'वॉशिंगटन पोस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार 9/11 के 25 साल बाद अफ़गानिस्तान में पिछले तीन साल में अल-कायदा के कम से कम आठ आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटर बन गए हैं। अल कायदा और पाकिस्तान के बीच संबंधों के कारण भारत की मुश्किलें बढ़ने की आशंका है।
आतंकी संगठन अल-क़ायदा 9/11 के 25 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान में फिर से पैर पसार पसार रहा है। वॉशिंगटन पोस्ट की एक सनसनीखेज़ रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले तीन वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा और उससे जुड़े संगठनों ने कम से कम आठ ट्रेनिंग सेंटर बना लिए हैं। इन कैंपों में हथियार, विस्फोटक और गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग के साथ अब एन्क्रिप्शन, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी सिखाया जा रहा है। अल-क़ायदा का पाकिस्तान और इसकी बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध उजागर है तो अफ़ग़ानिस्तान में इसका पैर पसारना भारत के लिए भी बड़ी चिंता की वजह है।
भारत के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती है, यह समझने से पहले यह जान लें कि आख़िर अल-क़ायदा से जुड़ी यह रिपोर्ट क्या है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद सुरक्षा के लिहाज से पैदा हुए शून्य का फायदा आतंकी संगठन उठा रहे हैं। रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के मॉनिटरों और पश्चिमी खुफिया अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि पिछले तीन वर्षों में अल-क़ायदा और उससे जुड़े संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान में कम से कम आठ ट्रेनिंग साइट तैयार की हैं।
इन जगहों पर आतंकियों को पारंपरिक हथियारों और विस्फोटकों के इस्तेमाल के साथ-साथ गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी जा रही है। चिंता की बात यह है कि प्रशिक्षण अब आधुनिक तकनीक से भी जुड़ रहा है। इसमें एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है। इसका मतलब यह है कि 25 साल पहले जिस तरह का आतंकी नेटवर्क दुनिया के लिए खतरा बना था, वह अब तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा सक्षम होने की कोशिश कर रहा है।
अल-क़ायदा की भूमिका बदल गई
रिपोर्ट के मुताबिक़ अल-क़ायदा के मूल संगठन में फिलहाल क़रीब 100 लड़ाके होने का अनुमान है। यानी संगठन पहले की तरह हजारों लड़ाकों वाली बड़ी सैन्य ताक़त नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसका प्रभाव ख़त्म हो गया है। रिपोर्ट है कि अल-क़ायदा अब सीधे तौर पर बड़ी सैन्य कार्रवाई करने वाली सेना की बजाय दूसरे आतंकी संगठनों के लिए एक तरह की 'कंसल्टिंग सर्विस' की भूमिका निभा रहा है। यानी वह दूसरे आतंकवादी संगठनों को ट्रेनिंग, रणनीति, तकनीकी जानकारी और दूसरे संसाधनों में मदद कर सकता है।आतंकी संगठनों के तौर-तरीकों में यही बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता की वजह है। कम संख्या में लड़ाके होने के बावजूद अगर कोई संगठन दूसरे समूहों की क्षमता बढ़ाने लगे तो उसका असर उसके अपने सदस्यों की संख्या से कहीं ज्यादा हो सकता है।
दूसरे आतंकी संगठन भी सक्रिय
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान में केवल अल-क़ायदा ही सक्रिय नहीं है। दूसरे आतंकवादी संगठन भी वहां अपने ठिकाने और ट्रेनिंग साइट बना रहे हैं। इनमें इस्लामिक स्टेट से जुड़ा एक संगठन भी शामिल है। अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं, लेकिन दोनों की मौजूदगी अफ़ग़ानिस्तान को आतंकवादी गतिविधियों के लिए अहम क्षेत्र बना रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, विभिन्न 'मिलिटेंट इस्लामिस्ट' संगठनों की मौजूदगी अब अफ़ग़ानिस्तान के 34 में से कम से कम 14 प्रांतों तक पहुँच चुकी है।
इससे यह सवाल फिर उठता है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद क्या अफ़ग़ानिस्तान वास्तव में आतंकवादी संगठनों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनने से रोक पाया है?भारत के लिए चिंता पाकिस्तान क्यों?
अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा की गतिविधियों की खबर भारत के लिए इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इस पूरे आतंकी नेटवर्क का इतिहास पाकिस्तान से काफ़ी घनिष्ठता से जुड़ा रहा है।
भारत के लिए चिंता यह है कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच आतंकवादी नेटवर्क के स्तर पर भी लंबे समय से संबंध रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पाकिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन से लगती है। हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान समुद्र से घिरा हुआ देश नहीं है, लेकिन पाकिस्तान उसके लिए लंबे समय से दक्षिणी रास्ते के तौर पर बेहद अहम रहा है। पेशावर, कराची और पाकिस्तान के कबायली इलाकों का इस्तेमाल पहले अफ़ग़ान जिहाद और बाद में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क की गतिविधियों के लिए होता रहा है।
भारत के लिहाज से अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा की वापसी की खबर केवल अफ़ग़ानिस्तान तक सीमित नहीं है। हालाँकि काफ़ी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि इन नेटवर्कों के पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों से किस तरह के संबंध बनते हैं।
अल-क़ायदा और पाकिस्तान का पुराना रिश्ता
अल-क़ायदा का इतिहास देखें तो संगठन के कई बड़े नेताओं के तार पाकिस्तान से जुड़े रहे हैं। 1993 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए बम हमले के मास्टरमाइंड रमज़ी यूसुफ की मुलाकात पाकिस्तान में एक आतंकी खालिद शेख मोहम्मद से हुई थी। 9/11 हमलों की जांच करने वाले अमेरिकी आयोग के मुताबिक, खालिद शेख मोहम्मद ने बाद में अफ़ग़ानिस्तान में ओसामा बिन लादेन से मुलाकात की और 9/11 हमलों की योजना से जुड़ा विचार सामने रखा।
खालिद शेख मोहम्मद को 2003 में पाकिस्तान के रावलपिंडी से गिरफ्तार किया गया था। वह फिलहाल ग्वांतानामो बे में कैद है। अल-क़ायदा के एक अन्य बड़ा आतंकी अबू जुबैदा को भी 2002 में पाकिस्तान से गिरफ्तार किया गया था। रमज़ी बिन अल-शिब्ह भी पाकिस्तान में पकड़ा गया था। सबसे बड़ा उदाहरण खुद ओसामा बिन लादेन का है।
ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में मिला था
9/11 के बाद अमेरिका और दुनिया का ध्यान लंबे समय तक अफ़ग़ानिस्तान पर रहा। लेकिन मई 2011 में ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान के एबटाबाद में मार गिराया। वह किसी दूर-दराज़ अफ़ग़ान गुफा में नहीं छिपा था। उसका ठिकाना पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य अकादमी से दो मील से भी कम दूरी पर था।यह तथ्य भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि इससे यह सवाल उठता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय चर्चा में अफ़ग़ानिस्तान पर जितना ध्यान दिया जाता है, पाकिस्तान में मौजूद नेटवर्क और उसके बुनियादी ढांचे पर उतनी ही निरंतर निगरानी क्यों नहीं होती। आतंकवाद के इस पूरे क्षेत्रीय नेटवर्क में पाकिस्तान की भूमिका को नजरअंदाज करना मुश्किल है।
मुंबई से संसद हमले तक आतंकी हमले
भारत ने 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में आतंकवादी हिंसा का बुरा दौर देखा है। 1993 के मुंबई बम धमाके, 2001 में संसद पर हमला और 2008 के मुंबई आतंकी हमले दक्षिण एशिया में आतंकवाद के लंबे सिलसिले में शामिल रहे हैं। 26/11 के मुंबई हमले में आतंकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे थे। हमलावरों ने कराची से रवाना होकर एक भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव को कब्जे में लिया और फिर मुंबई पहुंचे। अमेरिकी अधिकारियों ने लश्कर-ए-तैयबा को मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार बताया है। भारत लंबे समय से इस हमले के साजिशकर्ताओं और मास्टरमाइंडों को न्याय के कटघरे में लाने की मांग करता रहा है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि दक्षिण एशिया में अलग-अलग आतंकवादी संगठनों के नेटवर्क कई बार एक-दूसरे से जुड़ते रहे हैं। लश्कर-ए-तैयबा 1986 में अफ़ग़ानिस्तान के कुनार प्रांत में बना था। बाद में संगठन ने भारत को अपने प्रमुख निशानों में शामिल किया। अल-क़ायदा का बड़ा सदस्य अबू जुबैदा की गिरफ्तारी पाकिस्तान के फैसलाबाद में एक ऐसे सुरक्षित ठिकाने से हुई थी जिसे लश्कर-ए-तैयबा से जोड़ा गया था। इससे पता चलता है कि अलग-अलग आतंकवादी संगठनों के बीच कम से कम कुछ स्तर पर संपर्क रहा है।
9/11 के 25 साल बाद वही खतरा
9/11 के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध शुरू किया था। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार को हटाया गया और अल-क़ायदा के नेटवर्क को तोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया गया। लेकिन 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी और तालिबान की दोबारा सत्ता में वापसी के पांच साल बाद सामने आई यह रिपोर्ट बताती है कि आतंकवादी संगठनों का खतरा पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ। बल्कि खतरे का स्वरूप बदल रहा है।
भारत के सामने चिंताएँ
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के बाद भारत के सामने कई अहम सवाल खड़े होते हैं। अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय अल-क़ायदा और दूसरे आतंकी संगठनों के पाकिस्तान स्थित नेटवर्क से कितने संबंध हैं? क्या इन ट्रेनिंग कैंपों से प्रशिक्षित आतंकवादी भविष्य में दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में भेजे जा सकते हैं? तालिबान सरकार इन संगठनों के खिलाफ वास्तव में कितनी प्रभावी कार्रवाई कर रही है? ड्रोन, एआई और एन्क्रिप्टेड संचार जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल से भारत के सामने आतंकवाद का नया खतरा कितना गंभीर हो सकता है?