खाड़ी में तनाव बढ़ने पर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है। बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को तो चिंता में डाल ही दिया है, भारत के लिए भी यह बड़ा संकट है। इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए हैं और ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की है। इस झगड़े का असर भारत पर भी पड़ता दिख रहा है, क्योंकि भारत अपनी ज़रूरत का करीब 90% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है। फारस की खाड़ी में हो रही यह उथल-पुथल भारत की तेल सप्लाई को खतरे में डाल सकती है। खासतौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना भारत के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य कितना अहम?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य मध्य पूर्व में एक बहुत अहम समुद्री रास्ता है। यह फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है और दुनिया के 20-25% कच्चे तेल का यहीं से गुजरना होता है। यह रास्ता क़रीब 100 मील लंबा है, लेकिन सबसे संकरी जगह पर सिर्फ 21 मील चौड़ा है। यहाँ पानी की गहराई भी कम है, जिससे जहाजों को ख़तरा रहता है।

उत्तर की तरफ ईरान है, जबकि दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात और ओमान हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में वोर्टेक्सा एनालिटिक्स फर्म के डेटा से पता चलता है कि पिछले साल यहां से रोजाना औसतन 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल, कंडेंसेट और रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स गुजरे। सऊदी अरब, ईरान, यूएई, कुवैत और इराक जैसे ओपेक के कई देश एशियाई बाजारों में तेल सप्लाई के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं।
केप्लर नाम की ग्लोबल डेटा और एनालिटिक्स कंपनी के मुताबिक़, भारत ने हाल ही में मध्य पूर्व से ज्यादा तेल खरीदना शुरू किया है, जिससे हॉर्मुज से जुड़े जोखिम बढ़ गए हैं। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार केप्लर के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया कहते हैं, 'अगर तनाव बढ़ा तो सबसे पहले क़ीमतें बढ़ेंगी, माल ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च बढ़ेगा। अभी सप्लाई में कमी की संभावना कम है, लेकिन पूरी तरह से ब्लॉकेज की आशंका भी कम ही है।'

भारत की हॉर्मुज पर कितनी निर्भरता?

केप्लर के अनुसार, भारत की हॉर्मुज से जुड़ी निर्भरता हाल के महीनों में बढ़ी है। उनकी वेसल ट्रैकिंग डेटा से पता चलता है कि भारत के क़रीब 2.5-2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चे तेल के आयात इसी जलडमरूमध्य से होकर आते हैं। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50% है। ये तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आते हैं। सुमित रितोलिया बताते हैं, 'पिछले 2-3 महीनों में भारत ने रूसी तेल से थोड़ा मुंह मोड़ा है और मध्य पूर्व के तेल पर ज्यादा जोर दिया है। इससे भारत में गल्फ देशों का आयात बढ़ा है, जो हॉर्मुज में किसी रुकावट से ज्यादा प्रभावित हो सकता है।'

क्या हॉर्मुज लंबे समय तक बंद रह सकता है?

रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि ईरान ने हॉर्मुज को ब्लॉक करना शुरू कर दिया है। हालाँकि, ईरान आधिकारिक तौर पर हॉर्मुज को बंद करने की घोषणा कर दी है। आधिकारिक ऐलान से पहले ही इलाक़े में जहाजों को रेडियो मैसेज मिल रहे थे कि कोई जहाज हॉर्मुज से नहीं गुजर सकता। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, ये मैसेज वीएचएफ़ रेडियो से दिए गए। अमेरिका ने अपने कमर्शियल जहाजों को गल्फ से दूर रहने की सलाह दी है।

केप्लर का कहना है कि पूरी तरह से लंबा ब्लॉकेज की संभावना कम है। जानकार कहते हैं कि अस्थायी रुकावट, रूट बदलना या ज़्यादा सिक्योरिटी चेक ज़्यादा संभव हैं। 

हॉर्मुज में लंबा ब्लॉकेज क्षेत्रीय उत्पादकों के खुद के निर्यात पर असर डालेगा, जो आर्थिक रूप से नुक़सानदेह होगा। इसलिए अस्थिरता का जोखिम बढ़ा है, लेकिन लंबे समय तक सप्लाई में कमी की आशंका कम है।

भारत पर कच्चे तेल की कीमतों का असर?

