इमरान खान ने पिछले एक साल में, अपने पीछे पर्याप्त जन समर्थन जुटाया है कि उनके शब्दों में अब एक ऐसा वजन है, जिसकी अनदेखी पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान नहीं कर सकता है।
हिंसा और टकराव कभी भी राजनीतिक चुनौतियों का जवाब नहीं होते हैं। खासकर तब नहीं जब अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर हो और लोग बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की वजह से रोजमर्रा की निराशा में अपना गुस्सा निकालने की कोशिश कर रहे हों। यह गुस्सा उनके जीवन को परिभाषित करता है।