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युद्ध अपराध के अभियुक्त गोतबया राजपक्षे होंगे श्रीलंका के राष्ट्रपति

तमिल अलगाववादी आन्दोलन को कुचलने और गृहयुद्ध में देश को जीत दिलाने वाले सैनिक कमान्डर के रूप में मशहूर गोतबया राजपक्षे श्रीलंका के अगले राष्ट्रपति होंगे। उनके मुख्य विरोधी और सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार सुजीत प्रेमदास ने अपनी हार स्वीकार कर ली है। इसे भारत की कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही, गोतबया राजपक्षे की जीत हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव का संकेत है। यह भारत के लिए अधिक चिंता की बात है। 
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राजपक्षे को 49.6 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी प्रेमदास को 44.4 प्रतिशत वोट हासिल हुआ है। चुनाव आयोग के अध्यक्ष महिंदा देशप्रिय ने कहा कि लगभग 80 प्रतिशत यानी क़रीब 1 करोड़ 60 लाख लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है।
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पर्यवेक्षकों का कहना है कि गोतबया राजपक्षे की जीत श्रीलंका में 21 अप्रैल को हुए आतंकवादी हमलों और उसके बाद आक्रामक रूप से उभरे उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं का नतीजा है। एक के बाद एक कई हमलों में तीन लग्ज़री होटलों और तीन गिरजाघरों को निशाना बनाया गया था, जिसमें बड़ी तादाद में लोग मारे गए थे। इसलामिक स्टेट ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी। 
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजपक्षे को राष्ट्रपति चुने जाने पर बधाई दी है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, 'मैं दोनों देशों और उनकी जनता के बीच नज़दीकी और भाईचारे के रिश्ते के लिए आपके साथ मिल कर काम करना चाहता हूँ। ऐसा करने से इस क्षेत्र में शांति, समृद्धि और सुरक्षा बढ़ेगी।'

कौन हैं सुजीत प्रेमदास?

तत्कालीन प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की सरकार पर ख़ुफ़िया जानकारी नहीं इकट्ठी करने और हमले को रोकने में नाकाम रहने के आरोप लगे थे। उन्होंने बाद में इस्तीफ़ा भी दे दिया था। 

सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रपति उम्मीदवार सुजीत प्रेमदास उनके सहयोगी थे। सुजीत के पिता रणसिंधे प्रेमदास श्रीलंका के राष्ट्रपति थे, जिनकी हत्या मई 1993 में तमिल टाइगर्स ने आतंकवादी हमले में कर दी थी। 

विक्रमसिंघे सरकार और सुजीत प्रेमदास पर यह आरोप लगा था कि वे हमले को रोकने में नाकाम रहे, लिहाज़ा वे देश को सुरक्षित नहीं रऱ पाएंगे। 

गोतबया राजपक्षे होने का मतलब!

लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान सबसे बड़ी बात थी उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाने की। गोतबया राजपक्षे उस महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई हैं जो 2005-15 के बीच श्रीलंका के राष्ट्रपति थे। वे बेहद मजबूत और कुशल प्रशासक समझे जाते थे। 

जिस समय श्रीलंका में गृहयुद् हुआ था, गोतबया राजपक्षे सेना में थे। उनकी ख्याति उस युद्ध में देश को जीत दिलाने वाले और अलगाववादी आन्दोलन को कुचनले वाले व्यक्ति के रूप में थी।

गोतबया राजपक्षे उग्र राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में तो उभरे ही, वह सिंहलियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे और सिंहली व श्रीलंकाई राष्ट्रवाद के मिलेजुले चिह्न के रूप में पूरे देश में छा गए।

उग्र सिंहली राष्ट्रवाद!

लेकिन गोतबया पर मानवाधिकारों को कुचलने, बड़े पैमाने पर तमिलों और दूसरे अल्पसंख्यकों की हत्या और उत्पीड़न के आरोप लगे थे। उन पर युद्ध अपराध के आरोप लगे थे और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने उन पर युद्ध अपराध के मुक़दमे चलाने की माँग की थी। पर उनका कुछ न बिगड़ा और वे लोकप्रिय होते चले गए। वे जल्द ही सिंहली राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में उभरे और आज नतीजा सबके सामने है। 

भारत की कूटनीतिक हार!

गोतबया राजपक्षे की जीत को भारत की कूटनीतिक हार इसलिए माना जा सकता है कि उनके समय चीन श्रीलंका में पैर पसार सका। अपने भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते हुए ही गोतबया रक्षा सचिव बना दिए गए थे।
गोतबया ने ही हम्बनटोटा में बंदहगाह बनाने का काम चीन को दिया, बीजिंग ने उसके लिए 8 अरब डॉलर माँगे और भुगतान न करने की स्थिति में श्रीलंका ने वह बंदरगाह ही चीन को दे दिया। यह बंदरगाह भारत की जल सीमा के कुछ नॉटिकल माइल की दूरी पर है।
इसके अलावा गोतबया के समय ही कोलंबो ने चीन से दो पनडुब्बियाँ लीज़ पर लीं, उन्हें अपने जल क्षेत्र यानी हिन्द महासागर में रखा। वह भी भारत के पास ही है। इस तरह चीन ने एक तरह से भारत की घेराबंदी गोतबया के रहते ही कर ली। 
पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजपक्षे राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में धार्मिक और जातीय रूप से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल देंगे। तमिल विद्रोहियों से लड़न में उनकी भागीदारी और मुसलमान विरोधी विचारों के लिए जाने जाने वाले कट्टर बौद्ध समूह बोदू बाला सीन के साथ उनका दोस्ताना रिश्ता इस आशंका को बल देता है। 
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