सुमित रितोलिया ने टीओआई को बताया कि मौजूदा तनाव में सबसे पहले क़ीमतों पर असर पड़ेगा, न कि मात्रा पर। जियोपॉलिटिकल रिस्क से ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ेंगी, साथ ही फ्रेट रेट्स और वॉर-रिस्क इंश्योरेंस का खर्च भी। इससे भारतीय रिफाइनरों के लिए तेल की लैंडेड कॉस्ट बढ़ जाएगी, भले ही फिजिकल शॉर्टेज न हो।

भारत के लिए इसका मतलब है ज्यादा आयात बिल और आर्थिक दबाव। लेकिन निकट भविष्य में तेल की उपलब्धता बनी रहेगी।

रूसी तेल फिर से फोकस में?

भारत ने हाल के महीनों में रूसी तेल के आयात कम किए हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने रूसी कंपनियों लुकोइल और रोसनेफ्ट पर प्रतिबंध लगाए, जिससे भारत के रूसी तेल आयात गिरे। लेकिन अब क्योंकि हॉर्मुज बंद हो गया है तो रूसी तेल फिर से विकल्प बन सकता है।
केप्लर की ट्रैकिंग से पता चलता है कि इंडियन ओशन और अरबियन सी में रूसी कार्गो उपलब्ध हैं, जिनमें फ्लोटिंग स्टोरेज भी शामिल है। जानकार कहते हैं कि अगर मध्य पूर्व से सप्लाई कम हुई तो भारतीय रिफाइनर जल्दी रूसी ग्रेड्स की तरफ मुड़ सकते हैं। भारतीय बंदरगाहों के पास 'ऑयल ऑन वॉटर' की उपलब्धता शॉर्ट-टर्म सप्लाई के लिए बफर का काम करेगी।

भारत की विविधीकरण रणनीति क्या बचाएगी?

भारत की तेल आयात में विविधीकरण की रणनीति इस अनिश्चितता में कुशन का काम कर सकती है। अभी भारत 40 से ज्यादा देशों से तेल मंगाता है, जो कीमत और उपलब्धता के हिसाब से मिक्स बदल सकता है। केप्लर के मुताबिक, भारत ने रूस, अमेरिका, वेस्ट अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से तेल के स्रोत बढ़ाए हैं।

हालाँकि, एक मुश्किल यह है कि अटलांटिक बेसिन से तेल आने में 25-45 दिन लगते हैं, जबकि गल्फ से सिर्फ 5-7 दिन। विविधीकरण सप्लाई जारी रखता है, लेकिन ज्यादा फ्रेट खर्च और लंबी सप्लाई चेन के साथ। इसलिए मध्य पूर्व का तेल लॉजिस्टिकली फायदेमंद है और भारत की सप्लाई स्टेबिलिटी के लिए अहम बना रहेगा।

भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व

आपात स्थिति में भारत के कई इन्वेंटरी लेयर्स मदद करेंगे। स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स को जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। रिफाइनरों के पास भी ऑपरेशनल क्रूड स्टॉक हैं, जो शॉर्ट-टर्म गैप भर सकते हैं। केप्लर कहता है, 'इसके अलावा डिपो, पोर्ट और रिफाइनिंग सिस्टम में डीजल, गैसोलीन, एटीएफ़ और एलपीजी जैसे प्रोडक्ट्स के स्टॉक हैं, जिन्हें रुकावट के दौरान मैनेज किया जा सकता है।'

घरेलू क़ीमतों पर केप्लर का मानना है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां निकट भविष्य में रिटेल फ्यूल प्राइस नहीं बढ़ाएंगी। फ्यूल प्राइसिंग डीरगुलेटेड है, लेकिन एडजस्टमेंट आमतौर पर लंबे समय की क्रूड मजबूती पर होते हैं, न कि शॉर्ट-टर्म अस्थिरता पर। सरकार महंगाई को कंट्रोल करने के लिए हालात पर नजर रखेगी।