पश्चिम बंगाल में लगातार तीन कार्यकाल पूरा करने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं। इतनी बड़ी तादाद में वोटरों के नाम कटने के बाद राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या एसआईआर में कटे नाम ममता बनर्जी का काम बिगाड़ सकते हैं?
राज्य में 30 फीसदी से ज्यादा अल्पसंख्यक आबादी ममता बनर्जी का मजबूत वोट बैंक रही है और इसके बूते ही वो यहां जीत की हैट्रिक लगा चुकी हैं। इस बार लगातार चौथी जीत हासिल कर नया रिकॉर्ड बनाने की कोशिश कर रही ममता की राह इस बार एसआईआर ने मुश्किल कर दी है।

कितने नाम कटे?

दरअसल, बीती 28 फ़रवरी को जब मतदाता सूची का प्रकाशन हुआ तो एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले बंगाल की मतदाता सूची में करीब 7.66 करोड़ वोटरों के नाम थे। लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित सूची में 6.44 करोड़ नाम ही थे। उनके अलावा उसमें 60 लाख से ज़्यादा कुछ ऐसे वोटर थे जिनको 'तार्किक विसंगति' वाली श्रेणी में रखा गया था। यह ऐसे लोग थे जिनके दस्तावेजों में कोई गड़बड़ी थी या पिता-पुत्र की उम्र में फासला कम था। कई लोग तो अनुवाद की गलती के कारण इस श्रेणी में शामिल कर दिए गए।
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चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक़, बीते शनिवार तक करीब 26 लाख मामलों का ही निपटारा हुआ था। यानी अब तक करीब 38 लाख मामलों का निपटारा होना है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट की निगरानी में 732 न्यायिक अधिकारी लगातार इस काम में जुटे हैं। इनमें दो पड़ोसी राज्यों- ओडिशा और झारखंड के सौ-सौ अधिकारी भी शामिल हैं।

राजनीतिक दलों को आशंका है कि अगर लाखों की तादाद में लोग वोट नहीं दे पाए तो इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ना तय है। खासकर नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर इससे नतीजे बदलने की आशंका है।

चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि बांकुड़ा और पुरुलिया जैसे जिलों में यह काम पूरा हो गया है लेकिन अल्पसंख्यक बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24-परगना जिले में अभी लाखों मामलों का निपटारा होना है। इससे सबसे ज्यादा ख़तरा सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को ही है। इसकी वजह यह है कि इन मुस्लिम-बहुल जिलों में तार्किक विसंगति की श्रेणी में शामिल वोटरों में 80 से 90 फीसदी लोग अल्पसंख्यक तबके के ही हैं। यह सत्तारूढ़ पार्टी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
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यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस और इसकी प्रमुख ममता बनर्जी बार-बार एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाती रही हैं। पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं कि किसी भी वैध वोटर का नाम मतदाता सूची से नहीं हटना चाहिए यानी उसे वोट डालने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार, बीजेपी और चुनाव आयोग ने मिल कर वैध वोटरों के नाम काटने के लिए ही हड़बड़ी में एसआईआर की य़ोजना बनाई थी। कुणाल का सवाल था कि दो साल के काम को दो महीने में कैसे पूरा किया जा सकता है?

युवाओं का समर्थन पाने की रणनीति

एसआईआर में लाखों वोटरों के नाम सूची से कटने की आशंका के कारण ममता बनर्जी ने महिलाओं के साथ ही राज्य के युवा तबक़े का समर्थन हासिल करने के लिए सरकार ने हाल में ही युवा साथी योजना के तहत दसवीं पास बेरोजगार युवाओं को हर महीने डेढ़ हजार रुपए की आर्थिक मदद देने की घोषणा की थी। यह रक़म 21 से 40 साल तक की उम्र के तमाम युवाओं को मिलेगी। इस साल शुरू की गई युवा साथी योजना के 84 लाख से ज़्यादा आवेदन मिले हैं। पहले उनको एक अप्रैल से भत्ता मिलना था। लेकिन चुनाव को ध्यान में रखते हुए मार्च के पहले सप्ताह से ही इसका वितरण शुरू हो गया है। ममता को उम्मीद है कि राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई तमाम योजनाएँ प्रतिष्ठान विरोधी लहर से लड़ने में पार्टी का मजबूत हथियार बनेंगी।
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इस बार चुनावी परिस्थिति पहले के मुक़ाबले एकदम अलग होने का एक कारण यह भी है कि अब एसआईआर की प्रक्रिया चुनाव आयोग के हाथों से निकल कर अदालत के हाथो में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को इस मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है।

अल्पसंख्यक वोट बैंक में लगेगी सेंध?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर ने इस बार ममता की चुनौती को कठिन बना दिया है। इससे उनके मज़बूत अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध का ख़तरा है। इन ख़तरों का पूर्वानुमान लगाते हुए ममता ने बांग्ला अस्मिता और बंगालियों के कथित अपमान के अपने पारंपरिक मुद्दों के अलावा इस बार अपने तरकश में कई नए तीर जोड़े हैं। उनके सहारे ममता को इन चुनौतियों से निपटने की उम्मीद है। इसी रणनीति के तहत उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान एसआईआर के ज़रिए वैध वोटरों के नाम काटने की कथित साजिश को अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाने का फ़ैसला किया है।