पश्चिम बंगाल में RG Kar कांड के बाद क्या सियासी समीकरण बदलते दिख रहे हैं? पीड़िता की मां को टिकट देने से क्या बीजेपी को चुनावी फायदा मिल सकता है? पढ़िए पूरा विश्लेषण और राजनीतिक असर।
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव पर आरजी कर कांड का कितना और कैसा असर होगा? क्या इससे बीजेपी की किस्मत बदलेगी? भाजपा की ओर से इस कांड का सियासी फायदा उठाने के लिए पीड़िता की मां को टिकट दिए जाने के बाद बंगाल के राजनीतिक हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है।
इसके साथ ही यह आशंका भी उठ रही है कि क्या चुनाव प्रचार के दौरान पीड़िता की माँ की फोटो और नाम के सार्वजनिक होने से कोई कानूनी दिक्कत तो नहीं होगी। नियमों के मुताबिक, ऐसे मामलों में पीड़िता या परिवार की पहचान गोपनीय रखी जाती है।
क्या थी आरजी कर की घटना?
लेकिन इससे पहले एक बार आरजी कर की घटना का जिक्र जरूरी है। अगस्त, 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बीते साल आठ अगस्त की देर रात को ड्यूटी पर एक जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। पहले इस मामले की जांच कोलकाता पुलिस को सौंपी गई थी। उसने इस मामले में एक सिविक वालंटियर संजय राय को गिरफ्तार किया था। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर इसकी जाँच सीबीआई को सौंप दी गई। लेकिन अपनी लंबी जांच के बावजूद सीबीआई इस मामले में किसी अन्य अभियुक्त की भागीदारी साबित नहीं कर सकी। आखिर बीते साल कोलकाता की एक अदालत ने संजय राय को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन पीड़िता के माता-पिता पुलिस और सीबीआई की जांच से असंतुष्ट थे। वो लगातार आरोप लगाते रहे कि इस मामले में कई अन्य प्रभावशाली लोग भी शामिल हैं और उनको बचाने के लिए ही शीर्ष स्तर से लीपापोती का प्रयास किया जा रहा है।
इस घटना ने लंबे समय तक देश-विदेश में सुर्खियां बटोरी थीं। दूसरी ओर, इस घटना के विरोध में राज्य के तमाम जूनियर डॉक्टरों ने लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन किया था। इस घटना के खिलाफ लगातार बढ़ते विरोध और आंदोलन के बाद सीबीआई ने सबूतों से छेड़छाड़ के आरोप में कॉलेज के प्रिंसिपल संदीप घोष और टाला थाने के ऑफिसर इंचार्ज अभिजीत मंडल को भी गिरफ्तार किया था। लेकिन नब्बे दिनों के भीतर जांच एजेंसी के आरोपपत्र दायर करने में नाकाम रहने पर अदालत ने उनको जमानत दे दी थी।
पीड़िता की मां बीजेपी से जुड़ गईं
पीड़िता की मां ने बीते सप्ताह ही उत्तर 24-परगना जिले की पानीहाटी सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। उसके बाद माता-पिता दोनों ने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ले ली।
भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने तब कहा था कि उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में अवगत करा दिया है और टिकट देने का फैसला वही करेगा। आखिर तीसरी सूची में पीड़िता की मां को उम्मीदवार बना दिया गया है।
उम्मीदवारी के एलान के बाद उन्होंने कहा कि चुनाव में उनकी जीत का मतलब इलाके के लोगों की जीत होगा। मेरे पास अब पाने या खोने को कुछ भी नहीं है। लेकिन मैं राज्य से तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकना चाहती हूं।
पीड़िता की मां के परिचय से क़ानूनी अड़चन तो नहीं?
लेकिन बाकी उम्मीदवारों की तरह पीड़िता की मां का नाम और परिचय सार्वजनिक होने से कोई कानूनी अड़चन तो नहीं पैदा होगी? विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की दलील है कि अगर पीड़ित परिवार खुद अपना परिचय नहीं छिपाना चाहता तो कोई भी कानून उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का जिक्र करते हुए इस पर संदेह जताया है।
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अमित शाह ने मुलाकात का समय नहीं दिया था?
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि चुनावी राजनीति में उतर कर पीड़िता के माता-पिता अपना सम्मान खत्म कर रहे हैं। पार्टी के एक प्रवक्ता का कहना है कि पीड़िता के माता-पिता को अमित शाह ने मुलाकात का समय नहीं दिया था। लेकिन अब मां अचानक पार्टी के टिकट पर मैदान में उतर गई है। इससे साफ है कि वो अपनी पुत्री की मौत पर राजनीति कर रहे हैं। पार्टी का आरोप है कि पीड़िता की मां के बहाने भाजपा इस घटना का इस्तेमाल अपने सियासी फायदे के लिए करने का प्रयास कर रही है।वैसे, प्रदेश भाजपा में भी पीड़िता की मां को टिकट दिए जाने के मुद्दे पर आम राय नहीं थी। नेताओं के एक गुट का कहना था कि इससे पार्टी पर सियासत के आरोप लगेंगे और आरजी कर की घटना की अहमियत कम हो जाएगी। यह गुट चाहता था कि चुनाव लड़ाने की बजाय पूरे राज्य में पीड़िता के माता-पिता तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करें।
लेकिन दूसरे गुट का कहना है कि पीड़िता की मां खुद ही चुनाव लड़ना चाहती थी। ऐसे में उसे नहीं टिकट नहीं देने की स्थिति में यह संदेश जा सकता था कि पार्टी आरजी कर की घटना का समर्थन करती है।
आरजी कर की घटना के खिलाफ न्याय की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन करने वाले जूनियर डॉक्टरों ने इस पर मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है। आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे डॉ. अनिकेत महतो ने कहा है कि यह उनका निजी फैसला है। इसके साथ पीड़िता के लिए न्याय की हमारी मांग का कोई संबंध नहीं है। एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के महासचिव उत्पल बनर्जी का कहना था कि देश के नागरिक के तौर पर किसी भी व्यक्ति को चुनाव लड़ने का हक है। लेकिन साथ ही यह याद रखना होगा कि सीबीआई पीड़िता को न्याय दिलाने में नाकाम रही है और अमित शाह ने भी पीड़िता के माता-पिता से मुलाकात नहीं की थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीड़िता की मां के मैदान में उतरने से भाजपा को कितना फायदा होगा, यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन इससे साफ है कि पार्टी इस घटना का इस्तेमाल अपने सियासी फायदे के लिए करने का प्रयास कर रही है।