इस घटना पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के बाहर बयान दिया लेकिन भारत की संसद के अंदर उन्होंने इस पर कोई बयान नहीं दिया। वीडियो वायरल होने के बाद ही पीएम मोदी बोले। जबकि वहां हिंसा की घटनाएं पिछले ढाई महीने से चल रही हैं। इस समय भारतीय संसद भी चल रही है। लेकिन संसद के अंदर पीएम के बयान की मांग को लेकर वहां भी सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध बना हुआ है।
यूरोपियन यूनियन की संसद में भी उठा मामलाः फ्रांस के स्ट्रासबर्ग स्थित यूरोपीय संसद ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित कर मणिपुर हिंसा को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी। प्रस्ताव में भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर भी नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की गई है। यूरोपीय यूनियन की संसद में 6 संसदीय समूहों की तरफ से प्रस्तुत इस प्रस्ताव में मणिपुर में पिछले दो महीने से चल रही हिंसक वारदातों को न रोक पाने के लिए मोदी सरकार के तरीकों की तीखी आलोचना की है। इसमें कहा गया है कि हिंदू बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने वाली राजनीति से प्रेरित और बंटवारा करने वाली नीतियों और आतंकी समूहों की गतिविधियों में हुई बढ़ोतरी से हम चिंतित हैं।
हिंसा राजनीति से प्रेरित हैः प्रस्ताव में कहा गया है कि हमने भारतीय अधिकारियों से अनुरोध किया है कि वो जातीय और धार्मिक हिंसा को तुरंत रोके। धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सरकार सभी जरुरी कदम उठाए। इसमें कहा गया है कि अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति असहिष्णुता ने मणिपुर में हिंसा को भड़काया है। यह हिंसा राजनीति से प्रेरित है। प्रस्ताव में कहा गया है कि सामाजिक विभाजन पैदा करने वाली नीतियों को लेकर हम चिंतित है। ये नीतियां हिंदू बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देती हैं। हाल के वर्षों में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में गिरावट आई है। विभिन्न तरह के भेदभाव वाले कानूनों और प्रथाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सब के कारण ईसाई, मुस्लिम, सिख और आदिवासी समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।