ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका की ओर से ईरान पर संभावित हमलों के लिए ब्रिटिश हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने के अनुरोध को खारिज कर दिया है। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होने की आशंका के कारण लिया गया है और इससे चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने की योजना पर तनाव बढ़ सकता है।

प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की सरकार ने ग्लौस्टरशायर में स्थित RAF फेयरफोर्ड (जो स्विंडन के निकट है) से अमेरिकी लंबी दूरी के बॉम्बिंग ऑपरेशनों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन का मानना है कि ईरान पर हमलों में भागीदारी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकती है। 2001 के बाद ब्रिटेन की नीति में शामिल सिद्धांतों के अनुसार, यदि कोई देश जानबूझकर अपने सहयोगी की अवैध सैन्य कार्रवाई में सहायता करता है, तो वह भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है और ईरान के खिलाफ संभावित हमलों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं। RAF फेयरफोर्ड अमेरिकी भारी बॉम्बरों का यूरोप में प्रमुख आधार है। हालांकि, डिएगो गार्सिया (चागोस द्वीप समूह में) स्थित संयुक्त यूके-यूएस बेस से हमले के लिए ब्रिटेन को केवल सूचित करना होता है, लेकिन ब्रिटेन के घरेलू बेस जैसे RAF फेयरफोर्ड का इस्तेमाल करने के लिए लंदन की स्पष्ट मंजूरी जरूरी है, जो अब नहीं दी गई है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के इस रुख की आलोचना की है। ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान जैसे "अत्यधिक अस्थिर और खतरनाक शासन" से संभावित हमले को रोकने के लिए अमेरिका को डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड तक पहुंच की जरूरत हो सकती है। ट्रंप ने लिखा, "डिएगो गार्सिया मत छोड़ो!" उन्होंने चागोस द्वीप समझौते को "बड़ी गलती" करार दिया और ब्रिटेन से इसे आगे न बढ़ाने की अपील की।

ट्रंप ने पहले इस समझौते का समर्थन किया था, लेकिन अब उन्होंने अपना रुख बदल लिया है। यह बदलाव ब्रिटेन द्वारा बेस उपयोग की अनुमति न देने से जुड़ा माना जा रहा है।

चागोस सौदा विवाद में फंसा

यह विवाद चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने और डिएगो गार्सिया बेस को 99 साल के लिए वापस लीज पर लेने की ब्रिटेन की योजना से जुड़ा है, जिसकी अनुमानित लागत 35 अरब पाउंड बताई जा रही है। अमेरिका इस बेस को इंडो-पैसिफिक और मध्य पूर्व ऑपरेशनों के लिए महत्वपूर्ण मानता है।

ब्रिटेन ने पहले भी ईरानी टारगेट स्थलों पर अमेरिकी हमलों में सीधे भागीदारी से इनकार किया है और केवल रक्षात्मक उपायों तक सीमित रहा है, जैसे यूके संपत्तियों और क्षेत्रीय सहयोगियों की सुरक्षा।

ब्रिटिश सरकार ने ऑपरेशनल मामलों पर टिप्पणी करने से इनकार किया है, लेकिन रिपोर्ट्स से साफ है कि कानूनी और कूटनीतिक संवेदनशीलता के कारण यह फैसला लिया गया है। यह घटना यूके-यूएस संबंधों में तनाव का संकेत दे रही है, खासकर चागोस समझौते के संदर्भ में।

अमेरिका-ईरान तनाव पुराना है

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की जड़ें 1953 में हैं, जब अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग को सत्ता से हटाकर शाह मोहम्मद रजा पहलवी को मजबूत किया, क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। 1979 की इस्लामी क्रांति ने सब बदल दिया- शाह का तख्तापलट हुआ, अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए, और ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा, जिससे दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध टूट गए और अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए।


1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने इराक का साथ दिया, जबकि 1980 के बाद ईरान को आतंकवाद का राज्य प्रायोजक घोषित किया गया। 1990-2000 के दशक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद बढ़ा, जिसके कारण अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगाए। 2015 में ओबामा प्रशासन ने JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) पर हस्ताक्षर किए, लेकिन 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकलकर "अधिकतम दबाव" नीति अपनाई, जिससे तनाव चरम पर पहुंचा। 2020 में अमेरिका ने जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या की, और ईरान ने जवाबी हमले किए।

हाल के वर्षों में तनाव और बढ़ा है। 2025 में इसराइल-ईरान के बीच 12-दिवसीय युद्ध हुआ, जिसमें अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर सीधे हमले किए। 2026 में ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के लिए अल्टीमेटम दिया है, क्षेत्र में अमेरिकी सेना बढ़ाई है, और ईरान रूस के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है। दोनों पक्ष युद्ध की तैयारी में हैं, लेकिन कूटनीति भी चल रही है। अभी स्थिति बेहद नाजुक है।