुद्दे पर सोमवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने यह मुद्दा उठाया था।दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। नदिया जिले की अपनी रैली में कहा कि तमाम जिलों में चुन-चुन कर लोगों के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने भरोसा दिया कि वो एक भी व्यक्ति को बंगाल से बाहर नहीं निकालने देंगी। साथ ही ममता ने लोगों से मतदान के जरिए इस अन्याय का बदला लेने और भाजपा को एक भी वोट नहीं देने की अपील की।
ममता का चुनाव आयोग पर हमला
ममता ने बुधवार को चुनाव आयोग, केंद्र और भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि एसआईआर के ज़रिए दरअसल बंगाल में एनआरसी लागू करने की योजना बन रही है। लेकिन राज्य सरकार किसी भी व्यक्ति को बंगाल से बाहर नहीं निकाले जाने देगी।
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष का कहना था कि पार्टी पहले से ही कहती रही है कि एक भी वैध वोटर का नाम सूची से नहीं हटाया जा सकता। लेकिन इसके बावजूद भारी तादाद में लोगों के नाम काटे गए हैं और अब ऐसे लोगों का मताधिकार संकट में है।
भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि एसआईआर में पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक अधिकारियों ने ही तार्किक विसंगति वाले वोटरों के दस्तावेजों की जांच की है।
कांग्रेस और सीपीएम ने कहा है कि इस प्रक्रिया में देरी के कारण लाखों वैध मतदाता भी चुनाव में वोट डालने से वंचित रह जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कुछ करे तभी लोगों का मताधिकार सुरक्षित रह सकेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर की कवायद दोधारी तलवार साबित हो सकती है। इससे किसका फायदा होगा और किसका नुकसान, यह तो नतीजों से ही पता चलेगा।